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  • महानंदा नवमी आज

    महानंदा नवमी आज


    महानंद नवमी एक शुभ हिंदू त्योहार है जो हिंदू पंचांग के माघ, भाद्रपद और मार्गशीर्ष महीनों में शुक्ल पक्ष (चंद्रमा के शुक्ल पक्ष की अवधि) की नवमी (नौवें दिन) को मनाया जाता है। ग्रेगोरियन पंचांग के अनुसार यह तिथि क्रमशः जनवरी-फरवरी, अगस्त-सितंबर और दिसंबर महीनों में पड़ती है। इसके अलावा, महानंद नवमी कुछ अन्य हिंदू चंद्र महीनों में भी मनाई जाती है। इस दिन का मुख्य अनुष्ठान गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों में स्नान करके शुद्धि करना है। हिंदू भक्त शुक्ल पक्ष की नवमी पर देवी दुर्गा की पूजा करते हैं। महानंद नवमी, जिसे ‘ताल नवमी’ भी कहा जाता है, भारत के उत्तरी और पूर्वी राज्यों, विशेष रूप से ओडिशा और पश्चिम बंगाल में अत्यंत उत्साह और उमंग के साथ मनाई जाती है।

    तिथि

    महानंदा नवमी 27 जनवरी मंगलवार को मनाई जायेगी।

    महानंदा नवमी का महत्व:

    महानंद नवमी का त्योहार हिंदू भक्तों के लिए बहुत धार्मिक महत्व रखता है। इस दिन पूजी जाने वाली मुख्य देवी दुर्गा हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी दुर्गा शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक हैं। हिंदू भक्त, विशेषकर महिलाएं, सभी बुराइयों से लड़ने की शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए उनकी पूजा करती हैं। ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा की पूजा करने से सभी बुरी आत्माओं पर विजय प्राप्त होती है। उन्हें ‘दुर्गातिनाशिनी’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है सभी दुखों को दूर करने वाली। इसलिए, जो लोग श्रद्धापूर्वक देवी दुर्गा की पूजा करते हैं, उन्हें सभी दुखों और कष्टों से मुक्ति मिलती है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी दुर्गा के नौ अवतार हैं, जिनके नाम हैं: चंद्रघंटा, शैलपुत्री, कालरात्रि, स्कंद माता, ब्रह्मचारिणी, सिद्धिदायनी, कुष्मांडा, कात्यायनी और महागौरी। महानंद नवमी का आध्यात्मिक महत्व इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि इस दिन देवी दुर्गा के इन सभी रूपों की सामूहिक रूप से पूजा की जाती है।

    महानंदा नवमी के दौरान अनुष्ठान:

    • महानंद नवमी के दिन, भक्त सुबह जल्दी उठकर सूर्योदय के समय स्नान करने की तैयारी करते हैं। हजारों भक्त गंगा, सरस्वती, कावेरी, तुंगभद्रा और गोदावरी जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने के लिए एकत्रित होते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस पुण्य स्नान से व्यक्ति अपने वर्तमान और पिछले जन्मों के सभी पापों और कुकर्मों से मुक्त हो जाता है।
    • हिंदू श्रद्धालु, विशेषकर विवाहित महिलाएं, इस दिन कठोर उपवास रखती हैं। वे दिन भर कुछ नहीं खातीं और रात में चंद्र देव के दर्शन के बाद अपना उपवास तोड़ती हैं।
    • महानंद नवमी के अवसर पर देवी दुर्गा की पूर्ण श्रद्धा से पूजा की जाती है। देवी को भोग लगाने के लिए स्वादिष्ट भोज तैयार किया जाता है, जिसमें राजभोग, कलाकंद, मुरमुरा लड्डू, सुनहरी रस मलाई, भापा आलू, लूची आदि शामिल होते हैं। महानंद नवमी के अवसर पर ताड़ के पके फल, कसा हुआ नारियल, मैदा और चीनी से बना विशेष व्यंजन ‘ताल’एर बारा’ भी तैयार किया जाता है। देवी दुर्गा को भोग भोग चढ़ाने के बाद इसे मित्रों और परिवार के सदस्यों में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। महानंद नवमी के अवसर पर लोग पारंपरिक वस्त्र पहनते हैं, पुरुष सफेद धोती और महिलाएं लाल और सफेद साड़ी पहनती हैं।
    • इस दिन श्रद्धालु देवी दुर्गा के मंदिरों में दर्शन के लिए जाते हैं। महानंद नवमी पर विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठान किए जाते हैं। श्रद्धालु देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए धार्मिक भजन गाते हैं। पश्चिम बंगाल का कनक मंदिर और ओडिशा का बिजारा मंदिर महानंद नवमी समारोहों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

  • वरद – कुंद चौथ व्रत आज

    वरद – कुंद चौथ व्रत आज


    धर्म ग्रंथों के अनुसार, माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि बहुत खास होती है। इसे तिलकुंद और वरद चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान श्रीगणेश के साथ-साथ चंद्रमा की पूजा का भी विधान है। इस व्रत को करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और हर तरह से संकटों से छुटकारा मिलता है, ऐसा पुराणों में लिखा है।

