ज्येष्ठ मास में सूर्य पूजा

भविष्यपुराण प्रतिसर्गपर्व चतुर्थ अध्याय ७ के अनुसार ज्येष्ठ मास में सूर्य पूजा का अत्यधिक महत्त्व है। धनार्थी अर्यमा विप्र द्वारा ज्येष्ठ मास में सूर्य पूजा का एक वृत्तान्त आता है जो इस प्रकार है –
बृहस्पति ने कहा – इन्द्र ! सूर्य की ज्येष्ठ मास की एक रम्य कथा तुम्हें सुना रहा हूँ । पहले सत्ययुग में अर्यमा नामक एक ब्राह्मण हुआ, जो वेद, वेदाङ्ग का मर्मज्ञ और धर्मशास्त्र का महान् विद्वान् था । श्राद्धयज्ञ नामक राजा की पितृमती नामक कन्या उसकी पत्नी थी । उस अर्यमा ब्राह्मण ने उस पत्नी द्वारा सात पुत्र और एक साध्वी पुत्री उत्पन्न किया । उसके वे पुत्र धर्मशास्त्र के निपुण विद्वान् थे । एक बार उस बुद्धिमान् ब्राह्मण ने अपने हृदय में भली-भाँति विचारकर धन के लिए अनेक पूजनों द्वारा भास्कर देव की उपासना की । प्रातःकाल में श्वेतपुष्प एवं चन्दनादि, मध्याह्न में रक्तपुष्प और सायंकाल में पीतपुष्पों द्वारा उनकी आराधना प्रारम्भ की । विधानपूर्वक एक मास तक उनकी पूजा करने के उपरान्त ज्येष्ठ-मास के अन्त में भगवान सूर्य ने उसे एक शुभमणि प्रदान किया, जिससे उस मणि के प्रभाव से एक प्रस्थ स्वर्ण प्रतिदिन उन्हें मिलने लगा । उसके द्वारा उन्होंने अत्यन्त धर्म किया — पृथ्वी में अनेक स्थानों पर बाबली, कुएँ, तालाब और सुन्दर मन्दिरों का निर्माण कराया । पश्चात् सूर्यदेव के प्रसन्नतावश इन कार्यों के सुसम्पन्न होने के उपरान्त उस धार्मिक ने एक सहस्र वर्ष तक तरुण एवं आरोग्य जीवन व्यतीत किया । अनन्तर अपने शरीर को त्यागकर रमणीक सूर्यलोक की प्राप्तिपूर्वक वहाँ एक लाख वर्ष तक रह पुनः सूर्यरूप की प्राप्ति की । इस प्रकार सूर्य का माहात्म्य मैंने तुम्हें सुना दिया । इसलिए इन्द्र ! देवों समेत तुम मण्डलस्थ सूर्य की उपासना करो। इसे सुनकर देवों ने सूर्यदेव की पद्यात्मक कथाओं द्वारा उनकी आराधना आरम्भ की । उससे प्रसन्न होकर ज्येष्ठ मास में सूर्य ने वहाँ प्रकट होकर देवों से कहा —देवगण ! भयानक कलि के समय में कृष्ण-सप्त-सुदर्शन निम्बादित्य के रूप में उत्पन्न होकर ख्यातिपूर्वक देवों का कार्य सफल करेगा, तथा धर्म की ग्लानि को हरेगा ।

मित्राय नमः! मित्राय नमः! मित्राय नमः! मित्राय नमः! मित्राय नमः! मित्राय नमः! मित्राय नमः!

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