Author: admin

  • Healing codes for Addiction

    Healing codes for Addiction

    •84 72 723 for addiction

    •55 65 569 for those who experience anger management issues, and for those who are
    around them (this can be given to someone who is yelling at everybody–just think it)

    •456 923 8484 79256 to assist with the breaking of bad habits

    •78 19 335 for eating disorder

    •25 65 993 for morbid obesity and all its sequelae

    •25 36 397 for the disease of alcohol and its abuses

    •99 61 553 to heal all dependence on smoking–tobacco and non-tobacco options

    •91 582 7139 for addiction to pain medications

    •91 278 596 for obsessive thoughts about managing pain

    •92 367 9342 to close pain gate receptors linked to complex regional pain syndrome

  • श्री ललिता चालीसा

    श्री ललिता चालीसा

    ललिता चालीसा एक भक्ति गीत है जो ललिता माता पर आधारित है। ललिता चालीसा एक लोकप्रिय प्रार्थना है जो 40 छन्दों से बनी है। ललिता माता के भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए इस चालीसा का पाठ करते हैं।

    ॥ चौपाई ॥

    जयति जयति जय ललिते माता।तव गुण महिमा है विख्याता॥

    तू सुन्दरी, त्रिपुरेश्वरी देवी।सुर नर मुनि तेरे पद सेवी॥

    तू कल्याणी कष्ट निवारिणी।तू सुख दायिनी, विपदा हारिणी॥

    मोह विनाशिनी दैत्य नाशिनी।भक्त भाविनी ज्योति प्रकाशिनी॥

    आदि शक्ति श्री विद्या रूपा।चक्र स्वामिनी देह अनूपा॥

    हृदय निवासिनी-भक्त तारिणी।नाना कष्ट विपति दल हारिणी॥

    दश विद्या है रुप तुम्हारा।श्री चन्द्रेश्वरी नैमिष प्यारा॥

    धूमा, बगला, भैरवी, तारा।भुवनेश्वरी, कमला, विस्तारा॥

    षोडशी, छिन्न्मस्ता, मातंगी।ललितेशक्ति तुम्हारी संगी॥

    ललिते तुम हो ज्योतित भाला।भक्त जनों का काम संभाला॥

    भारी संकट जब-जब आये।उनसे तुमने भक्त बचाए॥

    जिसने कृपा तुम्हारी पायी।उसकी सब विधि से बन आयी॥

    संकट दूर करो माँ भारी।भक्त जनों को आस तुम्हारी॥

    त्रिपुरेश्वरी, शैलजा, भवानी।जय जय जय शिव की महारानी॥

    योग सिद्दि पावें सब योगी।भोगें भोग महा सुख भोगी॥

    कृपा तुम्हारी पाके माता।जीवन सुखमय है बन जाता॥

    दुखियों को तुमने अपनाया।महा मूढ़ जो शरण न आया॥

    तुमने जिसकी ओर निहारा।मिली उसे सम्पत्ति, सुख सारा॥

    आदि शक्ति जय त्रिपुर प्यारी।महाशक्ति जय जय, भय हारी॥

    कुल योगिनी, कुण्डलिनी रूपा।लीला ललिते करें अनूपा॥

    महा-महेश्वरी, महा शक्ति दे।त्रिपुर-सुन्दरी सदा भक्ति दे॥

    महा महा-नन्दे कल्याणी।मूकों को देती हो वाणी॥

    इच्छा-ज्ञान-क्रिया का भागी।होता तब सेवा अनुरागी॥

    जो ललिते तेरा गुण गावे।उसे न कोई कष्ट सतावे॥

    सर्व मंगले ज्वाला-मालिनी।तुम हो सर्व शक्ति संचालिनी॥

    आया माँ जो शरण तुम्हारी।विपदा हरी उसी की सारी॥

    नामा कर्षिणी, चिन्ता कर्षिणी।सर्व मोहिनी सब सुख-वर्षिणी॥

    महिमा तव सब जग विख्याता।तुम हो दयामयी जग माता॥

    सब सौभाग्य दायिनी ललिता।तुम हो सुखदा करुणा कलिता॥

    आनन्द, सुख, सम्पत्ति देती हो।कष्ट भयानक हर लेती हो॥

    मन से जो जन तुमको ध्यावे।वह तुरन्त मन वांछित पावे॥

    लक्ष्मी, दुर्गा तुम हो काली।तुम्हीं शारदा चक्र-कपाली॥

    मूलाधार, निवासिनी जय जय।सहस्रार गामिनी माँ जय जय॥

    छः चक्रों को भेदने वाली।करती हो सबकी रखवाली॥

    योगी, भोगी, क्रोधी, कामी।सब हैं सेवक सब अनुगामी॥

    सबको पार लगाती हो माँ।सब पर दया दिखाती हो माँ॥

    हेमावती, उमा, ब्रह्माणी।भण्डासुर कि हृदय विदारिणी॥

    सर्व विपति हर, सर्वाधारे।तुमने कुटिल कुपंथी तारे॥

    चन्द्र- धारिणी, नैमिश्वासिनी।कृपा करो ललिते अधनाशिनी॥

    भक्त जनों को दरस दिखाओ।संशय भय सब शीघ्र मिटाओ॥

    जो कोई पढ़े ललिता चालीसा।होवे सुख आनन्द अधीसा॥

    जिस पर कोई संकट आवे।पाठ करे संकट मिट जावे॥

    ध्यान लगा पढ़े इक्कीस बारा।पूर्ण मनोरथ होवे सारा॥

    पुत्र-हीन संतति सुख पावे।निर्धन धनी बने गुण गावे॥

    इस विधि पाठ करे जो कोई।दुःख बन्धन छूटे सुख होई॥

    जितेन्द्र चन्द्र भारतीय बतावें।पढ़ें चालीसा तो सुख पावें॥

    सबसे लघु उपाय यह जानो।सिद्ध होय मन में जो ठानो॥

    ललिता करे हृदय में बासा।सिद्दि देत ललिता चालीसा॥

    ॥ दोहा ॥

    ललिते माँ अब कृपा करो,सिद्ध करो सब काम।

    श्रद्धा से सिर नाय करे,करते तुम्हें प्रणाम॥

  • श्री राधा रानी चरणारविन्द 

    श्री राधा रानी चरणारविन्द (राधा रानी जी का दायाँचरण )

    राधारानी जी के दायाँचरण “आठ मंगल चिन्हों” से अलंकृत है,‘शंख’, ‘गिरी’, ‘रथ’, ‘मीन’, ‘शक्ति-अस्त्र’, ‘गदा’, ‘यज्ञकुण्ड’, ‘रत्न-कुंडल’.पादांगुष्ठ के मूल पर एक ‘शंख’ है. दूसरी एवं माध्यम अँगुली के नीचे एक ‘गिरी’ है. गिरी के नीचे मध्य में एडी की ओर एक ‘रथ’ है और एड़ी पर एक ‘मीन’ है, रथ के समीप पावं के भीतरी किनारे पर एक ‘शक्ति अस्त्र’ है. रथ के दूसरी ओर पावं के बाहरी किनारे के निकट एक ‘गदा’ है. कनिष्ठा के नीचे एक ‘यज्ञकुण्ड’ है.और उसके नीचे एक ‘रत्न कुंडल’ है.