    वरद-तिल-कुंड चतुर्थी 2026 शुभ मुहूर्त

    पंचांग के अनुसार, माघ शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ 22 जनवरी 2026 को 02:47am पर होगा। चतुर्थी तिथि का समापन 23 जनवरी को 02:298 am पर होगा। चतुर्थी मध्याह्न मुहूर्त सुबह 11 बजकर 43 मिनट से दोपहर 1 बजकर 57 मिनट तक रहेगा। इस दिन मध्याह्न काल में भगवान गणेश का पूजन करना अत्यन्त शुभ माना जाता है। वहीं वर्जित चंद्रोदय का समय शाम 5 बजकर 26 मिनट से रात 8 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। 

    वरद-तिल-कुंड चतुर्थी का महत्व

    वरद-तिल-कुंड चतुर्थी को तिलकूट चतुर्थी को व्रत किया जाता है और इस दिन भगवान श्री गणेश जी का पूजा पूरी श्रद्धा के साथ की जाती है। हिंदु पुराणों में इस चतुर्थी को बहुत ही विशेष महत्व बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि यह व्रत महिलाओं के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होता है

    क्यो करें वरद-तिल-कुड चतुर्थी 

    भगवान गणेश जी की पूजा पूरी विधि से करने से भक्त को मानसिक सुख व शान्ति मिलती है। इसके साथ ही यह व्रत करने वाले भक्तों के जीवन सभी प्रकार के सुख और समृद्धि वास होता है। महिलाओं के द्वार इस प्रकार से व्रत करने से उनके परिवार के अन्य सभी लोगों की व्यवसाय में भरपूर तरक्की होती है। भक्त के दाम्पत्य जीवन में और अधिक सुख बढ़ता है और उन्हें अखंड सौभाग्य मिलता है।

    वरद-तिल-कुंड चतुर्थी पूजन विधि

    • वरद-तिल-कुंड चतुर्थी  के दिन सुबह जल्दी उठकर साफ-स्वच्छ वस्त्र पहनें।
    • श्रीगणेश की पूजा करते समय भक्त को अपना मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखना चाहिये क्योंकि यहा शुभ माना जाता है।
    • इसके बाद साफ व शांत चित्त के साथ आसन पर बैठकर भगवान श्रीगणेश का पूजन करें।
    • धूप-दीप जलाने के बाद भगवान गणेश को फल, फूल, चावल, रौली, मौली चढ़ाएं, पंचामृत से स्नान कराने के बाद तिल अथवा तिल-गुड़ का भोग लगायें।
    • पूजा के बाद भक्त को ‘ॐ श्रीगणेशाय नम:’ का जाप 108 जरुर करना चाहिये।
    • इसके बाद शाम के समय कथा सुनने के बाद भगवान गणेशजी की आरती करनी चाहिये।
    • भक्त इस शुभ दिन पर अपनी योग्यता के अनुसार गर्म कपड़े, कंबल, कपड़े व तिल आदि का दान कर सकते है।
    • पूजा के बाद गणेश मंदिर के पुजारी को भोजन भी कराना चाहिए।

  • Direction-wise Aroma Vastu Chart

    Direction-wise Aroma Vastu Chart

    1️⃣ East (Air Element – Sun / Indra)

    Best Aromas: Sandalwood, Rose, Jasmine

    Benefits: Fame, new opportunities, health

    Use: Diffusers/incense in living room or pooja room (East)

    2️⃣ West (Water Element – Varun Dev)

    Best Aromas: Lavender, Lotus, Frankincense

    Benefits: Creativity, relationships, peace

    Use: Aroma candles or flowers in bedroom/study (West)

    3️⃣ North (Wealth – Kuber)

    Best Aromas: Mint, Tulsi, Lemon, Camphor

    Benefits: Wealth, clears blockages, growth

    Use: Camphor or lemon oil diffuser in North zone

    4️⃣ South (Fire Element – Yama / Agni)

    Best Aromas: Cinnamon, Clove, Mogra

    Benefits: Strength, confidence, success

    Use: Spicy aroma diffuser in South zone

    5️⃣ Northeast (Ishaan – Divine Energy)

    Best Aromas: Sandalwood, Camphor, Lotus, Jasmine

    Benefits: Spiritual upliftment, clarity, blessings

    Use: Light camphor/sandalwood incense daily

    6️⃣ Northwest (Air – Vayu Dev)

    Best Aromas: Rose, Lavender, Champa

    Benefits: Strengthens relationships, support

    Use: Mild floral fragrance in bedrooms/meetings

    7️⃣ Southeast (Agni – Fire / Shakti)

    Best Aromas: Cinnamon, Orange, Lemongrass

    Benefits: Financial growth, motivation

    Use: Essential oil diffuser in kitchen/dining

    8️⃣ Southwest (Stability – Pitru/Ancestors)

