- कब करें: गणगौर पूजा का आरम्भ फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि से चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि तक की जाती है। होली के दुसरे दिन से गणगौर पूजा की जाती हैं। यह पूजा सोलह दिन तक चलती हैं। नवविवाहिताएं अपने सुहाग के लिए शादी के बाद की पहली गणगौर की विशेष रूप से पूजा करती हैं। होली के दुसरे दिन स्नान करके होली की राख़ और कुम्हार के घर से लाई गई पवित्र मिट्टी से ईसर जी और गौरी जी की मूर्ति और आठ गणगौर बनाई जाती हैं। टोकरी में दूब बिछा कर इन गणगौरों को रख दिया जाता हैं। इसके बाद उन्हें छोटे छोटे कपड़ों से लपेट देते हैं।
- स्थापना एवं दिशा: पूर्व दिशा की दिवार के पास एक साफ लकड़ी के पाटे (चौकी) पर लाल कपड़ा बिछाकर ईसर-गौर (शिव-पार्वती) की मूर्तियों और गणगौर की स्थापित को विराजमान करें। (दीवार पर भी गणगौर और ईसर का चित्र बना सकते है)
- जल के छींटे (पाणी पिलाना): एक लोटे में जल भर लें उसके ऊपर दूब और फुल रख लें। इसके बाद अपने हाथ में दूब (घास) का गुच्छा लें। अब उसमें चांदी का छल्ला फंसाएं। अब लोटे के जल में दूब को डुबोकर ईसर-गौर को 16 बार जल के छींटे दें। इस दौरान आपको “गोर-गोर गोमती” (दूब वाला गीत) गीत गाएं।
- 16 टीकी का नियम (सबसे महत्वपूर्ण): अलग अलग चार कटोरियाँ में हल्दी, रोली, मेहंदी, और काजल की एक डिबिया लेकर दीवार पर इन सभी से अलग अलग सोलह बिंदिया लगाई जाती हैं। एक कागज या दीवार पर (जहाँ पूजा कर रही हैं) माता के नाम की 16-16 बिंदियां (टीकी) लगाई जाती हैं:
- सबसे पहले रोली की 16 टीकी लगाएं।
- फिर मेहंदी की 16 टीकी लगाएं।
- फिर हल्दी की 16 टीकी लगाएं।
- अंत में काजल की 16 टीकी लगाएं।(कुंवारी कन्याएं 16 की जगह 8-8 टीकी ही लगाती हैं)।
- बिंदी लगाने के बाद पूजा ख़त्म करके ही उठाना चाहिए। एक मिटटी की कटोरी में थोडा सा जल, एक हल्दी की गांठ, कौड़ी, चांदी की अंगूठी और थोड़ी सी दूब रख लें।
- गणगौर के फुल चढाने के बाद सवेर का गीत गाए। गणगौर की पूजा दो महिलाएं को जोड़े से करनी चाहिए। दोनों महिलाये एक दुसरे की छोटी अंगुली से हाथ पकड़ लेती हैं। गणगौर पूजा पूरी करने के बाद ही हाथ से जोड़ा छोड़ा हैं। यदि किसी महिला का जोड़ा नहीं हैं तो वह अपनी चूड़ी या चुनड़ी को पकड़कर भी जोड़ा ले सकती हैं। दोनों हाथों में दूब लेकर मिटटी की कटोरी को थाली से थोडा सा उठाकर धीर धीरे हिलाते हैं और और खेल वाला गीत गाते हैं। इसके बाद दूब से पाटा धोते हैं और पाटा धोने का गीत गाते हैं और गणगौर पूजा हैं।
- भोग और सुहाग सामग्री: माता गौरी को सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी अर्पित करें और ईसर जी को जनेऊ व वस्त्र रूपी कलावा चढ़ाएं। इसके बाद मीठे का भोग लगाएं।
- कथा और आरती: पूजा अर्चना के अंत में हाथ में गेहूं के दाने लेकर ‘गणगौर की व्रत कथा’ पढ़ें। इसके बाद कपूर या घी का दीपक जलाकर गणगौर माता की आरती पढ़ें।
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