वल्गा सूक्त

वल्गा सूक्त (Valga Suktam) एक अत्यंत शक्तिशाली वैदिक स्तोत्र है, जिसका उपयोग नकारात्मक ऊर्जा, तंत्र-मंत्र, शत्रुबाधा और नजरदोष को दूर करने के लिए किया जाता है। इस सूक्त के ११ श्लोक हैं, जो शत्रुओं द्वारा की गई मारण, मोहन, उच्चाटन जैसी क्रियाओं के प्रभाव को वापस भेजने (प्रतिहरामि ताम्) की प्रार्थना करते हैं। यह स्तोत्र मुख्य रूप से मां बगलामुखी से संबंधित माना जाता है। 

अथर्व-वेदोक्त वल्गा-सूक्त

ॐ नम: शिवाय

यां ते चक्रुरामे पात्रे, यां चक्रुर्मिक्ष-धान्यके। 

आमे मांसे कृत्यां यां चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।१ 

यां ते चक्रुः वृक-वाका, वजे वा यां कुरीरिणि। 

अव्यां ते कृत्यां यां चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।२ 

यां ते चक्रुरेक-शफे, पशूनामुभयादति।

 गर्दभे कृत्यां यां चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।३ 

यां ते चक्रुरमूलायां, वलगं वा नराच्याम्।

 क्षेत्रे ते कृत्यां यां चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।४ 

यां ते चक्रुर्गार्हपत्ये, पूर्वाग्नावुत दुश्चितः। 

शालायां कृत्यां यां चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।५ 

यां ते चक्रुः सभायां, यां चक्रुरधिदेवते। 

अक्षेषु कृत्यां यां चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।६ 

यां ते चक्रुः, सेनायां, यां चक्रुरिष्वायुधे। 

दुन्दुभौ कृत्यां यां चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।७ 

यां ते कृत्यां कूपे वदधुः, श्मशाने वा निचख्नुः। 

सद्मनि कृत्यां या चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।८

 यां ते चक्रुः पुरुषस्यास्थे, अग्नौ संकसुके च याम्। 

म्रोकं निर्दाहं क्रव्यादं, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।९

 अपर्थनाज-भारैणा, तां पथेतः प्रहिण्मसि।

 अधीरो मर्या धीरेभ्यः, संजभाराचित्या।।१० 

यश्चकार न शशाक, कर्तु शश्रे पादमङ्गुरिम्। 

चकार भद्रमस्मभ्यमभगो भगचद्भ्यः।।११ 

कृत्यां कृतं वलगिनं, मूलिनं शपथेऽप्ययम्।

 इन्द्रस्तं हन्तुमहता, बधेनाग्निर्विध्यत्वस्तया।।१२ 

भावार्थ-तुम्हारे लिए क्रीडा में, पात्र में, मिले हुए अनाज में जो कृत्या की गई है, कच्चे मांस में जो कृत्या की गई है, उसको मैं दूर करता हूँ। वृक-वाक (बगुले) में, बाज में, बकरे में, जो तुम्हारे लिए कृत्या की गई है, उसको मैं दूर करता हूँ। तुम्हारे लिए मछली में, पशुओं में, दोनों में, गदहे में जो कृत्या की गई है, उसको मैं दूर करता हूँ। जो तुम्हारे लिए आकाश-बौर में, खेत में, वगला-सूक्त द्वारा वानराची में, खेत में, जो कृत्या की गई है, उसको मैं दूर करता हूँ। जो तुम्हारे लिए सभा में, प्रतियोगिता में, जुआँ-पासे में कृत्या की गई है, उसको मैं दूर करता हूँ। जो तुम्हारे लिए सेना में, बाणों में, शस्त्रों में, रण-भेरियों में कृत्या की गई है, उसको मैं दूर करता हूँ। जो तुम्हारे लिए कुएँ में, बध्य-शाला में, श्मशान में, भवन में कृत्या निक्षिप्त की गई है, उसको मैं दूर करता हूँ। पुरुष की हड्डी में, अग्नि में, शलाका में तुम्हारे लिए जो कृत्या निक्षिप्त है, उस अशीर्ण, अदिग्ध, मांस-भक्षी कृत्या को मैं दूर करता हूँ। अमार्ग में, अभिमन्त्रित जल में, गठरी में स्थापित कर, जो कृत्या तुम्हारे लिए अभिप्रेरित हुई है, उसको ज्ञान द्वारा और अधीरों द्वारा स्थापित को मैं धीरता से दूर करता हूँ। जिसने कृत्या किया है, वह प्रौहणशील इन्द्रिय-चरण औठ अँगुली में कृत्या करने में समर्थ नहीं हुआ। वह अभागा है, भगवद्-दया से हमारा कल्याण हो। उस बगलामुखी की कृत्या करनेवाले उपासक को हम शपथ देते हैं, इन्द्र उसे महान् वध द्वारा समाप्त करे, अग्नि उसकी कृत्या को जला डाले।

विधि- उक्त वेदोक्त वलगा-सूक्त कृत्या-निवारण के लिए अपूर्व है। यह ब्रह्मास्त्र, ब्रह्म-विद्या है। भयङ्कर रोग या दर्द में जब अच्छे से अच्छा वैद्य की दवा भी लाभ-प्रद न हो, तब इस सूक्त के ग्यारह पाठ करे। हो सके, तो हल्दी से न्यास करे अथवा पीले करवीर के ११ पुष्पों से झाड़ें। ऐसा तीन बार करे। सभी व्याधियों में यह अनुभूत बतलाया गया है।

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