    Best Aromas: Musk, Jasmine, Sandalwood

    Benefits: Stability, protection, bonding

    Use: Incense sticks/perfume in master bedroom

  • गौरी तृतीया व्रत आज

    गौरी तृतीया व्रत आज


    माघ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का समय गौरी तृतीया के नाम से पूजा जाता है। सुखी वैवाहिक जीवन के साथ पूर्ण होता है मनोकूल जीवन साथी का आशीर्वाद। गौरी तृतीया का व्रत बहुत ही शुभ एवं पवित्र उत्सव है जो सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए एक विशेष समय है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन देवी गौरी को भगवान शिव का साथ प्राप्त हुआ था और जो भी कुंवारी कन्याएं या विवाहित स्त्रियां इस व्रत को करती हैं उनका जीवन सुख एवं सौभाग्य से भर जाता है। 

    गौरी तृतीया व्रत पूजा 2026

    इस साल माघ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन गौरी तृतीया का व्रत रखा जाता है इस दिन को गौंतरी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इस साल गौरी तृतीया का व्रत 21 जनवरी 2026 को रखा जाएगा। माघ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का आरंभ 20 जनवरी 2026 को मध्य रात्रि 01:43 से होगा और माघ शुक्ल तृतीया तिथि का समापन अगले दिन 21 जनवरी 2026 को रात्रि 01:48 पर होगा। उदया तिथि के अनुसार 21 जनवरी को बुधवार के दिन इस व्रत को रखा जाएगा।

    इस साल गौरी तृतीया व्रत पर कई विशेष योग भी बन रहे होंगे। रवि योग की शुभता का प्रभाव मिलेगा इसके अलावा इस दिन पंचक का प्रभाव भी बना रहने वाला है। कुछ अन्य मुहूर्त इस प्रकार रहेंगे।

    ब्रह्म मुहूर्त का समय: 05:27 से 06:20 तक

    विजय मुहूर्त दोपहर 02:19 से 03:01 तक

    गोधूलि मुहूर्त का समय संध्या 05:49 से 06:15 तक

    रवि योग का समय दोपहर 01:58 से अगले दिन सुबह 07:14 तक

    गौरी तृतीया पूजा विधि

    सौभाग्य का प्रतीक गौरी तृतीया का व्रत स्त्रियों के मध्य बहुत ही लोकप्रिय रहा है। प्राचीन काल से ही इस व्रत को किया जा रहा है। माघ माह का समय अत्यंत ही शुभ एवं पुत्र समय माना गया है और इस माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि बहुत ही खास माना गया है। इस दिन देवी गौरी के साथ भगवान शिव का पूजन किया जाता है जिसके प्रभाव से भक्तों को विशेष सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। गौरी तृतीया की पूजा का आरंभ प्रात:काल से होता है। स्नान इत्यादि कार्यों से निवृत्त होकर पूजा स्थल पर देवी गोरी एवं भगवान शिव की प्रतिमाओं को स्थापित किया जाता है। पुष्प, धूप, दीप, अक्षत एवं अन्य पूजा सामग्री को भगवान को अर्पित करते हुए पूजा आरंभ की जाती है। देवी को श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करते हैं एवं विभिन्न प्रकार के मिष्ठान एवं भोग पदार्थों को अर्पित किया जाता है। इस दिन गौरी तृतीया व्रत की कथा को करते हैं एवं भगवान शिव एवं देवी पार्वती का एक साथ पूजन एवं आरती करते हुए पूजा संपन्न की जाती है।

    गौरी तृतीया पूजा पौराणिक महत्व

    गोरी तृतीया की पूजा को सौभाग्यवती स्त्रियां अपने सुहाग की लंबी उम्र की कामना हेतु करती हैं। अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद पाने की कामना से हर महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं और भक्ति भाव के साथ इस दिन को मनाती हैं। कुछ स्थानों पर इस दिन को निर्जला व्रत के रूप में भी रखा जाता है। कुंवारी कन्याएं भी अपने जीवन में सुख दांपत्य जीवन की कामना के लिए इस व्रत को करती हैं। मान्यताओं के अनुसार इस दिन को प्रेम जीवन की शुभता के लिए बहुत ही खास समय भी माना गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी और भगवान ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी जीवनसंगिनी होने का आशीर्वाद प्रदान किया था अत: देवी को जिस प्रकार अपने प्रेम का सुख प्राप्त हुआ उसी प्रकार हर भक्त को अपने जीवन का सुख प्राप्त होता है। सच्चे मन एवं भक्ति भाव से रखा गया गौरी तृतीया आ व्रत कभी निष्फल नहीं जाता है।

