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  • ज्योतिष में ‘पाया’

    ज्योतिष में ‘पाया’ (Paya) जन्म कुंडली में चंद्रमा की स्थिति के आधार पर निर्धारित होता है, जो व्यक्ति के जीवन में सफलता, सुख और संघर्ष का संकेत देता है। इसके चार प्रकार हैं: सोने (1,6,11 भाव), चांदी (2,5,9), तांबे (3,7,10) और लौह (4,8,12 भाव) के पाये। चांदी का पाया सबसे शुभ, तांबा सामान्य/शुभ, और सोना-लोहा संघर्षपूर्ण माने जाते हैं। 

    पाया का ज्योतिषीय फल (Result in Jyotish)

    • चांदी का पाया (Silver Paya – सबसे शुभ): जब चंद्रमा दूसरे, पांचवें या नौवें भाव में हो, तो यह पाया अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है। यह व्यक्ति को धन, सफलता, उच्च प्रतिष्ठा, वाहन और सुख-समृद्धि प्रदान करता है।
    • तांबे का पाया (Copper Paya – मध्यम/शुभ): यदि चंद्रमा तीसरे, सातवें या दसवें भाव में स्थित हो, तो यह तांबा पाया है। यह व्यावसायिक सफलता, शुभ कार्यों में सफलता, यात्राओं में लाभ और जीवन में स्थिरता लाता है।
    • सोने का पाया (Gold Paya – संघर्षपूर्ण): चंद्रमा के पहले, छठे या ग्यारहवें भाव में होने पर यह पाया बनता है। यह स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं, शत्रु भय, मानसिक तनाव, अधिक खर्च और पारिवारिक संघर्ष का कारण बन सकता है।
    • लौह पाया (Iron Paya – अशुभ): यदि चंद्रमा चौथे, आठवें या बारहवें भाव में हो, तो लौह पाया होता है। यह अशुभ माना जाता है, जिससे जीवन में मेहनत के बाद भी कम फल, आर्थिक कष्ट और तनाव हो सकता है। 

    पाया निर्धारण और उपाय

    • निर्धारण: जन्म कुंडली में लग्न से चंद्रमा की स्थिति के अनुसार पाया (सोना, चांदी, तांबा, लोहा) गिना जाता है।
    • उपाय: लौह पाये के लिए शनि देव की पूजा करना, उड़द की दाल का दान करना और पशुओं की सेवा करना शुभ फल देता है। सोने के पाये के लिए दान और पूजा-पाठ से दोष कम किया जा सकता है। 
  • 2ND HOUSE LORD

    2ND HOUSE LORDTOPIC: WEALTH MANAGER / FAMILY RESOURCE CONTROLLER = 2ND LORD=====================================================1) 2ND LORD = WEALTH MANAGER / FAMILY RESOURCE CONTROLLER—————————————————–2nd house lord is called:- Wealth Manager- Family Resource ControllerIt shows:- How much money you can earn (earning capacity)- How much wealth you can accumulate and sustain- Capacity to support family/resources—————————————————–2) 2ND HOUSE SIGNIFICATIONS—————————————————–2nd house represents:- Wealth / savings / accumulation- Family / lineage- Speech / words / Vaak Siddhi (speech power)- Face / mouth region- Food / nourishment- Value system (what you consider important/worthy)—————————————————–3) STRONG 2ND LORD—————————————————–If 2nd lord is:- Exalted- In own sign / strong dignity- Well placed- Supported by beneficsThen native generally shows:- Good earning capacity- Better savings stability- Family support improves- Speech becomes effective and respected- Ability to sustain resources increasesIf 2nd lord is strong and also:- Benefics are placed in 2nd house OR- Lagna lord supports/aspects OR- 11th lord supports/aspectsThen:- Wealth handling becomes stronger- Gains and accumulation improve- Speech becomes more impactful—————————————————–4) WEAK 2ND LORD—————————————————–If 2nd lord is:- Debilitated- Combust- Placed in 6/8/12- Afflicted by Saturn/Mars/RahuThen results may include:- Wealth instability / struggle in savings- Family responsibility becomes heavy- Speech may become harsh or less respected- Financial pressure increases—————————————————–5) 2ND HOUSE = FAMILY NAME / STATUS—————————————————–2nd house shows:- Will you uplift your family name or not- Family status and reputation- Your position within family hierarchy—————————————————–6) “KALI ZUBAAN” — SATURN / RAHU IN 2ND HOUSE—————————————————–If Saturn or Rahu influences the 2nd house strongly:- Speech can become harsh, heavy, negative, or extreme- Family harmony can get disturbed- Wealth stability can fluctuate2nd house shows:- Value of your tongue / credibility of your words—————————————————–7) RAHU / KETU EFFECT ON 2ND LORD—————————————————–Rahu–Ketu influence on 2nd lord can create extreme results (good or bad) depending on:- Strength of 2nd lord- House placement (especially 6/8/12)- Overall benefic/malefic influenceA) 2nd lord with Ketu + weak placement (6/8/12, debilitated):- Wrong investments become a repeating pattern- Person does not get proper money/payment for his own work- Money theft / loss / “stolen money” type incidents can repeat in lifeB) 2nd lord exalted with Ketu:Example:Moon is 2nd lord and Ketu is sitting with Moon (Moon strong/exalted):- Wealth can come from places the native never imagined- Sudden benefits like villa, business support, unexpected gifts can happen—————————————————–8) 2ND LORD IN DIFFERENT HOUSES—————————————————–2nd lord in Lagna (1st house):- Self-driven earning- Money through personal effort and identity2nd lord in 2nd house:- Strong wealth accumulation- Strong family resource responsibility- Banking/finance/family-based work possibleMajor highlight:- The stronger the 2nd lord becomes, the more “kanjoos” (stingy) tendency can increase2nd lord in 3rd house:- Earnings through skills, communication, short travels- Writing/communication-based income possible2nd lord in 4th house:- Earnings through property, vehicles, land, transport-related themes2nd lord in 5th house:- Knowledgeable person- Children-related responsibility/concerns may increase- Spending pattern on children may become sensitive2nd lord in 6th house:- Money through service, disputes, problem-solving fields- Lawyer/doctor/CA type themes possible- Struggle + repayment patterns increase2nd lord in 7th house:- Partnership-based income- Money becomes linked with spouse/partnership/business2nd lord in 8th house:- Delayed wealth growth- Limited ancestral financial support- Wealth increases slowly after maturity2nd lord in 9th house:- Fortune-based income- Long-distance/foreign/travel-related gains- Word-of-mouth reputation supports wealth2nd lord in 10th house:- Money through profession, status, fame/public identity2nd lord in 11th house:- Gains increase with networking and consistent efforts- Good earning potential through circles/support system2nd lord in 12th house:- Foreign link / donation / isolation theme- Growth after leaving comfort zone- Expenses rise along with income—————————————————–9) MAIN REMEDY DIRECTION—————————————————–Since 2nd house governs speech + resources, the primary correction path is:- Improve speech discipline- Maintain family dignity through words and actions- Strengthen value system and financial responsibility—————————————————–PRACTICAL OBSERVATIONS—————————————————–Observation 1:- Good astrologer often has 2nd lord connected with Lagna or 11th,or strong 2nd house support.Observation 2:- Rahu with 2nd lord gives benefits AFTER addition/expansion in family- Ketu with 2nd lord gives benefits AFTER loss/separation in family