    १. शंख – शंख विजय का प्रतीक है यह बताता है कि राधा-गोविंद के चरणकमलो की शरण ग्रहण करने वाले व्यक्ति सदैव दुख से बचे रहते है और अभय दान प्राप्त करते है.२. गिरी  – यह बताता है यधपि गिरी-गोवर्धन की गिरिवर के रूप में व्रज में सर्वत्र पूजा होती है, तथापि गिरी-गोवर्धन विशेषकर राधिका की  चरण सेवा करते है.

    ३. रथ – यह चिन्ह बताता है, कि मन रूपी रथ को राधा के चरणकमलों में लगाकर सुगमता पूर्वक नियंत्रित किया जा  सकता है.४. मीन – जिस प्रकार मछली जल के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार भक्तगण क्षण भर भी राधा-श्यामसुन्दर के चरणाम्बुजों के बिना नहीं रह सकते.५. शक्ति  – यह एक भाले का घोतक है, जो व्यक्ति राधा जी कि शरण ग्रहण करता है उनके लिए श्री राधा के चरण प्रकट होकर सांसारिक जीवन के सभी अप्रिय बंधनों को काट डालते है.६.गदा – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा के चरण पापमय काम रूपी हाथी को प्रताड़ित कर सकते है.७. होम कुण्ड –  यह घोषित करता है कि राधा के चरणों का ध्यान करने वाले व्यक्ति के पाप इस प्रकार भस्म हो जाते है मानो वे यज्ञ वेदी में विघमान हो.८. कुंडल – श्री कृष्ण के कर्ण सदा राधा जी के मंजुल नूपुरो कि ध्वनि और उनकी  वीणा के मादक रागों का श्रवण करते है.

    राधा रानी जी का बायाँ चरण   

    राधा रानी जी का बायाँ चरण “ग्यारह शुभ चिन्हों” से सज्जित है. जौ, चक्र, छत्र, कंकण, ऊर्ध्वरेखा, कमल, ध्वज,  सुमन, पुष्पलता, अर्धचंद्र, अंकुश. पादांगुष्ठ के मूल पर “एक जौ” का दाना है उसके नीचे एक “चक्र” है, उसके नीचे एक “छत्र” है, और उसके नीचे एक “कंकण” है. एक “ऊर्ध्वरेखा” पावं के मध्य में प्रारंभ होती है, मध्यमा के नीचे एक “कमल” है, और उसके नीचे एक “ध्वज” है. ध्वज के नीचे एक “सुमन” है, और उसके नीचे “पुष्पलता” है, एड़ी पर एक चारु “अर्धचंद्र” है. कनिष्ठा के नीचे एक “अंकुश” अंकित है.

    1. जौ का दाना – जौ का दाना व्यक्त करता है कि भक्तजन राधा कृष्ण के पदारविन्दो कि सेवा कर समस्त भोगो ऐश्वर्य प्राप्त करते है. एक बार उनका पदाश्रय प्राप्त कर लेने पर भक्त की  अनेकानेक जन्म मरण कि यात्रा घट कर, जौ के दानो के समान बहुत छोटी हो जाती है.2. चक्र – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, और मात्सर्य, रूपी छै शत्रुओ का  नाश करता है. ये तेजस तत्व का प्रतीक है जिसके द्वारा राधा गोविंद भक्तो के अंतःकरण से पाप तिमिर को छिन्न-भिन्न कर देते है.3. छत्र – छत्र यह सिद्ध करता है कि उनके चरणों कि शरण ग्रहण करने वाले भक्त भौतिक कष्टों कि अविराम वर्षा से बचे रहते है.4. कंकण  – राधा के चरण सर्वदा कृष्ण के हाथो में रहते है (जब वे मान करती है तो कृष्ण चरण दबाते है) जिस प्रकार कंकण सदा हाथ में रहता है.5. उर्ध्व रेखा – जो भक्त इस प्रकार राधा श्याम के पद कमलों से लिपटे रहते है, मानो वे उनकी जीवन रेखा हो वे दिव्य धाम को जाएँगे. 6. कमल – सरस सरसिज राधा गोविंद के चरणविंदो का ध्यान करने वाले मधुकर सद्रश भक्तो के मन में प्रेम हेतु लोभ उत्पन्न करता है.7. ध्वज – ध्वज उन भक्तो कि भय से बचाता और सुरक्षा करता है जो उनके चरण सरसिज का ध्यान करते है विजय का प्रतीक है.8. पुष्प – पुष्प दिखाता है कि राधा जी के चरणों कि दिव्य कीर्ति सर्वत्र एक सुमन सौरभ कि भांति फैलती है9. पुष्पलता  – यह चिन्ह बताता है कि किस प्रकार भक्तो की इच्छा लता तब तक बढती रहती है, जब तक वह श्रीमती राधा के चरणों की शरण ग्रहण नहीं कर लेती.10. अर्धचंद्र – यह बताता है कि जिस प्रकार शिव जी जैसे देवताओं ने राधा गोविंद के चरणारविन्दों के तलवो से अपने शीश को शोभित किया है, इसी प्रकार जो भक्त इस प्रकार राधा और कृष्ण के पदाम्बुजो द्वारा अपने शीश को सुसज्जित करते है वे शिव जी के समान महान भक्त बन जाते है.11. अंकुश – अंकुश इस बात का घोतक है कि राधा गोविद के चरणों का ध्यान भक्तो के मन रूपी गज को वश में करता है उसे सही मार्ग दिखाता है.इस प्रकार राधारानी के चरण सरसिज के “उन्नीस मंगल चिन्हों” का नित्य स्मरण किया जाता है.

  • YOUR BIRTH DATE AND YOUR LUCKY NUMBER

    YOUR BIRTH DATE AND YOUR LUCKY NUMBER

    1, 10, 19 & 28: This number is full of Sun’s energy. 1 is the magical number for you. Write on yellow paper with red color and always keep it with you. You never lose your energy.

    2, 11, 20 & 29: It has softness of Moon. 22 is the magical number for you. Write on white paper with yellow color and always keep it with you. You remain emotionally stable.

    3, 12, 21 & 30: It relates with intelligence of Jupiter. 333 is the magical number for you. Write on yellow paper with yellow color and always keep it with you. You never lose your speech and energy.

    4, 13, 22 & 31: It is the mystery number of Rahu. 13 is the magical number for you. Write on sky blue paper with blue color and always keep it with you. You won’t face ups-downs in life.