    गौरी तृतीया पूजा का ज्योतिष अनुसार प्रभाव

    • गोरी तृतीया का व्रत सुख समृद्धि को देने वाला एवं मनोकामनाओं को पूर्ण करने का वाला होता है। धार्मिक कथाओं एवं ज्योतिष शास्त्र में भी इस व्रत की महिमा बहुत ही उल्लेखनीय मानी गई है। इस व्रत के प्रभाव से विवाह विलंब के योग समाप्त हो जाते हैं। वैवाहिक जीवन में चल रही उथल – पुथल भी दूर होती है। किसी भी तरह का अलगाव यदि जीवन साथी से बन गया है तो वह भी इस दिन किए जाने वाले व्रत एवं पूजन के प्रभाव से शांत हो जाता है।
    • ज्योतिष शास्त्र में विवाह भाव की पीड़ा की शांति के लिए गौरी तृतीया का पूजन बहुत शुभ माना जाता है। जन्म कुंडली में बनने वाला मांगलिक दोष या मंगल के दुष्प्रभाव की शांति भी गौरी तृतीया पूजन से संभव हो पाती है। विवाह में आ रही किसी भी तरह की बाधा दूर होती है।
    • गौरी तृतीया व्रत का पूजन सुख दांपत्य जीवन को देने के साथ साथ व्यक्ति को संतान सुख एवं वंश वृद्धि का सुख भी प्रदान करता हे। जीवन में आनंद एवं भौतिक सुखों की कोई कमी नहीं रहती है। भक्तों को यह व्रत अनेकों तरह के शुभ फल देने में अत्यंत ही फलदायी माना गया है।

  • पंचांग के २७ योग

    ✨पंचांग के २७ योग✨

    पंचांग में ‘योग’ मुख्य रूप से व्यक्ति के चरित्र, व्यवहार और सामाजिक संबंधों को प्रभावित करता है। यहाँ २७ योगों की सूची और उनके मूल स्वभाव का संक्षिप्त विवरण दिया गया है:

    २७ योग और उनके सामान्य गुणधर्म
    १. विष्कुम्भ (Vishkumbha): प्रभावशाली व्यक्तित्व, लेकिन शत्रुओं से घिरे रहने वाले। (अशुभ माना जाता है)
    २. प्रीति (Preeti): प्रेमपूर्ण स्वभाव, मिलनसार और सुखद जीवन जीने वाले।
    ३. आयुष्मान (Ayushman): दीर्घायु, स्वस्थ और जीवन में सभी सुख प्राप्त करने वाले।
    ४. सौभाग्य (Saubhagya): भाग्यशाली, परोपकारी और सुखी वैवाहिक जीवन वाले।
    ५. शोभन (Shobhana): सुंदर, गुणी और कलाप्रेमी व्यक्तित्व।
    ६. अतिगण्ड (Atiganda): जीवन में संघर्ष और अचानक आने वाली बाधाएं। (अशुभ माना जाता है)
    ७. सुकर्मा (Sukarma): सत्कर्म करने वाले, कार्यकुशल और समाज में सम्मानित।
    ८. धृति (Dhriti): धैर्यवान, स्थिर बुद्धि और विद्वान।
    ९. शूल (Shoola): क्रोधी स्वभाव, साहसी लेकिन कभी-कभी कलह करने वाले। (अशुभ माना जाता है)
    १०. गण्ड (Ganda): स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं और अस्थिरता। (अशुभ माना जाता है)
    ११. वृद्धि (Vriddhi): निरंतर प्रगति करने वाले और व्यापार में सफल।
    १२. ध्रुव (Dhruva): एकाग्र, स्थिर और अपनी बात के पक्के।
    १३. व्याघात (Vyaghata): कार्य में चतुर लेकिन कभी-कभी हिंसक विचार वाले। (अशुभ माना जाता है)
    १४. हर्षण (Harshana): हमेशा प्रसन्न रहने वाले और उत्सव प्रेमी।
    १५. वज्र (Vajra): शारीरिक रूप से शक्तिशाली और शत्रुओं पर विजय पाने वाले। (अशुभ माना जाता है)
    १६. सिद्धि (Siddhi): हर कार्य में निपुण और सफलता प्राप्त करने वाले।
    १७. व्यतिपात (Vyatipata): जीवन में अस्थिरता और अप्रत्याशित घटनाएं। (अत्यंत अशुभ माना जाता है)
    १८. वरीयान (Variyana): श्रेष्ठ, धनवान और विलासी जीवन।
    १९. परिघ (Parigha): बाधाओं को पार करने वाले, लेकिन स्वभाव से जिद्दी। (अशुभ माना जाता है)
    २०. शिव (Shiva): शांत, धार्मिक और मंत्र-शास्त्र के ज्ञाता।
    २१. सिद्ध (Siddha): धार्मिक कार्यों में रुचि और शुद्ध आचरण।
    २२. साध्य (Sadhya): लक्ष्य के प्रति समर्पित और कार्य साधने में निपुण।
    २३. शुभ (Shubha): सत्य बोलने वाले, गुणी और मृदुभाषी।
    २४. शुक्ल (Shukla): शुद्ध अंतःकरण, तेजस्वी और ज्ञानवान।
    २५. ब्रह्म (Brahma): अत्यंत विद्वान, गोपनीय बातों के ज्ञाता और ईमानदार।
    २६. ऐन्द्र (Indra): नेतृत्व क्षमता, धनवान और राजसी ठाठ।
    २७. वैधृति (Vaidhriti): चतुर और साहसी, लेकिन जीवन में उतार-चढ़ाव। (अशुभ माना जाता है।