  • राहु, नौ नक्षत्र और उनसे जुड़ी सावधानियां

    राहु, नौ नक्षत्र और उनसे जुड़ी सावधानियां

    सबसे पहले बात करते हैं राहु के नक्षत्र आर्द्रा की, जाहिर सी बात है कि राहु इस नक्षत्र में होंगे तो अत्यंत बलवान होंगे परंतु एक समस्या है ऐसी स्थिति में जातक के अंदर क्रोध और बात बात पर विवाद करने की संभावना बढ़ जाती है।

    बुध का नक्षत्र है आश्लेषा, इस नक्षत्र की प्रवृत्ति छल, कपट, धोखाधड़ी की है और राहु भी इन्हीं अब के प्रतिनिधित्वकर्ता हैं, अगर आश्लेषा नक्षत्र में राहु हों तो ऐसा जातक कोई अनुचित कार्य, कोई अनुचित वित्तीय सौदा आदि कोई भी ऐसा कार्य करके कानूनी विवाद में फंस सकता है।

    मघा केतु का नक्षत्र है और अत्यंत श्रेष्ठ नक्षत्र है इसमें जो कानूनी विवाद होगा वह गलत कार्य के कारण नहीं बल्कि पैतृक संपत्ति आदि से संबंधित होगा, इस नक्षत्र में यदि राहु बैठे हैं तो हो सकता है कि पैतृक संपत्ति को लेकर जातक किसी कानूनी विवाद में फंस जाए।

    चित्रा, ये मंगल का नक्षत्र है, इस नक्षत्र में भी राहु बैठे हैं तो यह उन लोगों के लिये ज्यादा खतरनाक है जो सरकारी नौकरी में हैं, आपके द्वारा कोई कागजी त्रुटि होना संभव है जिससे आप कानूनी विवाद में फंस सकते हैं।

    स्वाति, ये राहु का ही नक्षत्र है व्यापार और साझेदारी से जुड़ा नक्षत्र है, यहां पर जातक लेनदेन, झूठे आरोप, धोखाधड़ी इत्यादि से कानूनी विवाद में फंस सकते हैं।

    विशाखा, देवगुरु बृहस्पति का नक्षत्र है यहां पर यदि राहु बैठे हैं तो आपको जो समस्या उत्पन्न होगी वह आपके सार्वजनिक अथवा राजनीतिक जीवन के कारण होगी। हो सकता है कि आप सार्वजनिक रूप से कौन विवादित बयान देकर स्वयं को कानूनी विवाद में फंसा बैठें।

    ज्येष्ठा, ये बुध का नक्षत्र है इसमें दो तरह की चीजें सामने आएंगी, यदि आप अपने जीवन काल में फंसते हैं तो दो कारण हो सकते हैं, एक तो किसी गुप्त सम्बन्ध के कारण दूसरा कोई गुप्त सूचना लीक करने के कारण आपके ऊपर कोई आरोप लग सकता है।

    जन्मकुंडली में राहु स्वयं के नक्षत्र शतभिषा में बैठे हों तो यह राहु बहुत बली हैं , यह किसी वरदान से कम नहीं है परंतु यहां भी कानूनी विवाद दो कारणों से हो सकता है कि यदि आप डॉक्टर हैं तो आप पर कोई आरोप लग सकता है और दूसरा कि आप स्वयं किसी एडिक्शन आदि में पड़ जाएं और उसके चलते आपको रिहैब सेंटर आदि में जाना पड़े।

    रेवती नक्षत्र में यदि राहु बैठे हैं तो ये खतरनाक है, ऐसे लोग बड़े तेज तर्रार होते हैं यदि इस नक्षत्र में राहु है तो जातक ऑनलाइन लेनदेन के मामले में फंस सकता है या स्वयं जातक के साथ ही कोई फ्रॉड हो जाए।

    यहां एक बात स्पष्ट करना आवश्यक है कि ऊपर लिखित सभी प्रभाव चाहे यह जन्मकुंडली के किसी भी भाव में बन रहे हों तब भी प्रभावी रहेंगे परंतु यदि कुंडली के तीसरे, छ्ठे या बारहवें भाव में यह स्थिति बन रही हो तब तो यह प्रबल जेल योग बन जाता है, अतः यदि आपकी कुंडली में राहु ऐसे किसी नक्षत्र में स्थित हैं तो आपको अधिक सतर्कता बरतने की आवश्यकता है।

  • बगलामुखी कवच

    बगलामुखी कवच
    Baglamukhi Kavach
    यह बगलामुखी कवच, मात्र कवच ही नही अपितु एक अमोघ कवच है, इस कवच का नित्य पाठ करने से साधक पूर्ण रूप से सुरक्षित रहता है, उस पर किसी भी तरह का कोई तांत्रिक प्रयोग नही हो सकता, पीले आसन पर बैठ कर इस कवच का पाठ करे।

