(गुप्तनवरात्र १९ से २७ जनवरी २०२६) हम धीरे धीरे दसमहाविद्याओं को भूल रहे हैं?
आज की स्थिति को अगर गहराई से देखें तो कारण स्पष्ट दिखते हैं:
- बाहरी चमत्कार, भीतरी साधना का अभाव
दस महाविद्याएँ तत्काल वरदान देने वाली देवियाँ नहीं, बल्कि
अहंकार, भय, मोह, वासना, अज्ञान को काटने वाली शक्तियाँ हैं।
आज का मन शॉर्टकट चाहता है —
रील, वायरल बाबा, त्वरित उपाय —
जबकि महाविद्याएँ तप, संयम और आत्मचिंतन मांगती हैं। - भय के कारण दूरी
काली, भैरवी, धूमावती, छिन्नमस्ता —
इनके रूप सत्य के तीखे रूप हैं।
आज का समाज सौम्य दिखावा चाहता है,सत्य का प्रचंड दर्शन नहीं।इसलिए लोग इन शक्तियों से डरकर दूर हो गए। - आधुनिक जीवन और मानसिक रोग दस महाविद्याएँ सीधे-सीधे जुड़ी हैं—
मां काली — मृत्यु का भय हरने वाली
मां तारा — मानसिक शांति और वाणी की अधिष्ठात्री
मां भैरवी — रोग, पीड़ा और तप की शक्ति
मां छिन्नमस्ता — अहंकार का बलिदान
मां धूमावती — अकेलेपन और अवसाद का सत्य
मां बगलामुखी — नकारात्मक शक्तियों का स्तंभन
मां मातंगी — चेतना और वाणी की शुद्धि
मां कमला — धन और धर्म का संतुलन
मां षोडशी — प्रेम, आकर्षण और जीवन ऊर्जा
मां भुवनेश्वरी — प्रकृति और
पंचतत्त्व की रक्षक
आज जब हृदय रोग, कैंसर, डिप्रेशन, एंग्ज़ायटी बढ़ रहे हैं —
क्योंकि हमने प्रकृति, चेतना और साधना तीनों से दूरी बना ली।
- सोशल मीडिया के नए “भगवान”
आज “जो ट्रेंड करे वही सत्य” बन गया है।
ज्ञान की जगह व्यूज़,
साधना की जगह सेल्फी,
और मंत्र की जगह म्यूज़िक।
दस महाविद्याएँ शोर नहीं करतीं —
वे अंदर परिवर्तन करती हैं. - जब प्रलय आती है, तब महाविद्या स्मरण होती हैं
इतिहास गवाह है —
जब समाज टूटता है, महामारी आती है, युद्ध, रोग, पर्यावरण असंतुलन बढ़ता है —
तब काली, तारा, भैरवी का स्मरण होता है।
आज संकेत वही हैं…
पर हम अब भी भूल में हैं।
दस महाविद्याएँ आज भी जाग्रत हैं…
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🙏जय माता दी🚩
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