  • गुप्त नवरात्र

    गुप्त नवरात्र में प्रतिदिन नीचे दिए गए मंत्रो का ज्यादा से ज्यादा जाप करें ।

    1 . “सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते “।।

    2 . “ऊँ जयन्ती मङ्गलाकाली भद्रकाली कपालिनी ।दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते” ।।

    नवरात्र में प्रात: श्रीरामरक्षा स्तोत्र का पाठ करने से हर कार्य सफल होते है,कार्यों के मार्ग में आने वाली समस्त विघ्न बाधाएं शांत होती हैं।
    https://youtu.be/2m5-ESAr9Mk

    www.facebook.com/astroshaliini
    गुप्त नवरात्रि में दिल खोलकर आप अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान पुण्य करें …इन दिनों आपके द्वारा दान पुण्य करने से उसका अक्षय फल प्राप्त होता है । आप प्रतिदिन छोटी कन्याओं को कोई न कोई उपहार अवश्य जी दें । अपने माता पिता, बहन-भाई और पत्नी को भी कोई न कोई उपहार देकर चकित जरुर करते रहें, गरीब और असहाए की मदद करने का मौका तो बिलकुल भी न गवाएं। यकीन मानिये उन सभी के मुख से आपके लिए शुभ वचन निकलते ही रहेंगे ।
    astroshaliini.blogspot.com

  • गुप्तनवरात्र १९ से २७ जनवरी २०२६

    (गुप्तनवरात्र १९ से २७ जनवरी २०२६) हम धीरे धीरे दसमहाविद्याओं को भूल रहे हैं?

    आज की स्थिति को अगर गहराई से देखें तो कारण स्पष्ट दिखते हैं:

    1. बाहरी चमत्कार, भीतरी साधना का अभाव
      दस महाविद्याएँ तत्काल वरदान देने वाली देवियाँ नहीं, बल्कि
      अहंकार, भय, मोह, वासना, अज्ञान को काटने वाली शक्तियाँ हैं।
      आज का मन शॉर्टकट चाहता है —
      रील, वायरल बाबा, त्वरित उपाय —
      जबकि महाविद्याएँ तप, संयम और आत्मचिंतन मांगती हैं।
    2. भय के कारण दूरी
      काली, भैरवी, धूमावती, छिन्नमस्ता —
      इनके रूप सत्य के तीखे रूप हैं।
      आज का समाज सौम्य दिखावा चाहता है,सत्य का प्रचंड दर्शन नहीं।इसलिए लोग इन शक्तियों से डरकर दूर हो गए।
    3. आधुनिक जीवन और मानसिक रोग दस महाविद्याएँ सीधे-सीधे जुड़ी हैं—
      मां काली — मृत्यु का भय हरने वाली
      मां तारा — मानसिक शांति और वाणी की अधिष्ठात्री
      मां भैरवी — रोग, पीड़ा और तप की शक्ति
      मां छिन्नमस्ता — अहंकार का बलिदान
      मां धूमावती — अकेलेपन और अवसाद का सत्य
      मां बगलामुखी — नकारात्मक शक्तियों का स्तंभन
      मां मातंगी — चेतना और वाणी की शुद्धि
      मां कमला — धन और धर्म का संतुलन
      मां षोडशी — प्रेम, आकर्षण और जीवन ऊर्जा
      मां भुवनेश्वरी — प्रकृति और

    पंचतत्त्व की रक्षक
    आज जब हृदय रोग, कैंसर, डिप्रेशन, एंग्ज़ायटी बढ़ रहे हैं —
    क्योंकि हमने प्रकृति, चेतना और साधना तीनों से दूरी बना ली।

    1. सोशल मीडिया के नए “भगवान”
      आज “जो ट्रेंड करे वही सत्य” बन गया है।
      ज्ञान की जगह व्यूज़,
      साधना की जगह सेल्फी,
      और मंत्र की जगह म्यूज़िक।
      दस महाविद्याएँ शोर नहीं करतीं —
      वे अंदर परिवर्तन करती हैं.
    2. जब प्रलय आती है, तब महाविद्या स्मरण होती हैं
      इतिहास गवाह है —
      जब समाज टूटता है, महामारी आती है, युद्ध, रोग, पर्यावरण असंतुलन बढ़ता है —
      तब काली, तारा, भैरवी का स्मरण होता है।
      आज संकेत वही हैं…
      पर हम अब भी भूल में हैं।
      दस महाविद्याएँ आज भी जाग्रत हैं…

    🔱
    🙏जय माता दी🚩

  • शुक्र प्रदोष व्रत

    शुक्र प्रदोष व्रत आज


    हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे शुभ दिन माना जाता है। माघ महीने के कृष्ण पक्ष का पहला प्रदोष व्रत विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह नए साल की शुरुआत और मकर संक्रांति के ठीक बाद आता है। 