    अथ माँ बगलामुखी कवच प्रारभ्यते
    श्रुत्वा च बगला पूजां स्तोत्रं चापि महेश्वर ।
    इदानीं श्रोतुमिच्छामि कवचं वद मे प्रभो ॥
    वैरिनाशकरं दिव्यं सर्वाऽशुभविनाशकम् ।
    शुभदं स्मरणात्पुण्यं त्राहि मां दु:ख-नाशनम् ॥
    ॥ श्री भैरव उवाच ॥
    कवच श्रृणु वक्ष्यामि भैरवि । प्राणवल्लभम् ।
    पठित्वा धारयित्वा तु त्रैलोक्ये विजयी भवेत् ॥
    विनियोग:
    ॐ अस्य श्री बगलामुखीकवचस्य नारद ऋषि: अनुष्टुप्छन्द: श्रीबगलामुखी देवता ।
    ह्रीं बीजम्। ऐं कीलकम्। पुरुषार्थचतुष्टयसिद्धये जपे विनियोग: ॥
    ॥ अथ कवचम् ॥
    शिरो मे बागला पातु ह्रदयैकक्षरी परा ।
    ॐ ह्रीं ॐ मे ललाटे च बगला वैरिनाशिनी ॥
    गदाहस्ता सदा पातु मुखं मे मोक्षदायिनी ।
    वैरि जिह्राधरा पातु कण्ठं मे बगलामुखी ॥
    उदरं नाभिदेंश च पातु नित्यं परात्परा ।
    परात्परतरा पातु मम गुह्रं सुरेश्वरी ॥
    हस्तौ चैव तथा पादौ पार्वती परिपातु मे ।
    विवादे विषमे घोरे संग्रामे रिपुसंकटे ॥
    पीताम्बरधरा पातु सर्वांगं शिवंनर्तकी ।
    श्रीविद्या समयं पातु मातंगी पूरिता शिवा ॥
    पातु पुत्रीं सूतञचैव कलत्रं कलिका मम ।
    पातु नित्यं भ्रातरं मे पितरं शूलिनी सदा ॥
    रंध्रं हि बगलादेव्या: कवचं सन्मुखोदितम् ।
    न वै देयममुख्याय सर्वसिद्धि प्रदायकम् ॥
    पठनाद्धारणादस्य पूजनादवांछितं लभेत् ।
    इंद कवचमज्ञात्वा यो जपेद् बगलामुखीय ॥
    पिबन्ति शोणितं तस्य योगिन्य: प्राप्य सादरा: ।
    वश्ये चाकर्षणे चैव मारणे मोहने तथा ॥
    महाभये विपतौ च पठेद्वरा पाठयेतु य: ।
    तस्य सर्वार्थसिद्धि: । स्याद् भक्तियुक्तस्य पार्वति ॥
    ॥ इति श्रीरुद्रयामले माँ बगलामुखी कवच सम्पूर्णम् ॥
    माँ बगलामुखी कवच के लाभ:
    माँ बगलामुखी को दस महाविधाओं में आठवीं महाविधा के रूप में जाना जाता हैं। यह कवच एक शक्तिशाली कवच है, इस बगलामुखी कवच का पाठ करने से आपको अपने शत्रुओं के बुरे इरादों से सुरक्षा प्रदान होती है। यदि आपका कोई शत्रु आपको हानि पहुंचाने की कोशिश कर रहा है, आपके धन की बर्बादी कर रहा है, आपको जुआ, शराब, सिगरेट आदि जैसी बुरी आदतों में डालने की कोशिश कर रहा है, तो ऐसे में, आपको माँ बगलामुखी कवच का पाठ अवश्य ही करना चाहिए। यह कवच शत्रु समस्या का निवारण करता है। यदि आप किसी लड़ाई-झगड़े या जमीन-जायदाद से संबंधित कोर्ट केस में फँसे हुए है, जिससे आप छुटकारा पाना चाहते है परंतु आपका केस बंद नहीं हो रहा है।

    आप पर झूठे आरोप लगाएँ जा रहे है, तो ऐसे में आपको बगलामुखी कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए। इस कवच का पाठ करने से कोर्ट केस, पुलिस केस, जैसी समस्या धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है और आपको विजय प्राप्त होती है। आज के युग में, कुछ लोग आपको नुकसान पहुँचाने के इरादे से आप पर टोना-टोटका, काला जादू का प्रयोग करते हैं, ऐसे में, यदि आप माँ बगलामुखी कवच का पाठ करने के साथ-साथ बगलामुखी गुटिका धारण करते है, तो समस्त बुरी शक्तियां, टोना-टोटका, काला-जादू, वशीकरण आदि से आपकी रक्षा होती है। प्रत्येक व्यक्ति को चाहिये, कि वे नित्य पूजा में बगलामुखी कवच का पाठ अवश्य करें, जिससे उसे महाविधा बगलामुखी की अपार कृपा प्राप्त हो सके।

  • वल्गा सूक्त

    वल्गा सूक्त (Valga Suktam) एक अत्यंत शक्तिशाली वैदिक स्तोत्र है, जिसका उपयोग नकारात्मक ऊर्जा, तंत्र-मंत्र, शत्रुबाधा और नजरदोष को दूर करने के लिए किया जाता है। इस सूक्त के ११ श्लोक हैं, जो शत्रुओं द्वारा की गई मारण, मोहन, उच्चाटन जैसी क्रियाओं के प्रभाव को वापस भेजने (प्रतिहरामि ताम्) की प्रार्थना करते हैं। यह स्तोत्र मुख्य रूप से मां बगलामुखी से संबंधित माना जाता है। 