    5, 14 & 23: It denotes the intelligence of Mercury. 505 is the magical number for you. Write on green paper with green color and always keep it with you. You won’t divagate and your memory remains good.

    6, 15 & 24: It relates with Venus and love. 24 is the magical number for you. Write on white paper with pink color and always keep it with you. It strengthens your relations and increase attraction.

    7, 16 & 25: It relates with Ketu. 77 is the magical number for you. Write on white paper with gold color and always keep it with you. It protects you from ups-downs and serious diseases.

    8, 17 & 26: It relates with Saturn. 62 is the magical number for you. Write on blue paper with blue color and always keep it with you. It reduces struggle in your life.

    9, 18 & 27: It is the strongest number of Mars. 99 is the magical number for you. Write on white paper with red color and always keep it with you. It increases your energy and protects you from an accident

  • अंगारक विनायक चतुर्थी व्रत आज

    अंगारक विनायक चतुर्थी व्रत आज


    जब किसी महीने की चतुर्थी तिथि का संयोग मंगलवार को होता है तो इसे अंगारक चतुर्थी कहते हैं। साल में 2 या 3 बार ही अंगारक चतुर्थी का संयोग बनता है, इसलिए इसे बहुत ही शुभ मानते हैं। साल 2025 की अंतिम अंगारक चतुर्थी का संयोग इस बार 23 दिसंबर, मंगलवार को बन रहा है। इस दिन भगवान श्रीगणेश के साथ-साथ मंगलदेव की पूजा करना भी शुभ रहेगा।

    अंगारक चतुर्थी शुभ मुहूर्त

    सुबह 09:47 से 11:06 तक
    सुबह 11:06 से दोपहर 12:25 तक
    दोपहर 12:04 से 12:47 तक (अभिजीत मुहूर्त)
    दोपहर 12:25 से 01:45 तक
    दोपहर 03:04 से 04:23 तक

    अंगारक चतुर्थी व्रत-पूजा विधि

    • सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद हाथ में जल-चावल लेकर व्रत-पूजा का संकल्प लें। दिन भर व्रत के नियम का पालन करें।
    •  शुभ मुहूर्त से पहले पूजा की पूरी तैयारी कर लें। पूजन सामग्री को एक स्थान पर एकत्रित करके रख लें। पूजन स्थान को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
    • शुभ मुहूर्त शुरू होने पर पूजा स्थान पर लकड़ी का पटिया रखकर इसके ऊपर भगवान श्रीगणेश का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें। पास में ही दीपक भी जलाएं।
      भगवान की प्रतिमा पर कुमकुम से तिलक करें, फूलों की माला पहनाएं। एक-एक करके दूर्वा, अबीर, गुलाल, चावल रोली, हल्दी, फल, फूल आदि चीजें चढ़ाएं।
    • पूजा करते समय ऊं गं गणेशाय नम: मंत्र का जाप भी करें। श्रीगणेश को लड्डू का भोग लगाएं और आरती करें। समय हो तो कुछ देर मंत्र जाप भी करें।
    • रात को चंद्रमा उदय होने पर पहले जल से अर्ध्य दें और फूल, चावल आदि चीजें चढ़ाकर पूजा करें। घर के बुजुर्गों के पैर छुएं। इसके बाद स्वयं भोजन करें।
    • चतुर्थी तिथि का व्रत महिलाओं के साथ पुरुष भी कर सकते हैं। इस व्रत को करने से जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। दुखों से छुटकारा मिलता है।

    अंगारक चतुर्थी क्या है?

    संकष्टि चतुर्थी के इस विशेष दिन का नाम ‘अंगारक’ मंगल ग्रह से जुड़ा होने के कारण पड़ा है। ‘अंगारक’ का अर्थ होता है जलते हुए कोयले जैसा लाल, जो ऊर्जा, शक्ति और उत्साह का प्रतीक है। इस दिन, चतुर्थी तिथि मंगलवार को पड़ती है, इसलिए इसे अंगारक चतुर्थी कहा जाता है। इस अवसर पर लोग भगवान गणेश की पूजा के साथ-साथ मंगलदेव की भी पूजा करते हैं, जिससे जीवन में मंगल ग्रह की अनुकूलता बनी रहती है।

    किसे करना चाहिए यह व्रत?

    विशेष रूप से उन लोगों के लिए यह व्रत लाभकारी है जिनकी कुंडली में मंगल दोष या मांगलिक दोष है। इस व्रत और पूजा से उनकी जीवन में चल रही समस्याओं का समाधान संभव होता है।

  • धनतेरस की कहानी क्या है🌹

    . 🌹धनतेरस की कहानी क्या है🌹
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    ⭕दिवाली के पांच दिनों के उत्सव में धनतेरस का त्योहार पहले दिन आता है। कार्तिक माह के कृष्‍ण पक्ष की त्रयोदशी यानि तेरस के दिन यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, यमराज और माता लक्ष्मी की पूजा होती है। धनतेरस से जुड़ी हुई कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन इनमें से मुख्य रूप से 4 कथाओं का उल्लेख प्रमुखता से मिलता है।

    🪔1. धनतेरस से जुड़ी भगवान धन्वंतरि की कथा:-
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    धनतेरस की यह कथा सबसे प्रमुख है। शास्त्रों में वर्णित कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। मान्यता है कि भगवान धन्वंतरि विष्णु के अंशावतार हैं। संसार में चिकित्सा विज्ञान के विस्तार और प्रसार के लिए ही भगवान विष्णु ने धन्वंतरि का अवतार लिया था। भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने के उपलक्ष्य में ही धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

    🪔2. राजा बलि और वामन अवतार की कथा:-
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    एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन रूप में राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगकर तीनों लोकों को वापस देवताओं को दिलाया था। इस कथा का संबंध भी धन-संपत्ति की पुनः प्राप्ति से है, इसलिए इसे धनतेरस से जोड़कर देखा जाता है।

    धनतेरस से जुड़ी कथा है कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन देवताओं के कार्य में बाधा डालने के कारण भगवान विष्णु ने असुरों के गुरु शुक्राचार्य की एक आंख फोड़ दी थी। कथा के अनुसार, देवताओं को राजा बलि के भय से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंच गए। शुक्राचार्य ने वामन रूप में भी भगवान विष्णु को पहचान लिया और राजा बलि से आग्रह किया कि वामन कुछ भी मांगे उन्हें इंकार कर देना। वामन साक्षात भगवान विष्णु हैं जो देवताओं की सहायता के लिए तुमसे सब कुछ छीनने आए हैं।

    बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं मानी। वामन भगवान द्वारा मांगी गई तीन पग भूमि, दान करने के लिए कमंडल से जल लेकर संकल्प लेने लगे। बलि को दान करने से रोकने के लिए शुक्राचार्य राजा बलि के कमंडल में लघु रूप धारण करके प्रवेश कर गए। इससे कमंडल से जल निकलने का मार्ग बंद हो गया।