    प्रदोष व्रत तिथि और समय

    वैदिक पंचांग के अनुसार, माघ महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 15 जनवरी को रात 8 बजकर 16 मिनट पर शुरू होगी। इस तिथि का समापन 16 जनवरी को रात 10 बजकर 21 मिनट पर होगा। ऐसे में पंचांग को देखते हुए माघ महीने का पहला प्रदोष व्रत दिन शुक्रवार 16 जनवरी को रखा जाएगा।

    प्रदोष व्रत की पूजा विधि

    • सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
    • दिन भर सात्विक रहें और शिव मंत्रों का मन ही मन जाप करें।
    • शाम को सूर्यास्त से करीब 45 मिनट पहले दोबारा स्नान करें।
    • इसके बाद भगवान शिव का गंगाजल, दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक करें।
    • उन्हें बिल्व पत्र, धतूरा, आक के फूल और भस्म अर्पित करें।
    • प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें और अंत में आरती करें।
    • पूजा में हुई सभी गलती के लिए माफी मांगे।

    धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व

    भगवान शिव की विशेष कृपा

    प्रदोष काल में शिव की आराधना करने से विशेष फल प्राप्त होता है। शास्त्रो में जिक्र है कि प्रदोष काल में भगवान शिव भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

    पापों का नाश और पुण्य की प्राप्ति

    प्रदोष व्रत करने से जाने-अनजाने किए गए पापों का नाश होता है। जीवन में पुण्य और शांति की प्राप्ति होती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रदोष व्रत पूजा नियमानुसार करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    प्रदोष व्रत को कष्टों से मुक्ति दिलाने वाला भी माना जाता है

    पुराणों के अनुसार, समुद्र मंथन के समय भगवान शिव ने विष का पान किया था। माना जाता है कि उन्होंने प्रदोष काल में ही विषपान किया था, इसीलिए इस समय शिव पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन व्रत करने से मनुष्य के जीवन से रोग, शोक तथा भय का सर्वनाश होता है। इस व्रत को आर्थिक संकट और परिवारिक कलह से मुक्ति दिलाने वाला भी माना गया है।

    प्रदोष व्रत पूजा से धन, स्वास्थ्य और सफलता से जुड़ी इच्छाएं पूरी होती हैं

    इस व्रत को मनोकामना पूर्ति का व्रत भी कहा जाता है। श्रद्धा और नियमपूर्वक प्रदोष व्रत करने से विवाह और संतान से जुड़ी परेशानियां दूर होती है। प्रदोष व्रत पूजा से धन, स्वास्थ्य और सफलता से जुड़ी इच्छाएं पूरी होती हैं।

    शिव–पार्वती की साथ में आराधना करना अधिक फलदायी होती है

    धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत में भगवान शिव के साथ माता पार्वती की पूजा करने का भी विधान है। जिससे दांपत्य जीवन में जीवनसाथी के साथ रिश्तों में गहराई आती है। परिवार में सुख, शांति और सौहार्द बना रहता है।

    शुक्र प्रदोष व्रत का उपाय

    • शिवलिंग पर जलाभिषेक करें।
    • शिवलिंग पर 108 अक्षत अर्पित करें।
    • शिव-शक्ति पर इत्र अर्पित करें और सफेद मिठाई का भोग लगाएं।
    • प्रदोष काल में एक मुखी घी का दीपक जलाकर शिव स्तोत्र’ का पाठ करें।
    • शाम को किसी जरूरतमंद को चावल, दूध या दही का दान करना अत्यंत शुभ होता है।
    • शिवजी को चंदन, भस्म, बेलपत्र, धतूरा और मदार के फूल अर्पित करें।
    • शिवलिंग पर गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अभिषेक करें।
    • “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें।

  • तिल द्वादशी

    तिल द्वादशी आज


    माघ मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को तिल द्वादशी कहा जाता है। इसे कूर्म द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और तिल के दान का विशेष महत्व है। वर्ष 2026 में यह व्रत मकर संक्रांति के अगले दिन मनाया जाएगा। तिल द्वादशी न केवल आध्यात्मिक शुद्धि का मार्ग है, बल्कि यह दरिद्रता दूर करने और जीवन में सुख-समृद्धि लाने वाला एक अमोघ अवसर भी है।

    तिल द्वादशी 2026: तिथि और मुहूर्त

    वर्ष 2026 में तिल या कूर्म द्वादशी 15 जनवरी, गुरुवार को मनाई जाएगी।
    माघ कृष्ण द्वादशी तिथि आरंभ: 14 जनवरी 2026 को शाम 05:52 बजे से।
    द्वादशी तिथि समाप्त: 15 जनवरी 2026 को रात 08:16 बजे तक।
    उदयातिथि के अनुसार तिल द्वादशी और कूर्म द्वादशी व्रत 15 जनवरी को रखा जाएगा।

    क्यों किया जाता है यह व्रत? जानें महत्व

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के पसीने से हुई है, इसलिए यह उन्हें अत्यंत प्रिय है। महाभारत में उल्लेख है कि इस दिन तिल दान करने वाला व्यक्ति कभी नरक के दर्शन नहीं करता। पद्म पुराण के अनुसार, इस दिन तिल के प्रयोग और दान से जाने-अनजाने में हुए सभी पापों का नाश होता है। तिल द्वादशी पर तिल दान करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को करता है, वह जन्म-जन्मांतर तक रोगों, जैसे कुष्ठ, अंधापन आदि से मुक्त रहता है। 

