मिथुन संक्रांति आज

मिथुन संक्रांति आज


सूर्य जब मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं तो इस घटना को मिथुन संक्रांति कहा जाता है। सूर्य 15 जून को वृष राशि से मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे। ज्‍योतिष के साथ ही धार्मिक मान्‍यताओं में भी मिथुन संक्रांति का विशेष महत्‍व होता है। ज्‍योतिषीय मान्‍यताओं के अनुसार इस दिन सूर्य भगवान की पूजा करने से सूर्य से संबंधित दोष दूर होते हैं और आपके जीवन में सुख शांति बढ़ती है। इस दिन दान पुण्‍य करने का भी शास्‍त्रों में विशेष महत्‍व माना गया है। मिथुन संक्रांति को लेकर मासिक धर्म से भी जुड़ी मान्‍यता काफी प्रचलित है। इस दिन सिलबट्टे की पूजा की भी परंपरा है।

मिथुन संक्रांति क्‍या है ?

मिथुन संक्रांति को मौसम की दृष्टि से भी बहुत खास माना जाता है। इस दिन के बाद से सौर मंडल में भी काफी बड़ा बदलाव आता है। इसके बाद से वर्षा ऋतु का आरंभ माना जाता है। इस दिन सूर्य वृषभ राशि से मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं। इस दिन को देश के अलग-अलग राज्‍यों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है।

मिथुन संक्रांति पर सिलबट्टे की पूजा क्‍यों की जाती है ?

मिथुन संक्रांति प्रमुख रूप से महिलाओं का त्‍योहार है। इस पर्व को महिलाएं नाच गाकर और खुशियों के साथ मनाती हैं। इस पर्व में भगवान सूर्य की पूजा की जाती है और सिलबट्टे को भूदेवी का रूप मानकर उनकी पूजा की जाती है। इस दिन सिलबट्टे को को अच्‍छे से साफ करके रख दिया जाता है और आने वाले चार दिनों तक सिलबट्टे का प्रयोग नहीं किया जाता है। इस दिन महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन की खुशहाली के लिए पूजा करती हैं। श्रृंगार करती हैं मेंहदी लगाती हैं। बरगद के पेड़ पर झूला डालकर अपनी सखियों के साथ यह त्‍योहार मनाती हैं।

ऐसे की जाती है सिल बट्टे की पूजा

मिथुन संक्रांति का पर्व चार दिनों तक मनाया जाता है और इस दिन सिलबट्टे को साफ-सुथरा करके उसको दूध और जल से स्‍नान करवाया जाता है। उसके बाद सिल बट्टे पर सिंदूर और चंदन लगाया जाता है। फिर फूल और हल्‍दी चढ़ाकर उसकी पूजा की जाती है।

मिथुन संक्रांति पर मासिक धर्म को लेकर मान्‍यता

मिथुन संक्रांति की कथा के अनुसार, जिस प्रकार से महिलाओं को हर महीने मासिक धर्म होता है उसी प्रकार से सृष्टि के आरंभ में धरती माता को भी शुरुआती 3 दिनों तक मासिक धर्म हुआ था। मासिक धर्म को ही मातृत्‍व सुख का कारक माना जाता है। इसलिए ऐसी मान्‍यता है कि मिथुन संक्रांति से लेकर अगले 3-4 दिन तक धरती माता मासिक धर्म में रहती हैं। इसलिए सिलबट्टे को भूदेवी का रूप मानकर उसकी पूजा की जाती है। इस दौरान सिल बट्टे का प्रयोग खाना बनाने में नहीं किया जाता है।

इस तरह करें सूर्य की पूजा

मिथुन संक्रांति पर सूर्य की पूजा का भी विशेष महत्‍व माना गया है। इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्‍नान करें और सूर्य को प्रणाम करें। ऊं घृणि सूर्याय नम: मंत्र का जप करें। उसके बाद सूर्य को अर्घ्‍य दें। तांबे के लोटे में जल लेकर उसमें रोली और लाल फूल डाल लें। उसके बाद सूर्य को अर्घ्‍य दें। उसके बाद पूर्व दिशा में मुख करके ऊं घृणि सूर्याय नम: मंत्र का 108 बार जप करें।

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