    अथर्व-वेदोक्त वल्गा-सूक्त

    ॐ नम: शिवाय

    यां ते चक्रुरामे पात्रे, यां चक्रुर्मिक्ष-धान्यके। 

    आमे मांसे कृत्यां यां चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।१ 

    यां ते चक्रुः वृक-वाका, वजे वा यां कुरीरिणि। 

    अव्यां ते कृत्यां यां चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।२ 

    यां ते चक्रुरेक-शफे, पशूनामुभयादति।

     गर्दभे कृत्यां यां चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।३ 

    यां ते चक्रुरमूलायां, वलगं वा नराच्याम्।

     क्षेत्रे ते कृत्यां यां चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।४ 

    यां ते चक्रुर्गार्हपत्ये, पूर्वाग्नावुत दुश्चितः। 

    शालायां कृत्यां यां चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।५ 

    यां ते चक्रुः सभायां, यां चक्रुरधिदेवते। 

    अक्षेषु कृत्यां यां चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।६ 

    यां ते चक्रुः, सेनायां, यां चक्रुरिष्वायुधे। 

    दुन्दुभौ कृत्यां यां चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।७ 

    यां ते कृत्यां कूपे वदधुः, श्मशाने वा निचख्नुः। 

    सद्मनि कृत्यां या चक्रुः, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।८

     यां ते चक्रुः पुरुषस्यास्थे, अग्नौ संकसुके च याम्। 

    म्रोकं निर्दाहं क्रव्यादं, पुनः प्रति-हरामि ताम्।।९

     अपर्थनाज-भारैणा, तां पथेतः प्रहिण्मसि।

     अधीरो मर्या धीरेभ्यः, संजभाराचित्या।।१० 

    यश्चकार न शशाक, कर्तु शश्रे पादमङ्गुरिम्। 

    चकार भद्रमस्मभ्यमभगो भगचद्भ्यः।।११ 

    कृत्यां कृतं वलगिनं, मूलिनं शपथेऽप्ययम्।

     इन्द्रस्तं हन्तुमहता, बधेनाग्निर्विध्यत्वस्तया।।१२ 

    भावार्थ-तुम्हारे लिए क्रीडा में, पात्र में, मिले हुए अनाज में जो कृत्या की गई है, कच्चे मांस में जो कृत्या की गई है, उसको मैं दूर करता हूँ। वृक-वाक (बगुले) में, बाज में, बकरे में, जो तुम्हारे लिए कृत्या की गई है, उसको मैं दूर करता हूँ। तुम्हारे लिए मछली में, पशुओं में, दोनों में, गदहे में जो कृत्या की गई है, उसको मैं दूर करता हूँ। जो तुम्हारे लिए आकाश-बौर में, खेत में, वगला-सूक्त द्वारा वानराची में, खेत में, जो कृत्या की गई है, उसको मैं दूर करता हूँ। जो तुम्हारे लिए सभा में, प्रतियोगिता में, जुआँ-पासे में कृत्या की गई है, उसको मैं दूर करता हूँ। जो तुम्हारे लिए सेना में, बाणों में, शस्त्रों में, रण-भेरियों में कृत्या की गई है, उसको मैं दूर करता हूँ। जो तुम्हारे लिए कुएँ में, बध्य-शाला में, श्मशान में, भवन में कृत्या निक्षिप्त की गई है, उसको मैं दूर करता हूँ। पुरुष की हड्डी में, अग्नि में, शलाका में तुम्हारे लिए जो कृत्या निक्षिप्त है, उस अशीर्ण, अदिग्ध, मांस-भक्षी कृत्या को मैं दूर करता हूँ। अमार्ग में, अभिमन्त्रित जल में, गठरी में स्थापित कर, जो कृत्या तुम्हारे लिए अभिप्रेरित हुई है, उसको ज्ञान द्वारा और अधीरों द्वारा स्थापित को मैं धीरता से दूर करता हूँ। जिसने कृत्या किया है, वह प्रौहणशील इन्द्रिय-चरण औठ अँगुली में कृत्या करने में समर्थ नहीं हुआ। वह अभागा है, भगवद्-दया से हमारा कल्याण हो। उस बगलामुखी की कृत्या करनेवाले उपासक को हम शपथ देते हैं, इन्द्र उसे महान् वध द्वारा समाप्त करे, अग्नि उसकी कृत्या को जला डाले।

    विधि- उक्त वेदोक्त वलगा-सूक्त कृत्या-निवारण के लिए अपूर्व है। यह ब्रह्मास्त्र, ब्रह्म-विद्या है। भयङ्कर रोग या दर्द में जब अच्छे से अच्छा वैद्य की दवा भी लाभ-प्रद न हो, तब इस सूक्त के ग्यारह पाठ करे। हो सके, तो हल्दी से न्यास करे अथवा पीले करवीर के ११ पुष्पों से झाड़ें। ऐसा तीन बार करे। सभी व्याधियों में यह अनुभूत बतलाया गया है।

  • D-20 (Vimshamsha)


    D-20 (Vimshamsha) chart is the most important divisional chart for spirituality, mantra siddhi, bhakti, sadhana, and inner growth. I’ll explain it step-by-step, the way a practicing astrologer actually reads it.
     STEP 1: Confirm the Purpose of D-20
    Before analysis, be clear:
    D-20 answers:
    Spiritual inclination or disinterest
    Type of spiritual path (bhakti, tantra, mantra, gyana, karma)
    Guru–disciple blessings
    Mantra siddhi, meditation success
    Obstacles in sadhana
    Past-life spiritual sanskaras
     Never use D-20 for material matters (job, marriage, money).
     STEP 2: Check the Lagna of D-20
    The D-20 Lagna shows:
    Soul’s spiritual orientation
    Natural faith level
    Inner discipline
    Interpretation:
    Fire signs (Aries, Leo, Sagittarius) → Tapasya, mantra, discipline
    Water signs (Cancer, Scorpio, Pisces) → Bhakti, devotion, surrender
    Air signs (Gemini, Libra, Aquarius) → Gyana, philosophy, study
    Earth signs (Taurus, Virgo, Capricorn) → Rituals, karma yoga, seva
    易 Strong Lagna = strong spiritual foundation.
     STEP 3: Analyze Lagna Lord
    Very important.
    Ask:
    Where is Lagna lord placed?
    Which house?
    Which sign?
    Is it benefic/malefic?
    Is it exalted, debilitated, combust, retro?
    Results:
    Lagna lord in Kendra/Trikona → Natural spiritual strength
    Lagna lord in 6/8/12 → Intense tapasya after struggle
    Afflicted Lagna lord → Faith crisis, breaks in sadhana
     STEP 4: Examine 5th House (Mantra & Past Life Punya)
    The most powerful house in D-20.
    Check:
    5th lord strength
    Planets in 5th
    Aspect on 5th house
    Indicators:
    Jupiter/Venus/Moon in 5th → Mantra siddhi
    Sun in 5th → Guru kripa
    Rahu/Ketu in 5th → Tantra / occult / unconventional path
    Afflicted 5th → Mantra breaks, lack of focus
     STEP 5: Analyze 9th House (Guru & Blessings)
    The house of Guru and divine grace.
    Strong 9th = easy spiritual progress
    Weak 9th = effort without guidance
    Look for:
    Jupiter influence
    Sun’s dignity
    Benefic aspects
    ⚠️ If 9th lord is weak or afflicted, person changes gurus frequently.
     STEP 6: Study Jupiter (Spiritual Karaka)
    Jupiter is king of D-20.
    Judge:
    Sign strength
    House placement
    Conjunctions
    Meaning:
    Strong Jupiter → True faith + right path
    Afflicted Jupiter → False guru, blind belief
    Jupiter in 12th → Moksha-oriented soul
     STEP 7: Analyze Ketu (Moksha Karaka)
    Ketu shows:
    Past-life spiritual mastery
    Detachment
    Siddhi potential
    Placement:
    Ketu in Lagna/5th/9th/12th → Advanced soul
    Ketu with Jupiter → Rare yogi combination
    Afflicted Ketu → Confusion, escapism
     STEP 8: Check 12th House (Liberation)
    12th shows:
    Renunciation
    Isolation for sadhana
    Moksha desire
    Strong 12th:
    Deep meditation
    Silent practices
    Spiritual retreats
    Afflicted 12th:
    Escapism, pseudo-spirituality
     STEP 9: Identify Spiritual Yogas
    Look for:
    Jupiter–Ketu conjunction
    Moon–Jupiter (Gajakesari)
    Strong 5th–9th connection
    Multiple planets in trines
    These show high spiritual maturity.
     STEP 10: Correlate with D-1 & D-9
    D-20 never works alone.
    Confirm with:
    D-1 → General life support
    D-9 → Dharma strength
    D-20 → Spiritual execution
    If all three support → real spiritual growth.
     FINAL ASTRO TIP
    D-20 does not promise enlightenment
    It shows capacity + effort needed
    Even difficult D-20 gives great siddhi after struggle.