    रोग और कष्टों से मिलती है मुक्ति

    धर्म शास्त्रों में उल्लेखित है कि तिल द्वादशी का व्रत करने से व्यक्ति को कई जन्मों तक भयानक रोगों जैसे अंधापन, बहरापन, कोढ़ आदि से मुक्ति मिलती है। यह व्रत स्वास्थ्य, लंबी आयु और सदा निरोगी रहने का वरदान देता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। व्रत रखने वाले लोग तिल से बने व्यंजन जैसे तिल के लड्डू, तिल की चिक्की आदि बनाते और दान करते हैं। तिल दान करने से अश्वमेध यज्ञ के बराबर का फल मिलता है।

    पूजा विधि

    इस दिन तिल का छह तरीकों यानी षटतिला से उपयोग करना श्रेष्ठ माना जाता है: स्नान, उबटन, तर्पण, आहुति/हवन, भोजन और दान।

    स्नान: सुबह जल्दी उठकर पानी में गंगाजल और तिल मिलाकर स्नान करें।

    संकल्प: स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।

    पूजन: भगवान विष्णु के माधव रूप की मूर्ति को पंचामृत से अभिषेक कराएं। उन्हें पीले फूल, तुलसी दल, धूप और दीप अर्पित करें।

    मंत्र जाप: पूजा के दौरान ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का निरंतर जाप करें।

    भोग: भगवान को तिल से बने पकवान या तिल और गुड़ के लड्डू का भोग लगाएं।

    दान: पूजा के बाद किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को तिल, कंबल, अनाज या स्वर्ण का दान करना बहुत फलदायी होता है।

    तिल द्वादशी की कथा

    एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मणी भगवान विष्णु की परम भक्त थी और बहुत कठिन व्रत करती थी। उसने दान तो बहुत किया लेकिन कभी अन्न का दान नहीं किया। जब वह वैकुंठ गई, तो उसे वहां रहने के लिए कुटिया तो मिली लेकिन वह खाली थी। तब भगवान ने उसे बताया कि अन्न दान न करने के कारण ऐसा हुआ। तब उस ब्राह्मणी ने देव कन्याओं के कहने पर तिल द्वादशी का व्रत किया और तिल का दान किया, जिससे उसकी कुटिया धन-धान्य से भर गई।

  • षटतिला एकादशी व्रत

    🌷 षटतिला एकादशी व्रत 🌷
    14 जनवरी 2026,बुधवार

    माध् मास के कृष्ण पक्ष { गुजरात एवं महाराष्ट्र के अनुसार पौष मास के कृष्ण पक्ष } की एकादशी को ‘ षटतिला एकादशी’ कहते हैं जो इस बार 14 जनवरी 2026,बुधवार के दिन है🙏

    👉 एकादशी तिथि प्रारम्भ👇

    कल 13 जनवरी 2026, मंगलवार दोपहर 03:17 मिनट से

    👉 एकादशी तिथि समाप्त👇

    14 जनवरी 2026, बुधवार शाम 05:57 मिनट पे

    👉 पारण का समय👇

    15 जनवरी 2026, गुरुवार प्रातः 07:15 से 09:21 तक

    { विशेष : एकादशी का व्रत सूर्य उदय तिथी बुधवार के दिन ही रखें…..🙏 मंगलवार शाम को एवं परसों बुधवार व्रत के दिन खाने में चावल या चावल से बनी हुई चीज वस्तुओं का प्रयोग बिल्कुल भी ना करें 🙏अगर आपने व्रत नहीं रखा है तो भी 🙏

    षटतिला” का अर्थ है
    षट” यानी 6 {छह}
    “तिला” यानी तिल

    कुल मिलाकर 6 प्रकार से तिल के प्रयोग को “षटतिला एकादशी” कहते हैं🙏

    👉 एकादशी व्रत पूजा विधि 👇

    👉”षट्तिला एकादशी” के दिन मनुष्य को भगवान विष्णु के निमित्त व्रत रखना चाहिए। व्रत करने वालों को गंध, पुष्प, धूप दीप, ताम्बूल सहित विष्णु भगवान का षोड्षोपचार से पूजन करना चाहिए। उड़द और तिल मिश्रित खिचड़ी बनाकर भगवान को भोग लगाना चाहिए। रात्रि के समय तिल से 108 बार ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय स्वाहा’ इस मंत्र से हवन करना चाहिए।

    { तिल की उत्पत्ति प्रभु श्री हरि विष्णु के शरीर से हुई है इसीलिए तिल को धार्मिक कार्यों में पवित्र माना जाता है}

    षटतिला एकादशी का व्रत रखने वालों को उस दिन तिल (Sesame) का प्रयोग करना होता है. इस व्रत में तिल का प्रयोग करने से सुख और सौभाग्य बढ़ता है. माघ मास में सर्दी होती है, तिल की तासीर गरम होती है और यह स्वास्थ्यवर्धक भी होता है. इस व्रत में तिल का प्रयोग करने से सेहत भी अच्छी रहती है🙏