    वामन भगवान शुक्रचार्य की चाल को समझ गए। भगवान वामन ने अपने हाथ में रखे हुए कुशा को कमण्डल में ऐसे रखा कि शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई। शुक्राचार्य छटपटाकर कमण्डल से निकल आए। इसके बाद बलि ने तीन पग भूमि दान करने का संकल्प ले लिया। तब भगवान वामन ने अपने एक पैर से संपूर्ण पृथ्वी को नाप लिया और दूसरे पग से अंतरिक्ष को। तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं होने पर बलि ने अपना सिर वामन भगवान के चरणों में रख दिया। बलि दान में अपना सब कुछ गंवा बैठा। इस तरह बलि के भय से देवताओं को मुक्ति मिली और बलि ने जो धन-संपत्ति देवताओं से छीन ली थी उससे कई गुना धन-संपत्ति देवताओं को मिल गई। इस उपलक्ष्य में भी धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

    🪔3. यमराज और राजकुमार की कथा (यम दीपदान से संबंधित):-
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    एक और प्रचलित कथा राजा हेम के पुत्र से जुड़ी है, जिसकी कुंडली में विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से मृत्यु का योग था। उसकी पत्नी ने चौथे दिन घर के द्वार पर सोने-चांदी के आभूषण और सिक्कों का ढेर लगाकर, पूरी रात दीपक जलाए रखे।

    जब यमदूत सर्प के रूप में आए, तो दीपकों के तेज और आभूषणों की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं और वे राजकुमार के पास नहीं पहुँच पाए। यमराज ने वापस जाकर बताया कि वे उस घर में प्रवेश नहीं कर पाए। इस घटना के कारण अकाल मृत्यु का भय टला। इसीलिए धनतेरस पर यमराज के लिए दीपदान किया जाता है।

    🪔4. माता लक्ष्मी जी और किसान की कथा:-
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    उत्तरी भारत में कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन धनतेरस का पर्व पूरी श्रद्धा व विश्वास के साथ मनाया जाता है। धनवंतरी के अलावा इस दिन, देवी लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की भी पूजा करने की मान्यता है। कहा जाता है कि एक समय भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे तब लक्ष्मी जी ने भी उनसे साथ चलने का आग्रह किया।

    तब विष्णु जी ने कहा कि यदि मैं जो बात कहूं तुम अगर वैसा ही मानो तो फिर चलो। तब लक्ष्मी जी उनकी बात मान गईं और भगवान विष्णु के साथ भूमंडल पर आ गईं। कुछ देर बाद एक जगह पर पहुंचकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से कहा कि जब तक मैं न आऊं तुम यहां ठहरो। मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर मत आना। विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी के मन में कौतूहल जागा कि आखिर दक्षिण दिशा में ऐसा क्या रहस्य है जो मुझे मना किया गया है और भगवान स्वयं चले गए।

    लक्ष्मी जी से रहा न गया और जैसे ही भगवान आगे बढ़े लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं। कुछ ही आगे जाने पर उन्हें सरसों का एक खेत दिखाई दिया जिसमें खूब फूल लगे थे। सरसों की शोभा देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गईं और फूल तोड़कर अपना श्रृंगार करने के बाद आगे बढ़ीं। आगे जाने पर एक गन्ने के खेत से लक्ष्मी जी गन्ने तोड़कर रस चूसने लगीं।

    उसी क्षण विष्णु जी आए और यह देख लक्ष्मी जी पर नाराज होकर उन्हें शाप दे दिया कि मैंने तुम्हें इधर आने को मना किया था, पर तुम न मानी और किसान की चोरी का अपराध कर बैठी। अब तुम इस अपराध के जुर्म में इस किसान की 12 वर्ष तक सेवा करो। ऐसा कहकर भगवान उन्हें छोड़कर क्षीरसागर चले गए। तब लक्ष्मी जी उस गरीब किसान के घर रहने लगीं।

    एक दिन लक्ष्मीजी ने उस किसान की पत्नी से कहा कि तुम स्नान कर पहले मेरी बनाई गई इस देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना, तब तुम जो मांगोगी मिलेगा। किसान की पत्नी ने ऐसा ही किया। पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया। लक्ष्मी ने किसान को धन-धान्य से पूर्ण कर दिया। किसान के 12 वर्ष बड़े आनंद से कट गए। फिर 12 वर्ष के बाद लक्ष्मीजी जाने के लिए तैयार हुईं।

    विष्णुजी लक्ष्मीजी को लेने आए तो किसान ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया। तब भगवान ने किसान से कहा कि इन्हें कौन जाने देता है ,यह तो चंचला हैं, कहीं नहीं ठहरतीं। इनको बड़े-बड़े नहीं रोक सके। इनको मेरा शाप था इसलिए 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं। तुम्हारी 12 वर्ष सेवा का समय पूरा हो चुका है। किसान हठपूर्वक बोला कि नहीं अब मैं लक्ष्मीजी को नहीं जाने दूंगा।*🚩#ऊँ_श्रीमहालक्ष्मी_नम:🚩* 🙏🏻🙏🏻🙏🏻

  • देवी कवच का पाठ

    देवी कवच का पाठ करने के लिए, सबसे पहले स्नान कर साफ कपड़े पहनें और देवी की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाएं। इसके बाद, मां दुर्गा का ध्यान करते हुए, संकल्प लें और कवच का पाठ शुरू करें। पाठ के दौरान मन को एकाग्र रखें और शुद्ध, सात्विक भोजन ग्रहण करें। 

    पाठ करने की विधि

    1. स्नान करें: स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें। 
    2. दीपक जलाएं: देवी की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाएं। 
    3. ध्यान करें: मां दुर्गा का ध्यान करें और मन से नकारात्मक विचारों को दूर करें। 
    4. संकल्प लें: पाठ शुरू करने से पहले संकल्प लें। 
    5. पाठ शुरू करें: देवी कवच का पाठ शुरू करें। यदि आप संस्कृत में पाठ नहीं कर पा रहे हैं, तो शुद्ध हिंदी में पाठ करें, लेकिन गलत उच्चारण से बचें। 
    6. जल का पात्र रखें: पाठ के दौरान एक जल का पात्र अपने सामने रखें। 
    7. जल का प्रयोग करें: पाठ पूरा होने के बाद, उस जल को अपने ऊपर या घर में छिड़क सकते हैं। 