  • पढ़ाई

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    Education

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    पढ़ाई

    शास्त्रानुसार जब आपका सूर्य स्वर (दायां स्वर) नासिका चल रहा हो, अर्थात ( नाक के दाहिने हिस्से से साँस ले रहे हो ) तब कठिन विषय का अध्ययन करें,इस उपाय से मुश्किल से मुश्किल पाठ भी शीघ्र याद हो जाता है।
    astroshalini1@gmail.com
    विद्यार्थियों के कमरे में दीवार पर नीम की डाली लगनी चाहिए इससे कमरे में शुद्ध हवा के साथ साथ सकारात्मक उर्जा का भी प्रभाव बना रहता है ।

    भगवान गणोश जी को हर बुधवार के दिन दूर्वा चढ़ाने से बच्चों में कुशाग्र बुद्धि विकसित होती है।
    Astroshaliini.blogspot.com
    परीक्षा में जाने से पूर्व मीठे दही पर तुलसी के पत्ते रखकर ग्रहण करके घर से निकलें।

    www.astroshalini.com

    सिर व गर्दन के पीछे बीच में मेडुला नाड़ी होती है। इस पर अंगुली से 3-4 मिनट मालिश करें। इससे एकाग्रता बढ़ती है और पढ़ा हुआ याद रहता है।

    उत्तर दिशा में मुंह करके पिरामिड की आकृति की टोपी पहनकर पढ़ाई करने से पढ़ा हुआ बहुत शीघ्र याद होता है। टोपी, कागज, गत्ता या मोटे कपड़े की बनाई जा सकती है।
    Astroshaliini.wordpress.com
    125 ग्राम बादाम और 125 ग्राम सौंफ को मिलाकर बारीक़ कूट लें । इसको प्रतिदिन एक तोला रात में सोते समय पानी के साथ ले लें । शरीर स्वस्थ रहेगा दिमाग और नज़र दोनों ही तेज़ होते है ।

    किसी शुभ मुहूर्त में लाल सुलेमानी हक़ीक को धारण करने से भी दिमाग तेज़ होता है …निर्णय लेने में आसानी रहती है ।
    astroshaliini.wordpress.com
    बच्चो की पड़ाई में सफलता के लिए शुक्ल पक्ष के ब्रहस्पतिवार को सवा मीटर पीले कपड़े में 2 किलो चने की दाल बांधकर किसी भी लक्ष्मी नारायण मंदिर में दे आयें और प्रभु से अपने बच्चो की शिक्षा में सर्वश्रेष्ठ सफलता के लिए प्रार्थना करें । ऐसा लगातार 5 ब्रहस्पतिवार को अवश्य ही करें
    9910057645📲☎

  • षोडश वर्ग अध्ययन

    षोडश वर्ग अध्ययन

    षोडश वर्ग का फलित ज्योतिष में विशेष महत्व है। जन्मपत्री का सूक्ष्म अध्ययन करने में यह विशेष सहायक है। इन वर्गों के अध्ययन के बिना जन्मकुंडली का विश्लेषण अधूरा होता है क्योंकि जन्म कुण्डली से केवल जातक के शरीर, उसकी संरचना एवं स्वास्थ्य के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है, लेकिन षोडश वर्ग का प्रत्येक वर्ग जातक के जीवन के एक विशिष्ट कारकत्व या घटना के अध्ययन में सहायक होता है। जातक के जीवन के जिस पहलू के बारे में हम जानना चाहते हैं उस पहलू के वर्ग का जब तक हम अध्ययन न करें तो विश्लेषण अधूरा ही रहता है।

    जैसे यदि जातक की सम्पत्ति, संपन्नता आदि के विषय में जानना हो, तो जरूरी है कि होरा वर्ग का अध्ययन किया जाए।

    इसी प्रकार व्यवसाय के बारे में पूर्ण जानकारी के लिए दशमांश की सहायता ली जाए।

    वर्ग क्या है ? वर्ग वास्तव में गहो और लग्न का सूक्ष्म विभाजन है। यह इसलिए भी आवश्यक है की एक लग्न मे कई जातक जन्म लेते है। लेकिन हर एक का गुण, शरीर, धन, पराक्रम, सुख, बुद्धि, भार्या, भाग्य एक सा नही होता। अतः यही जानने के लिए वर्ग बनाये जाते है। एक राशि 30 अंशो की होती है इसके सूक्ष्म विभाजन करने पर कुल सोलह वर्ग बनते है। इनके नाम इस प्रकार है :- 01 लग्न, 02 होरा, 03 द्रेष्काण, 04 चतुर्थांश, 05 सप्तमांश, 06 नवमांश, 07 दशांश, 08 द्वादशंश, 09 षोडशांश, 10 विशांश, 11 चतुर्विंशांश, 12 त्रिशांश, 13 खवेदांश, 14 अक्षवेदांश, 15 भांश, 16 षष्टयांश (1 / 60)

    षट्वर्ग : लग्न, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश, त्रिशांश ये छः वर्ग होते है।
    सप्तवर्ग : उपरोक्त षट्वर्ग मे सप्तांश जोड़ देने पर सप्तवर्ग हो जाते है।
    दसवर्ग : उपरोक्त सप्तवर्ग मे दशांश, षोड़शांश, षष्टयांश जोड़ देने पर दस वर्ग होते है।

    जातक के जीवन के विभिन्न पहलुओं को जानने के लिए किसी विशेष वर्ग का अध्ययन किए बिना फलित गणना में चूक हो सकती है। षोडश वर्ग में सोलह वर्ग होते हैं जो जातक के जीवन के विभिन्न पहलुओं की जानकरी देते हैं। जैसे –

    होरा से सम्पत्ति व समृद्धि;
    द्रेष्काण से भाई-बहन, पराक्रम,
    चतुर्थांश से भाग्य, चल एवं अचल सम्पत्ति,
    सप्तांश से संतान,
    नवांश से वैवाहिक जीवन व जीवन साथी,
    दशांश से व्यवसाय व जीवन में उपलब्धियां,
    द्वादशांश से माता-पिता,
    षोडशांश से सवारी एवं सामान्य खुशियां,
    विंशांश से पूजा-उपासना और आशीर्वाद,
    चतुर्विंशांश से विद्या, शिक्षा, दीक्षा, ज्ञान आदि,
    सप्तविंशांश से बल एवं दुर्बलता,
    त्रिशांश से दुःख, तकलीफ, दुर्घटना, अनिष्ट;
    खवेदांश से शुभ या अशुभ फलों,
    अक्षवेदांश से जातक का चरित्र,
    षष्ट्यांश से जीवन के सामान्य शुभ-अशुभ फल आदि अनेक पहलुओं का सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है।
    षोडश वर्ग में सोलह वर्ग ही होते हैं, लेकिन इनके अतिरिक्त और चार वर्ग पंचमांश, षष्ट्यांश, अष्टमांश, और एकादशांश होते हैं।

    पंचमांश से जातक की आध्यात्मिक प्रवृत्ति, पूर्व जन्मों के पुण्य एवं संचित कर्मों की जानकारी प्राप्त होता है।
    षष्ट्यांश से जातक के स्वास्थ्य, रोग के प्रति अवरोधक शक्ति, ऋण, झगड़े आदि का विवेचन किया जाता है।
    एकादशांश जातक के बिना प्रयास के धन लाभ को दर्शाता है। यह वर्ग पैतृक सम्पत्ति, शेयर, सट्टे आदि के द्वारा स्थायी धन की प्राप्ति की जानकारी देता है।