    षटतिला एकादशी के दिन तिल का प्रयोग 6 प्रकार से करते हैं. तिल के प्रयोग के बिना षटतिला एकादशी व्रत पूरा नहीं होता है, इसलिए आप भी यदि व्रत रखते हैं, तो इस👇 प्रकार से तिल का प्रयोग करें🙏

    👉 आइए जानते हैं कि “षटतिला एकादशी” व्रत में तिल का छह {6} प्रकार से प्रयोग कैसे करना है

    1. यदि आप षटतिला एकादशी का व्रत रखते हैं, तो उस दिन प्रात:काल में स्नान करने से पूर्व तिल का उबटन शरीर पर लगाएं . उसके बाद ही स्नान करें🙏

    2 . स्नान करने के लिए तिल मिले हुए पानी का प्रयोग करें. इसके लिए आप बाल्टी में पानी भर लें और उसमें तिल मिला दें. फिर स्नान करें.🙏

    3 .षटतिला एकादशी का व्रत रहने वाले व्यक्ति को तिल मिश्रीत जल पीना एवं शरीर में तिल के तेल से मालिश करना चाहिए. ऐसा धार्मिक विधान है. ऐसा करना सेहत के लिए लाभदायक होता है🙏

    4. षटतिला एकादशी व्रत के पूजा के समय भगवान विष्णु को तिल से बने खाद्य पदार्थों का भोग लगाएं . ऐसा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और मनोकामनाओं को पूरा करते हैं. इस दिन व्रत रहने वालों को भी तिल से बने खाद्य पदार्थों को फलाहार में शामिल करना चाहिए 🙏

    5 . भगवान विष्णु की पूजा करते समय तिल से हवन करना चाहिए . इसके लिए आप तिल में गाय का घी मिलाकर हवन कर सकते हैं🙏

    6. षटतिला एकादशी के दिन तिल का दान करना उत्तम माना जाता है .तिल का दान करने से व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है. उसे स्वर्ग में स्थान मिलता है🙏

    👉 माघ माह में तिल 👇

    माघ माह में ‘संकष्टी चतुर्थी, ‘ ‘लोहड़ी”, ‘मकरसंक्रान्ति’ षटतिला एकादशी इन सभी त्यौहारों पर तिल का सर्वाधिक महत्व है। इसके पीछे हैं तिल के विशेष गुण जिनकी बजह से माघ माह में तिल को इतना महत्व दिया जाता है।

    1 .तिल का सेवन हमारे शरीर के लिए बहुत लाभदायक होता है। सर्दियों में तिल व उसके तेल दोनों का ही सेवन करना चाहिए। काले तिल व सफेद तिल दोनों का ही उपयोग औषधीय रूप में भी किया जाता है। तिल का तेल एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है। वाइरस, एजिंग और बैक्टीरिया से शरीर की रक्षा करता है।

    2. ठंड में तिल गुड़ दोनो समान मात्रा में लेकर मिला लें। उसके लड्डू बना लें। प्रतिदिन 2 बार 1-1 लड्डू दूध के साथ खाने से मानसिक दुर्बलता एवं तनाव दूर होते है। शक्ति मिलती है।

    3. कठिन शारीरिक श्रम करने पर सांस फूलना जल्दी बुढ़ापा आना बन्द हो जाता है। इससे चुस्ती व स्फूर्ती बनी रहती है।

    4. तिल व तिल के तेल के सेवन से व सिर में इसकी मालिश करने से न केवल बाल घने और चमकदार होते हैं बल्कि बालों का गिरना भी कम हो जाता है।

    5. प्रतिदिन दो चम्मच काले तिल को चबाकर खाइए और उसके बाद ठंडा पानी पीजिए। इसका नियमित सेवन करने से पुराना बवासीर भी ठीक हो जाता है।

    6 .ठंड में तिल और गुड़ सर्द हवा से बचाता है। जिससे सर्दी, खाँसी जैसे रोग भी दूर रहते हैं

    7. तिल का उपयोग चेहरे पर निखार के लिए भी किया जाता है। तिल को दूध में भिगोकर उसका पेस्ट चेहरे पर लगाने से चेहरे पर प्राकृतिक चमक आती है, और रंग भी निखरता है। इसके अलावा तिल के तेल की मालिश करने से भी त्वचा क्रांतिमय हो जाती है

    ৪. शरीर के किसी भी अंग की त्वचा के जल जाने पर, तिल को पीसकर घी और कपूर के साथ लगाने पर आराम मिलता है, और घाव भी जल्दी ठीक हो जाता है

    9. सूखी खाँसी होने पर तिल को मिश्री व पानी के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है। इसके अलावा तिल के तेल को लहसुन के साथ गर्म करके, गुनगुने रूप में कान में डालने पर कान के दर्द में आराम मिलता है

    🙏 ओम नमो नारायणाय 🙏