    ध्यान रखने योग्य बातें

    • सात्विक रहें: प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और अन्य तामसिक भोजन से बचें। 
    • ब्रह्मचर्य का पालन करें: पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। 
    • शुद्ध मन रखें: मन में कोई छल-कपट या लोभ-लालच न रखें। 
    • वातावरण शुद्ध रखें: आसपास के वातावरण को स्वच्छ और सुगंधित रखें। 
    • शुद्ध उच्चारण: उच्चारण पर ध्यान दें, लेकिन यदि उच्चारण में गलती हो तो भी मन की शुद्धता और भाव अधिक महत्वपूर्ण हैं, Quora। 

    लाभ

    • मन और आसपास की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
    • प्रेत बाधा जैसी समस्याओं से मुक्ति मिलती है।
    • संकटों, शत्रुओं और रोगों से बचाव होता है।
    • न्यायालय से जुड़े मामलों में विजय मिलती है।

    ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रम्हा ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम, दिग्बंधदेवतास्तत्वम, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन विनियोगः ।।

    ॐ श्री चण्डिका देवी को नमस्कार है।

    ।। मार्कण्डेय उवाच ।।
    ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणांम|
    यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह || 1 ||

    मार्कण्डेय जी ने कहा:  पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा सभी मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट न किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये. || 1 ||

    ।। ब्रम्होवाच ।।
    अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम |
    देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने || 2 ||

    ब्रह्मा जी बोले:  ब्रह्मन्! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है, जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उद्धार करने वाला है| महामुने! उसे श्रवण करो || 2 ||

    प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रम्ह्चारणी |
    तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्मांडेति चतुर्थकम || 3 ||

    देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं| उनके पृथक-पृथक (अलग-अलग) नाम बतलाये जाते हैं. प्रथम नाम शैलपुत्री है, दूसरी मूर्ति का नाम ब्रह्मचारिणी है, तीसरा स्वरुप चंद्रघंटा के नाम से प्रसिद्ध है, चौथी मूर्ति को कूष्मांडा कहते हैं || 3 ||

    पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च |
    सप्तमम् कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् || 4 ||

    पांचवी दुर्गा का नाम स्कंदमाता है, देवी के छठे रूप को कात्यायनी कहते हैं, सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरुप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है || 4 ||

    नवमम् सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः |
    उक्तान्येतानि नामानि ब्रम्हणैव महात्मना || 5 ||

    नवीं दुर्गा का नाम सिद्धिदात्री है| ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं || 5 ||

    अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे |
    विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः || 6 ||

    न तेषां जायते किँचिदशुभं रणसंकटे |
    नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि || 7||

    जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रु से घिर गया हो, विषम संकट में फँस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती की शरण में प्राप्त हुए हों, उनका कभी अमंगल नहीं होता| युद्ध के समय में संकट में पड़ने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखाई देती| उन्हें शोक दुःख और भय की प्राप्ति नहीं होती || 6-7 ||

    यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते |
    ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः || 8 ||

    जिन्होंने भक्ति पूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है| देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिंतन करते हैं, उनकी तुम निस्संदेह रक्षा करती हो || 8 ||
    प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना |
    ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुणासना || 9 ||

    चामुण्डा देवी प्रेत पर आरूढ़ होती हैं, वाराही भैंसे पर सवारी करती हैं, ऐन्द्री का वाहन ऐरावत (हाथी) है, वैष्णोदेवी गरुड़ पर ही आसन जमाती हैं || 9 ||

    माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना |
    लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया || 10 ||

    माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ़ होती हैं, कौमारी का वाहन मयूर है| भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी देवी कमल के आसन पर विराजमान हैं और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं || 10

    स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी ।। 27 ।।

    कंठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कंठ की नली में नलकूबरी रक्षा करें| दोनों कधों में खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करें || 27 ||

    हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चांगुलीषु च ।।
    नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ।। 28 ।।

    दोनों हाथों में दंडिनी और अँगुलियों में अम्बिका रक्षा करें| शूलेश्वरी नखों की रक्षा करें| कुलेश्वरी कुक्षि (पेट) में रहकर रक्षा करें || 28 ||

    स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी ।
    हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ।। 29 ।।

    महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनासिनी देवी मन की रक्षा करें| ललिता देवी ह्रदय में और शूलधारिणी उदार में रहकर रक्षा करें || 29 ||

    नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्र्वरी तथा ।
    पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ।।30 ।।

    नाभि में कामिनी और गुह्यभाग की गुह्येश्वरी रक्षा करें| पूतना और कामिका लिंग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करें || 30 ||

    कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी ।
    जंघे महाबला रक्षेद् सर्वकामप्रदायिनी ।।31।।

    यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ।। 46 ।।

    दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः ।
    जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ।। 47 ।।

    देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है| जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है, उसे दैवी कला प्राप्त होती है तथा वह तीनों लोकों में कहीं भी पराजित नहीं होता| इतना ही नहीं, वह अमृत्यु से रहित हो सौ से भी अधिक वर्षों तक जीवित रहता है  || 46-47 ||

    नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ।
    स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम् ।। 48 ।।

    मकरी, चेचक और कोढ़ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियां नष्ट हो जाती हैं| कनेर, भांग, अफीम, धतूरे आदि का स्थावर विष, सांप और बिच्छू आदि के काटने से चढ़ा हुआ जंगम विष तथा अहिफेन और तेल के संयोग आदि से बनने वाला कृत्रिम विष! ये सभी प्रकार के विष दूर हो जाते हैं, उनका कोई भी असर नहीं होता || 48 ||

    अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ।
    भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः ।। 49 ।।

    इस पृथ्वी पर मारण, मोहन, आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकार के जितने मंत्र-यंत्र होते हैं, वे सब इस कवच को हृदय में धारण कर लेने पर उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं| ये ही नहीं, पृथ्वी पर विचारने वाले ग्राम देवता, आकाशचारी देवविशेष, जल के सम्बन्ध से प्रकट होने वाले गण, उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाले निम्नकोटि के देवता || 49 ||

    सहजा कुलज माला डाकिनी शाकिनी तथा ।
    अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्र्च महाबलाः ।। 50 ।।

    अपने जन्म के साथ प्रकट होने वाले देवता, कुलदेवता, माला (कंठमाला आदि), डाकिनी, शाकिनी, अंतरिक्ष में विचारने वाली भयानक डाकिनियाँ || 50 ||

    ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
    ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ।। 51 ।।

    ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी || 51 ||

    नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ।
    मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ।।52 ।।

    ह्रदय में कवच धारण किये रहने पर उस मनुष्य को देखते ही भाग जाते हैं| कवचधारी पुरुष को राजा से सम्मान-वृद्धि प्राप्त होती है| यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला और उत्तम है || 52 ||

    यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले
    जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ।। 53 ।।

    यावद्-भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।
    तावत्तिष्टति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी ।। 54 ।।

    कवच का पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है| जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डी का पाठ करता है, उसकी जब तक वन, पर्वत और काननों (जंगलों) सहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तब तक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परंपरा बनी रहती है || 53-54 ||

    देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ।
    प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः ।। 55 ।।

    फिर देह का अंत होने पर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से उस नित्य परमपद को प्राप्त होता है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है || 55 ||

    लभते परमं रुपं शिवेन सह मोदते ।। ॐ ।। 56 ।।

    वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और कल्याणमय शिव के आनंद का भागी होता है || 56 ||

    ।। इति श्रीवाराहपुराणे हरिहरब्रह्मविरचितं दे व्याः कवचम् संपूर्णम् ।।

  • कनकधारा स्तोत्र

    जीवन में आर्थिक तंगी को लेकर हम सभी बेहद परेशान रहते हैं। धन प्राप्ति के लिए हरसंभव श्रेष्ठ उपाय करना चाहते हैं। धन प्राप्ति और धन संचय के लिए कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से चमत्कारिक रूप से लाभ प्राप्त होता है।

    कनकधारा स्तोत्र की विशेषता यही है कि यह किसी भी प्रकार की विशेष माला, जाप, पूजन, विधि-विधान की मांग नहीं करता बल्कि सिर्फ दिन में एक बार इसको पढ़ना पर्याप्त है। साथ ही प्रतिदिन कनकधारा यंत्र के सामने दीपक और अगरबत्ती लगाना आवश्यक है। अगर किसी दिन यह भी भूल जाएं तो बाधा नहीं आती क्योंकि यह सिद्ध मंत्र होने के कारण चैतन्य माना जाता है। यहां प्रस्तुत है कनकधारा स्तोत्र का हिन्दी अनुवाद। आपको सिर्फ कनकधारा यंत्र कहीं से लाकर पूजाघर में रखना है।

    मां लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए जितने भी यंत्र हैं, उनमें कनकधारा यंत्र तथा स्तोत्र सबसे ज्यादा प्रभावशाली एवं अतिशीघ्र फलदायी है।

    ।। श्री कनकधारा स्तोत्रम् ।। (संस्कृत हिन्दी पाठ)

    अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।

    अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।।1।।

    * जैसे भ्रमरी अधखिले कुसुमों से अलंकृत तमाल-तरु का आश्रय लेती है, उसी प्रकार जो प्रकाश श्रीहरि के रोमांच से सुशोभित श्रीअंगों पर निरंतर पड़ता रहता है तथा जिसमें संपूर्ण ऐश्वर्य का निवास है, संपूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी की वह दृष्टि मेरे लिए मंगलदायी हो।।1।।

    मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।

    माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:।।2।।

    * जैसे भ्रमरी महान कमल दल पर मंडराती रहती है, उसी प्रकार जो श्रीहरि के मुखारविंद की ओर बराबर प्रेमपूर्वक जाती है और लज्जा के कारण लौट आती है। समुद्र कन्या लक्ष्मी की वह मनोहर मुग्ध दृष्टिमाला मुझे धन संपत्ति प्रदान करें ।।2।।

    विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।

    ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:।।3।।

    * जो संपूर्ण देवताओं के अधिपति इंद्र के पद का वैभव-विलास देने में समर्थ है, मधुहन्ता श्रीहरि को भी अधिकाधिक आनंद प्रदान करने वाली है तथा जो नीलकमल के भीतरी भाग के समान मनोहर जान पड़ती है, उन लक्ष्मीजी के अधखुले नेत्रों की दृष्टि क्षण भर के लिए मुझ पर थोड़ी सी अवश्य पड़े।।3।।

    आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।

    आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:।।4।।

    * शेषशायी भगवान विष्णु की धर्मपत्नी श्री लक्ष्मीजी के नेत्र हमें ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हों, जिनकी पु‍तली तथा बरौनियां अनंग के वशीभूत हो अधखुले, किंतु साथ ही निर्निमेष (अपलक) नयनों से देखने वाले आनंदकंद श्री मुकुन्द को अपने निकट पाकर कुछ तिरछी हो जाती हैं।।4।।

    बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरि‍नीलमयी विभाति।

    कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:।।5।।

    * जो भगवान मधुसूदन के कौस्तुभमणि-मंडित वक्षस्थल में इंद्रनीलमयी हारावली-सी सुशोभित होती है तथा उनके भी मन में प्रेम का संचार करने वाली है, वह कमल-कुंजवासिनी कमला की कटाक्षमाला मेरा कल्याण करे।।5।।

    कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।

    मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।6।।

    * जैसे मेघों की घटा में बिजली चमकती है, उसी प्रकार जो कैटभशत्रु श्रीविष्णु के काली मेघमाला के श्यामसुंदर वक्षस्थल पर प्रकाशित होती है, जिन्होंने अपने आविर्भाव से भृगुवंश को आनंदित किया है तथा जो समस्त लोकों की जननी है, उन भगवती लक्ष्मी की पूजनीय मूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करें।।6।

    प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।

    मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।7।।

    * समुद्र कन्या कमला की वह मंद, अलस, मंथर और अर्धोन्मीलित दृष्टि, जिसके प्रभाव से कामदेव ने मंगलमय भगवान मधुसूदन के हृदय में प्रथम बार स्थान प्राप्त किया था, यहां मुझ पर पड़े।।7।।

    दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।

    दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:।।8।।

    * भगवान नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी का नेत्र रूपी मेघ दयारूपी अनुकूल पवन से प्रेरित हो दुष्कर्म (धनागम विरोधी अशुभ प्रारब्ध) रूपी धाम को चिरकाल के लिए दूर हटाकर विषाद रूपी धर्मजन्य ताप से पीड़ित मुझ दीन रूपी चातक पर धनरूपी जलधारा की वृष्टि करें।।8।।

    इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।

    दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:।।9।।

    * विशिष्ट बुद्धि वाले मनुष्य जिनके प्रीति पात्र होकर जिस दया दृष्टि के प्रभाव से स्वर्ग पद को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं, पद्‍मासना पद्‍मा की वह विकसित कमल-गर्भ के समान कांतिमयी दृष्टि मुझे मनोवांछित पुष्टि प्रदान करें।।9।।

    गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।

    सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै ‍नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।10।।

    * जो सृष्टि लीला के समय वाग्देवता (ब्रह्मशक्ति-सरस्वती) के रूप में विराजमान होती है तथा प्रलय लीला के काल में शाकम्भरी (भगवती दुर्गा) अथवा चन्द्रशेखर वल्लभा पार्वती (रुद्रशक्ति) के रूप में अवस्थित होती है, त्रिभुवन के एकमात्र पिता भगवान नारायण की उन नित्य यौवना प्रेयसी श्रीलक्ष्मीजी को नमस्कार है।।10।।