    अष्टमांश से जातक की आयु एवं आयुर्दाय के विषय में जानकारी मिलती है।

    षोडश वर्ग में सभी वर्ग महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आज के युग में जातक धन, पराक्रम, भाई-बहनों से विवाद, रोग, संतान वैवाहिक जीवन, साझेदारी, व्यवसाय, माता-पिता और जीवन में आने वाले संकटों के बारे में अधिक प्रश्न करता है।
    इन प्रश्नों के विश्लेषण के लिए सात वर्ग
    होरा, द्रेष्काण, सप्तांश, नवांश, दशमांश, द्वादशांश और त्रिशांश ही पर्याप्त हैं।
    होरादि सात वर्गों का फलित में प्रयोग

    होरा: जन्म कुंडली की प्रत्येक राशि के दो समान भाग कर सिद्धांतानुसार जो वर्ग बनता है होरा कहलाता है। इससे जातक के धन से संबंधित पहलू का अध्ययन किया जाता है।

    होरा में दो ही लग्न होते हैं –
    सूर्य का अर्थात् सिंह और चंद्र का अर्थात् कर्क। ग्रह या तो चंद्र होरा में रहते हैं या सूर्य होरा में। बृहत पाराशर होराशास्त्र के अनुसार गुरु, सूर्य एवं मंगल सूर्य की होरा में और चंद्र, शुक्र एवं शनि चंद्र की होरा में अच्छा फल देते हैं। बुध दोनोें होराओं में फलदायक है। यदि सभी ग्रह अपनी शुभ होरा में हो तो जातक को धन संबंधी समस्याएं कभी नहीं आएंगी और वह धनी होगा। यदि कुछ ग्रह शुभ और कुछ अशुभ होरा में होंगे तो फल मध्यम और यदि ग्रह अशुभ होरा में होंगे तो जातक निर्धन होता है।

    द्रेष्काण: जन्म कुंडली की प्रत्येक राशि के तीन समान भाग कर सिद्धांतानुसार जो वर्ग बनता है वह दे्रष्काण कहलाता है। दूसरे शब्दों में यह कुण्डली का तीसरा भाग है। द्रेष्कोण जातक के भाई-बहन से सुख, परस्पर संबंध, पराक्रम के बारे में जानकारी के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त इससे जातक की मृत्यु का स्वरूप भी मालूम किया जाता है। द्रेष्काण से फलित करते समय लग्न कुंडली के तीसरे भाव के स्वामी, तीसरे भाव के कारक मंगल एवं मंगल से तीसरे स्थित बुध की स्थिति और इसके बल का ध्यान रखना चाहिए। यदि द्रेष्काण कुंडली में संबंधित ग्रह अपने शुभ स्थान पर स्थित है तो जातक को भाई-बहनों से विशेष लाभ होगा और उसके पराक्रम में भी वृद्धि होगी। इसके विपरीत यदि संबंधित ग्रह अपने अशुभ द्रेष्काण में हों तो जातक को अपने भाई-बहनों से किसी प्रकार का सहयोग प्राप्त नहीं होगा। यह भी संभव है कि जातक अपने मां-बाप की एक मात्र संतान हो।

    सप्तांश वर्ग: जन्मकुंडली का सातवां भाग सप्तांश कहलाता है। इससे जातक के संतान सुख की जानकारी मिलती है। जन्मकुंडली में पंचम भाव संतान का भाव माना जाता है। इसलिए पंचमेश पंचम भाव के कारक ग्रह गुरु, गुरु से पंचम स्थित ग्रह और उसके बल का ध्यान रखना चाहिए। सप्तांश वर्ग में संबंधित ग्रह अपने उच्च या शुभ स्थान पर हो तो शुभ फल प्राप्त होता है अर्थात् संतान का सुख प्राप्त होता है। इसके विपरीत अशुभ और नीचस्थ ग्रह जातक को संतानहीन बनाता है या संतान होने पर भी सुख प्राप्त नहीं होता। सप्तांश लग्न और जन्म लग्न दोनों के स्वामियों में परस्पर नैसर्गिक और तात्कालिक मित्रता आवश्यक है।

    नवांश वर्ग: जन्म कुंडली का नौवां भाग नवांश कहलाता है। यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण वर्ग है। इस वर्ग को जन्मकुंडली का पूरक भी समझा जाता है। आमतौर पर नवांश के बिना फलित नहीं किया जाता। यह ग्रहों के बलाबल और जीवन के उतार-चढ़ाव को दर्शाता है। मुख्य रूप से यह वर्ग विवाह और वैवाहिक जीवन में सुख-दुख को दर्शाता है। लग्नकुंडली में जो ग्रह अशुभ स्थिति में हो वह यदि नवांश में शुभ हो तो शुभ फलदायी माना जाता है। यदि ग्रह लग्न और नवांश दोनों में एक ही राशि में हो तो उसे वर्गोत्मता हासिल होती है जो शुभ सूचक है। लग्नेश और नवांशेश दोनों का आपसी संबंध लग्न और नवांश कुंडली में शुभ हो तो जातक का जीवन में विशेष खुशियों से भरा होता है। उसका वैवाहिक जीवन सुखमय होता है और वह हर प्रकार के सुखों को भोगता हुआ जीवन व्यतीत करता है। वर-वधू के कुंडली मिलान में भी नवांश महत्वपूर्ण है। यदि लग्न कुंडलियां आपस में न मिलें, लेकिन नवांश मिल जाएं तो भी विवाह उत्तम माना जाता है और गृहस्थ जीवन आनंदमय रहता है। सप्तमेश, सप्तम् के कारक शुक्र (कन्या की कुंडली में गुरु), शुक्र से सप्तम स्थित ग्रह और उनके बलाबल की नवांश कुंडली में शुभ स्थितियां शुभ फलदायी होती हैं। ऐसा देखा गया है कि लग्न कुंडली में जातक को राजयोग होते हुए भी राजयोग का फल प्राप्त नहीं होता यदि नवांश वर्ग में ग्रहों की स्थिति प्रतिकूल होती है। देखने में जातक संपन्न अवश्य नजर आएगा, लेकिन अंदर से खोखला होता है। वह स्त्री से पेरशान होता है और उसका जीवन संघर्षमय रहता है।