    श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।

    शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै।।11।।

    * मात:। शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति के रूप में आपको प्रणाम है। रमणीय गुणों की सिंधु रूपा रति के रूप में आपको नमस्कार है। कमल वन में निवास करने वाली शक्ति स्वरूपा लक्ष्मी को नमस्कार है तथा पुष्टि रूपा पुरुषोत्तम प्रिया को नमस्कार है।।11।।

    नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।

    नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै।।12।।

    * कमल वदना कमला को नमस्कार है। क्षीरसिंधु सभ्यता श्रीदेवी को नमस्कार है। चंद्रमा और सुधा की सगी बहन को नमस्कार है। भगवान नारायण की वल्लभा को नमस्कार है। ।।12।।

    सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।

    त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम्।।13।।

    * कमल सदृश नेत्रों वाली माननीय मां ! आपके चरणों में किए गए प्रणाम संपत्ति प्रदान करने वाले, संपूर्ण इंद्रियों को आनंद देने वाले, साम्राज्य देने में समर्थ और सारे पापों को हर लेने के लिए सर्वथा उद्यत हैं, वे सदा मुझे ही अवलम्बन दें। (मुझे ही आपकी चरण वंदना का शुभ अवसर सदा प्राप्त होता रहे)।।13।।

    यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।

    संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।14।।

    * जिनके कृपा कटाक्ष के लिए की गई उपासना उपासक के लिए संपूर्ण मनोरथों और संपत्तियों का विस्तार करती है, श्रीहरि की हृदयेश्वरी उन्हीं आप लक्ष्मी देवी का मैं मन, वाणी और शरीर से भजन करता हूं।।14।।

    सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।

    भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।।15।।

    * भगवती हरिप्रिया! तुम कमल वन में निवास करने वाली हो, तुम्हारे हाथों में नीला कमल सुशोभित है। तुम अत्यंत उज्ज्वल वस्त्र, गंध और माला आदि से सुशोभित हो। तुम्हारी झांकी बड़ी मनोरम है। त्रिभुवन का ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी, मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।।15।।

    दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।

    प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।।16।।

    * दिग्गजों द्वारा सुवर्ण-कलश के मुख से गिराए गए आकाश गंगा के निर्मल एवं मनोहर जल से जिनके श्री अंगों का अभिषेक (स्नान) संपादित होता है, संपूर्ण लोकों के अधीश्वर भगवान विष्णु की गृहिणी और क्षीरसागर की पुत्री उन जगज्जननी लक्ष्मी को मैं प्रात:काल प्रणाम करता हूं।।16।।

    कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।

    अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया:।।17।।

    * कमल नयन केशव की कमनीय कामिनी कमले! मैं अकिंचन (दीन-हीन) मनुष्यों में अग्रगण्य हूं, अतएव तुम्हारी कृपा का स्वाभाविक पात्र हूं। तुम उमड़ती हुई करुणा की बाढ़ की तरह तरंगों के समान कटाक्षों द्वारा मेरी ओर देखो।।17।।

    स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्। 

    गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया:।।18।।

    जो मनुष्य इन स्तु‍तियों द्वारा प्रतिदिन वेदत्रयी स्वरूपा त्रिभुवन-जननी भगवती लक्ष्मी की स्तुति करते हैं, वे इस भूतल पर महान गुणवान और अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं तथा विद्वान पुरुष भी उनके मनोभावों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं।।18।।

    ।।इति कनक धारा स्त्रोत समाप्त।।

  • श्री संकष्टनाशन स्तोत्रम् का महत्व

    श्री संकष्टनाशन स्तोत्रम् का महत्व

    कहा जाता है, जो भी श्रद्धा से इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके जीवन की मुश्किलें खुद-ब-खुद दूर होने लगती हैं। गणेश जी उसके सारे विघ्न हर लेते हैं और मन में अटूट भरोसा व शांति भर देते हैं। चाहे काम में अड़चनें हों या मन में डर, इस स्तोत्र का जप सुख-समृद्धि और सफलता की राह आसान कर देता है।

    संकट नाशन गणेश स्तोत्र के नियम

    संकट नाशन गणेश स्तोत्र के नियम बहुत कठिन नहीं हैं। यदि संकट नाशन गणेश स्तोत्र का पाठ पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ करें तो इसका फल शुभ होता है। संकट नाशन गणेश स्तोत्र का पाठ आप किसी भी दिन से शुरू कर सकते हैं, लेकिन यदि इसे शुक्ल पक्ष के बुधवार से शुरू करें तो यह और भी शुभ माना जाता है। पाठ की शुरुआत वाले दिन प्रातःकाल जल्दी उठें। इसके बाद स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र को स्थापित कर दें। फिर धूप, दीप, फल-फूल, मिठाई आदि अप्रित करें। इन सब कार्य के बैद संकट नाशन स्तोत्र का पाठ करना शुरू करें। पाठ के बाद भगवान से संकटों से मुक्ति के लिए प्रार्थना करें। पूरे नियम, भक्ति और निष्ठा के साथ इस स्तोत्र का पाठ करने से जीवन में आ रही परेशानियां दूर हो जाती हैं।

    संकट नाशन गणेश स्तोत्र पढ़ने के फायदे

    • संकटों से मुक्ति: संकट नाशन गणेश स्स्तोत्र जीवन में आने वाले सभी प्रकार के कष्टों, बाधाओं और परेशानियों को दूर करता है।
    • मानसिक शांति: इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से तनाव, चिंता और भय दूर होते हैं।
    • स्वास्थ्य में सुधार: ॉह स्तोत्र मानसिक और शारीरिक रूप से व्यक्ति मजबूत और स्वस्थ महसूस करता है।
    • धन-समृद्धि का आगमन: संकट नाशन गणेश स्तोत्र पढ़ने से घर में लक्ष्मी का वास होता है और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।
    • विद्यार्थियों को विशेष लाभ: अघर विध्यार्थी इस स्तोत्र को नियमिक पढ़ते हैं को उनकी बुद्धि और एकाग्रता बढ़ती है, जिससे पढ़ाई में उन्हें सफलता मिलती है।
    • संतान प्राप्ति में सहायक: संतान की इच्छा रखने वाले दंपतियों को इसका विशेष लाभ मिलता है।
    • नकारात्मक ऊर्जा का नाशः यह स्तोत्र बुरी शक्तियों और बुरी नजर से रक्षा करता है।
    • घर में सुख-शांति: संकट नाशन गणेश स्तोत्र का रोजाना पाठ करने से परिवारिक जीवन में सौहार्द और शांति बनी रहती

    नित्य पठन से जपकर्ता को छह महीने में अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। एक वर्ष तक जप करने से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है।

    श्री संकटनाशन गणेश स्तोत्र एवं उसके अर्थ

    नारद उवाच, प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्। भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये॥

    अर्थ: जो इस स्तोत्र को भोजपत्र पर लिखकर आठ ब्राह्मणों को दान करता है, गणेश जी की कृपा से उसे सम्पूर्ण विद्या की प्राप्ति होती है।

    प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्। तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्॥ लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च। सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम्॥ नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्। एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्॥

    अर्थ: जिनका पहला नाम ‘वक्रतुण्ड’ है, दूसरा ‘एकदन्त’ है, तीसरा ‘कृष्णपिङ्गाक्षं’ है, चौथा ‘गजवक्त्र’ है, पाँचवाँ ‘लम्बोदर’, छठा ‘विकट’, सातवाँ ‘विघ्नराजेन्द्रं’, आठवाँ ‘धूम्रवर्ण’, नौवां ‘भालचंद्र’, दसवाँ ‘विनायक’, ग्यारहवाँ ‘गणपति’, और बारहवाँ नाम ‘गजानन’ है।

    द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः। न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो॥

    अर्थ: जो मनुष्य सुबह, दोपहर और शाम-तीनों समय प्रतिदिन इन बारह नामों का पाठ करता है, उसे संकट का भय नहीं होता। यह नाम-स्मरण उसके लिए सभी सिद्धियों का उत्तम साधक है।

    विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्। पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम्॥

    अर्थ: इन नामों के जप से विद्यार्थी को विद्या, धन की कामना रखने वालों को धन, पुत्र की कामना रखने वालों को पुत्र और मोक्ष की कामना रखने वालो को मोक्ष में गति प्राप्त हो जाती है

    जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्। संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः॥

    अर्थ: इस गणपति स्तोत्र का नित्य जप करें। इसके नित्य पठन से जपकर्ता को छह महीने में अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। एक वर्ष तक जप करने से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है।

    अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत्। तस्य विद्या भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादतः॥

    अर्थ: जो इस स्तोत्र को भोजपत्र पर लिखकर आठ ब्राह्मणों को दान करता है, गणेश जी की कृपा से उसे सम्पूर्ण विद्या की प्राप्ति होती है।

    ॥ इति श्री नारदपुराणं संकटनाशनं महागणपति स्तोत्रम् संपूर्णम्॥

    संकटनाशन स्तोत्र में गणेश जी के 12 नामों का उल्लेख मिलता है। इस स्तोत्र का जो भी विधिपूर्वक पाठ करता है, उसकी हर इच्छा पूरी होती है। यह संकट को हरने वाला स्तोत्र है। इस स्तोत्र को विघ्ननाशक गणेश स्तोत्र भी कहते हैं।

    संकटनाशन स्तोत्र संसार में सर्वप्रथम पूजनीय भगवान श्री गणेश को समर्पित सबसे प्रभावशाली नारद जी द्वारा कथन किया हुआ स्तोत्र है। इसे सबसे पहले श्री नारद जी ने सुनाया है।

  • सिद्ध कुंजिका स्तोत्र

    💢 सिद्ध कुंजिका स्तोत्र 💢

    “सिद्ध कुंजिका स्तोत्र” देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) से सम्बद्ध एक अत्यंत गूढ़ एवं रहस्यमय स्तोत्र है।
    इसे “सप्तशती का रहस्य” भी कहा जाता है।

    ✦ सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का परिचय ✦

    यह स्तोत्र देवी की सम्पूर्ण साधना का संक्षिप्त रूप है।

    जो साधक सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती का पाठ नहीं कर पाता, वह केवल सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पढ़कर वही फल प्राप्त कर लेता है।

    इसमें बीजमन्त्र, कवच, कीलक, रहस्य और सप्तशती के सम्पुट सभी का संक्षेप समाहित है।

    इसलिए इसे “सप्तशती का कुंजी” (Key / Master Key) कहा जाता है।

    ✦ उत्पत्ति ✦

    यह स्तोत्र शिवजी द्वारा पार्वतीजी को बताया गया है।

    कथा यह है कि पार्वतीजी ने भगवान शिव से पूछा —
    “हे महादेव! यदि कोई साधक सप्तशती का सम्पूर्ण पाठ करने में असमर्थ हो तो क्या उपाय है?”

    तब शिवजी ने इस “सिद्ध कुंजिका स्तोत्र” का उपदेश दिया और कहा —
    “केवल इसका पाठ ही सम्पूर्ण सप्तशती-पाठ के बराबर फल देने वाला है।”

    ✦ विशेषता ✦

    1. लघु रूप – इसमें केवल कुछ ही श्लोक हैं, परन्तु पूरे सप्तशती के बीजमन्त्र निहित हैं।
    2. सर्वसिद्धि प्रदायिनी – इसका पाठ करने से रोग, शोक, भय, संकट, दारिद्र्य, अशुभ—सबका नाश होता है।
    3. गुप्त साधना की कुंजी – तंत्र-साधना में इसे अत्यंत प्रभावी माना गया है।
    4. संरक्षण कवच – यह साधक की रक्षा करता है, और उसे देवी की कृपा सहज उपलब्ध होता है।

    ✦ स्तोत्र का महत्व ✦

    सिद्ध कुंजिका स्तोत्र नवरात्रि, दुर्गा सप्तशती पाठ, देवी-उपासना के समय अवश्य पढ़ा जाता है।

    साधक को यदि केवल कुंजिका स्तोत्र का पाठ भी कर ले तो उसे वही फल प्राप्त होता है जो सप्तशती के पाठ से होता है।

    यह शक्तिपीठों, तंत्र-मन्त्र सिद्धियों और अभिचार निवारण में विशेष रूप से प्रयुक्त होता है।

    ✦ साधना-विधि ✦

    1. स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
    2. देवी का चित्र/मूर्ति/यंत्र के समक्ष दीपक-बत्ती जलाएँ।
    3. संकल्प लें — “मैं अमुक कामना की सिद्धि के लिए सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ कर रहा हूँ।”
    4. कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें।
    5. अंत में देवी को प्रणाम कर पुष्प चढ़ाएँ और आशीर्वाद ग्रहण करें।

    ✦ फल ✦

    रोगनाशक – रोगों और कष्टों का निवारण होता है।

    भय-निवारक – भूत-प्रेत, ग्रहबाधा, शत्रु-भय से मुक्ति मिलती है।

    समृद्धि प्रदायिनी – घर-परिवार में ऐश्वर्य, सुख-शांति और धन-धान्य की वृद्धि होती है।

    साधना सिद्धि – मंत्रजप या साधना के आरंभ में इसका पाठ करने से साधना शीघ्र सिद्ध होती है।

    ✦ रहस्य ✦

    “कुंजिका” का अर्थ है कुंजी (Key)।

    जैसे ताला खोलने के लिए कुंजी चाहिए, वैसे ही सप्तशती और देवी-महात्म्य के गुप्त रहस्यों को खोलने के लिए यह स्तोत्र ही कुंजी है।

    इसलिए इसे सिद्ध कुंजिका स्तोत्र कहा गया।