    दशमांश: दशमांश अर्थात् कुण्डली के दसवें भाग से जातक के व्यवसाय की जानकारी प्राप्त होती है। वैसे देखा जाए तो जन्मकुण्डली में दशम भाव जातक का कर्म क्षेत्र अर्थात् व्यवसाय का है। जातक के व्यवसाय में उतार चढ़ाव, स्थिरता आदि की जानकरी प्राप्त करने में दशमांश वर्ग सहायक होता है। यदि दशमेश, दशम भाव में स्थित ग्रह, दशम भाव का कारक बुध और बुध से दशम स्थित ग्रह दशमांशवर्ग में स्थिर राशि में स्थित हों और शुभ ग्रह से युत हों तो व्यवसाय में जातक को सफलता प्राप्त होती है। दशमांश लग्न का स्वामी और लग्नेश दोनों एक ही तत्व राशि के हों, आपस में नैसर्गिक और तात्कालिक मित्रता रखते हों तो व्यवसाय में स्थिरता देते हैं। इसके विपरीत यदि ग्रह दशमांश में चर राशि स्थित और अशुभ ग्रह से युत हो, लग्नेश और दशमांशेश में आपसी विरोध हो तो जातक का व्यवसाय अस्थिर होता है। दशमांश और लग्न कुंडली दोनों में यदि ग्रह शुभ और उच्च कोटि के हो तो जातक को व्यवसाय में उच्च कोटि की सफलता देते हैं।

    द्वादशांश: लग्न कुण्डली का बारहवां भाग द्वादशांश कहलाता है। द्वादशांश से जातक के माता-पिता के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है। लग्नेश और द्वादशांशेश इन दोनों में आपसी मित्रता इस बात का संकेत करती है कि जातक और उसके माता-पिता के आपसी संबंधी अच्छे रहेंगे। इसके विपरीत ग्रह स्थिति से आपसी संबंधों में वैमनस्य बनता है। इसके अतिरिक्त चतुर्थेश और दशमेश यदि द्वादशांश में शुभ स्थित हों तो भी जातक को माता-पिता का पूर्ण सुख प्राप्त होगा, यदि चतुर्थेश और दशमेश दोनों में से एक शुभ और एक अशुभ स्थिति में हो तो जातक के माता-पिता दोनों में से एक का सुख मिलेगा और दूसरे के सुख में अभाव बना रहेगा। इन्हीं भावों के और कारक ग्रहों से चतुर्थ और दशम स्थित ग्रहों और राशियों के स्वामियों की स्थिति भी द्वादशांश में शुभ होनी चाहिए। यदि सभी स्थितियां शुभ हों तो जातक को माता-पिता का पूर्ण सुख और सहयोग प्राप्त होगा अन्यथा नहीं।

    त्रिंशांश: लग्न कुंडली का तीसवां भाग त्रिंशांश कहलाता है। इससे जातक के जीवन में अनिष्टकारी घटनाओं की जानकारी प्राप्त होती है। दुःख, तकलीफ, दुर्घटना, बीमारी, आॅपरेशन आदि सभी का पता इस त्रिंशांश से किया जाता है। त्रिंशांशेश और लग्नेश की त्रिंशांश में शुभ स्थिति जातक को अनिष्ट से दूर रखती है। जातक की कुंडली में तृतीयेश, षष्ठेश, अष्टमेश और द्वादशेश इन सभी ग्रहों की त्रिंशांश में शुभ स्थिति शुभ जातक को स्वस्थ एवं निरोग रखती है और दुर्घटना से बचाती है। इसके विपरीत अशुभ स्थिति में जातक को जीवन भर किसी न किसी अनिष्टता से जूझना पड़ता है।

    इन सात वर्गों की तरह ही अन्य षोड्श वर्ग के वर्गों का विश्लेषण किया जाता है। इन वर्गों का सही विश्लेषण तभी हो सकता है यदि जातक का जन्म समय सही हो, अन्यथा वर्ग गलत होने से फलित भी गलत हो जाएगा। जैसे दो जुड़वां बच्चों के जन्म में तीन-चार मिनट के अंतर में ही जमीन आसमान का आ जाता है, इसी तरह जन्म समय सही न होने से जातक के किसी भी पहलू की सही जानकारी प्राप्त नहीं हो सकती। कई जातकों की कुंडलियां एक सी नजर आती हैं, लेकिन सभी में अंतर वर्गों का ही होता है। यदि वर्गों के विश्लेषण पर विशेष ध्यान दिया जाए तो जुड़वां बच्चों के जीवन के अंतर को समझा जा सकता है। यही कारण है कि हमारे विद्वान महर्षियों ने फलित ज्योतिष की सूक्ष्मता तक पहुंचने के लिए इन षोड्श वर्गों की खोज की और इसका ज्ञान हमें दिया।

  • ज्योतिषशास्त्र के अनुसार व्याधि (बीमारी) निवारण के लिए औषधि(दवाई) लेने का उचित मुहूर्त और रोगी की सेवा करनेवाले सेवक की कुंडली के योग

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    ज्योतिषशास्त्र के अनुसार व्याधि (बीमारी) निवारण के लिए औषधि(दवाई) लेने का उचित मुहूर्त और रोगी की सेवा करनेवाले सेवक की कुंडली के योग

    शीघ्र स्वास्थ्य लाभ हो; इसलिए ज्योतिषशास्त्रानुसार व्याधि से ग्रस्त व्यक्ति को धन्वंतरी देवता को प्रार्थना करके औषधि लेनी चाहिए । औषधि सेवन का आरंभ करते समय यथासंभव आवश्यक नक्षत्र, तिथि और वार का पालन करें । यदि ऐसा करना संभव न हो, तो धन्वंतरी देवता का प्रसाद समझकर औषधि ग्रहण करें । औषधि ग्रहण करते समय ईश्‍वर पर पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए । रोगी (बीमार व्यक्ति) जिसके माध्यम से उपचार करवाता है; उस व्यक्ति का, उदा. वैद्य, परिचारिका (नर्स), साथ में रहनेवाले व्यक्ति इत्यादि के ग्रह पूरक होने पर, रोगी शीघ्र ठीक हो सकता है । यदि रोगी की किसी डॉक्टर पर श्रद्धा होने पर भी अनेक बार उस व्यक्ति की बीमारी में विशेष अंतर नहीं पडता; क्योंकि उनके ग्रह आपस में मेल नहीं खाते हैं । इसके विपरीत अन्य रोगियों को तुरंत आराम मिलता है । इसलिए रोगी को औषधि का सेवन करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और रोगी की सेवा में लगे व्यक्ति के ग्रह कैसे होने चाहिए ? इस विषय में संक्षेप में जानकारी आगे दे रहे हैं ।

    १. औषधि सेवन करने का मुहूर्त

    १ अ. औषधि सेवन करने के आरंभ में कौन-से नक्षत्र होने चाहिए ?

    औषधि सेवन करते समय और श्री गुरु की सेवा करते समय आरंभ में अश्‍विनी, मृग, पुष्य, हस्त, चित्रा, अनुराधा और रेवती, ये नक्षत्र होने चाहिए । औषधि सेवन में जन्मनक्षत्र सर्वथा वर्जित करें ।

    १ आ. सेवा के आरंभ में कौन-सा वार होना चाहिए ?

    सेवा का आरंभ करते समय और औषधि देते समय रविवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार होना चाहिए । इनमें से रविवार बहुत ही शुभ माना जाता है, क्योंकि रवि ग्रह तेजतत्त्व का कारक है । किसी भी प्रकार की औषधि रविवार को लेना आरंभ करने पर रोग प्रतिकारक शक्ति बढती है ।

    १इ. औषधि लेना आरंभ करते समय कौन-सी तिथि होनी चाहिए ?

    औषधि लेते समय शुभ तिथि होनी चाहिए । क्षयतिथि, अमावस्या और पूर्णिमा, ये तिथियां नहीं होनी चाहिए ।

    २. रोगी और उसकी सेवा करनेवाले की कुंडली में क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए ?

    २ अ. सेवक की कुंडली में अशुभ ग्रह न हों !

    सेवक की कुंडली में रवि, चंद्र, बुध और गुरु, ये शुभ ग्रह होने चाहिए । सेवक की कुंडली में अशुभ ग्रह अथवा नीच राशि में होने से रोगी के कष्ट बढने की संभावना अधिक होती है अथवा रोगी को देर से आराम मिलता है; क्योंकि सेवक की कुंडली के ग्रह अशुभ होने से उसका रोगी पर विपरीत परिणाम होता पाया जाता है । (परात्पर गुरू डॉ. आठवले की सेवा में रहने वाले साधकों की कुंडलियां देखकर सेवा देने पर उनके उपचारों को अनुकूलता प्राप्त होगी ।)

    २ आ. ग्रह, ग्रहों की नीच राशि और राशि का अनुक्रमांक

    ग्रहग्रह की नीच राशिराशि का अनुक्रमांक१ . रवितुला७२. चंद्रवृश्‍चिक८३. मंगलकर्क४४. बुधमीन१२५. गुरूमकर१०६. शुक्रकन्या६७. शनिमेष१८. राहुधनु९९. केतुमिथुन३

    २ इ. रोगी और सेवक में ग्रहमित्रता होनी चाहिए !

    ग्रहमित्रता अर्थात दो व्यक्तियों की राशि के स्वामी, मित्र ग्रह होने चाहिए । उदा. रोगी की राशि मकर होने पर उसका राशि स्वामी शनि ग्रह है । शनि ग्रह के मित्र ग्रह, बुध और शुक्र हैं । इसका अर्थ मकर राशि के व्यक्ति की बुध ग्रह से संबंधित (मिथुन और कन्या) राशि और शुक्र ग्रह से संबंधित (वृषभ और तुला) राशियों के व्यक्तियों से ग्रह मित्रता है, इसलिए इस राशि के व्यक्तियों की सेवा अधिक फलदायी होती है, ऐसा अनुभव है । आगे की सारणी में ग्रह, ग्रहानुसार उनकी राशि और ग्रहानुसार ग्रह मित्र दिए हैं ।ग्रहग्रहों की स्वामी राशिमित्र ग्रहरविसिंहचंद्र, मंगल, गुरूचंद्रकर्करवि, बुधमंगलमेष और वृश्‍चिकरवि, गुरू, चंद्रबुधमिथुन और कन्यारवि, शुक्रगुरूधनु और मीनरवि, चंद्र, मंगलशुक्रवृषभ और तुलाबुध, शनीशनिमकर और कुम्भबुध, शुक्र

    २ ई. रोगी के नक्षत्र से सेवक के नक्षत्र दोयम (दूसरी श्रेणी का) नहीं होने चाहिए !

    जिसकी सेवा करनी है उसके नक्षत्र से, सेवा करनेवाले के नक्षत्र दोयम होने पर सेवा व्यर्थ जाती है । (परात्पर गुरू डॉक्टरजी के नक्षत्र उत्तराषाढा’ होने से उनके नक्षत्र से दूसरी श्रेणी का नक्षत्र अर्थात ‘श्रवण’ नक्षत्र होने वाले साधकों को उनकी सेवा नहीं करनी चाहिए ।

  • जया एकादशी व्रत

    जया एकादशी व्रत आज


    धार्मिक मान्यता के अनुसार, जया एकदाशी के दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की साधना करने से साधक के जीवन में आ रहे सभी दुख दूर होते हैं। यह व्रत मानसिक और शारीरिक पवित्रता प्रदान करता है। ऐसा माना जाता है कि व्रत का पारण न करने से शुभ फल प्राप्त नहीं होता है।
    इसलिए द्वादशी तिथि पर व्रत का पारण जरूर करना चाहिए। इससे साधक को व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

    जया एकादशी 2026 डेट और शुभ मुहूर्त

    वैदिक पंचांग के अनुसार, माघ माह में जया एकादशी व्रत किया जाएगा 29 जनवरी को किया जाएगा और व्रत का पारण 30 जनवरी को किया जाएगा।
    माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत- 28 जनवरी को दोपहर 04 बजकर 35 मिनट पर
    माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का समापन- 29 जनवरी को 01 दोपहर 55 मिनट पर

    जया एकादशी 2026 व्रत पारण का टाइम

    द्वादशी तिथि पर ही एकदाशी व्रत का पारण करना चाहिए। 30 जनवरी को व्रत का पारण करने का शुभ मुहूर्त सुबह 07 बजकर 10 मिनट से लेकर सुबह 09 बजकर 20 मिनट तक है। इस दौरान किसी भी समय व्रत का पारण कर सकते हैं।

    जया एकादशी व्रत की विधि

    जया एकदशी व्रत वाले दिन प्रात:काल सूर्योदय से पहले उठ जाएं। इसके बाद तन-मन से पवित्र होने के बाद श्री हरि का ध्यान करते हुए व्रत को विधि-विधान से करने का संकल्प लें। इसके बाद घर के पूजा घर या फिर ईशान कोण में भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करें। एकादशी व्रत की पूजा में श्री हरि को सबसे पहले शुद्ध जल अर्पित करें। इसके बाद उन्हें चंदन, रोली, धूप-दीप, फल-फूल, तुलसी दल, पंचामृत आदि अर्पित करें। इसके बाद जया एकादशी व्रत की कथा कहें या सुने। कथा सुनने के बाद भगवान श्री विष्णु और एकादशी माता की आरती अवश्य करें। पूरे दिन व्रत करने के बाद अगले दिन शुभ मुहूर्त में इसका पारण करें। और भगवान विष्णु से स्वयं तथा अपने परिवार के लिए मंगलकामना करें। 

    जया एकादशी का धार्मिक महत्व

    जया एकादशी का व्रत सभी प्रकार की बाधाओं को दूर करके शत्रुओं पर विजय दिलाता है।
    जया एकादशी व्रत के पुण्य प्रभाव से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है।
    जया एकादशी व्रत को विधि-विधान से करने पर साधक को सुख-सौभाग्य और मोक्ष प्राप्त होता है।
    माघ मास में पड़ने वाली जया एकादशी पर दान करने पर साधक को तीन गुना ज्यादा फल मिलता है।