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  • भौमवती अमावस्या एवं सूर्य ग्रहण :

    भौमवती अमावस्या एवं सूर्य ग्रहण : शास्त्रसम्मत विस्तृत विवेचन

    इस वर्ष भौमवती अमावस्या का पावन पर्व 17 फरवरी, मंगलवार को मनाया जाएगा। मंगलवार को पड़ने वाली अमावस्या को भौमवती अमावस्या कहा जाता है, जो शास्त्रों में अत्यंत दुर्लभ, सिद्धिदायक और महापुण्यकारी मानी गई है।

    🌊 गंगा स्नान का अद्भुत महत्व
    भौमवती अमावस्या के दिन गंगा स्नान का विशेष विधान है।
    शास्त्रों में कहा गया है कि—

    इस दिन गंगा में स्नान करने से
    सौ करोड़ सूर्य ग्रहणों में दान करने के समान पुण्य प्राप्त होता है।

    यदि गंगा स्नान संभव न हो, तो
    निकटवर्ती नदी, तालाब, कुआँ
    अथवा गंगाजल मिश्रित जल से स्नान अवश्य करें।

    यह स्नान पापक्षय, पितृ शांति और ग्रहदोष निवारण में अत्यंत सहायक होता है।

    ☀️ सूर्य ग्रहण को लेकर शास्त्रीय मत
    इस दिन सूर्य ग्रहण अवश्य है, परंतु—
    यह भारत की संपूर्ण भूमि पर दृश्य नहीं होगा
    इसलिए सूतक, दान-नियम या ग्रहण काल की कोई मान्यता नहीं मानी जाएगी
    पूजा-पाठ, जप, स्नान आदि पूर्णतः मान्य रहेंगे
    👉 अतः किसी भी प्रकार के भ्रम या भय से बचें।

    🪔 पितृ दोष, मंगल दोष एवं अन्य ग्रह बाधाओं का निवारण

    भौमवती अमावस्या विशेष रूप से उन जातकों के लिए फलदायी है जिनकी कुंडली में—
    पितृ दोष
    मंगल दोष
    कालसर्प दोष
    ऋण, रोग या दरिद्रता योग
    विद्यमान हों।

    इस दिन किए गए दान, जप, तर्पण और देवी उपासना से दोषों की तीव्रता में भारी कमी आती है।

    🌙 शतभिषा नक्षत्र का दुर्लभ रात्रिकालीन योग
    इस वर्ष भौमवती अमावस्या की रात्रि में शतभिषा नक्षत्र का विशेष संयोग बन रहा है। (रात्रि को लगभग 21:15 के बाद)
    इस योग का उल्लेख मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत दुर्गासप्तशती में अत्यंत स्पष्ट रूप से मिलता है

    “भौमावस्या निशामग्रे चन्द्रे चन्द्रे शतभिषां गते।
    विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां पदम्॥”

    🔍 भावार्थ
    जब भौमवती अमावस्या की अर्धरात्रि में चंद्रमा शतभिषा नक्षत्र में स्थित हो, तब किया गया देवी स्तोत्र-पाठ महान धन, ऐश्वर्य, सुख और सिद्धि प्रदान करने वाला योग बनाता है।

    📿 क्या करें इस शुभ योग में? (सरल उपाय)
    इस विशेष रात्रि में—

    1. स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
    2. देवी दुर्गा का पूजन करें
    3. दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का पाठ करें
    4. संभव हो तो दीपदान अवश्य करें

    🔱 फल
    इस साधना से—
    दैहिक (शारीरिक कष्ट)
    दैविक (ग्रह, भाग्य, अदृश्य बाधाएँ)
    भौतिक (धन, परिवार, समाज)
    👉 तीनों प्रकार के तापों से मुक्ति प्राप्त होती है तथा जीवन में शांति, सुरक्षा और समृद्धि आती है।

    माँ जगदंबा की कृपा से यह भौमवती अमावस्या आप सभी के जीवन में मंगल, आरोग्य और ऐश्वर्य प्रदान करे।

  • भौमवती अमावस्या

    भौमवती अमावस्या


    ज्योतिष शास्त्र में जो 16 तिथियां बताई गई हैं, इनमें से अमावस्या भी एक है। इस तिथि के स्वामी पितृ हैं, इसलिए इसका विशेष महत्व धर्म ग्रंथों में बताया गया है। जब भी किसी महीने की अमावस्या मंगलवार को पड़ती है तो इसे भौमवती अमावस्या कहते हैं। भौम का अर्थ है मंगल ग्रह। भौमवती अमावस्या पितरों के तर्पण, पूजा, उपाय आदि के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।

    कब है भौमवती अमावस्या?

    पंचांग के अनुसार 17 फरवरी को फाल्गुन मास की अमास्या तिथि दिन भर रहेगी। इस दिन मंगलवार होने से ये भौमवती अमावस्या कहलाएगी। खास बात ये है कि इस तिथि सूर्य ग्रहण भी होगा लेकिन भारत में दिखाई न देने के कारण यहां इसका कोई भी महत्व नहीं माना जाएगा। इस दिन कईं शुभ योग भी बनेंगे, जिससे भौमवती अमावस्या का महत्व और भी बढ़ गया है।

    भौमवती अमावस्या 2026 शुभ मुहूर्त

    अमावस्या तिथि पर पवित्र नदी में स्नान करने और जरूरतमंदों को दान करने का विशेष महत्व है। इस दिन स्नान के लिए ब्रह्म मुहूर्त सुबह 05:24 से 06:12 तक रहेगा। इसके बाद अमृत काल सुबह 10:39 से दोपहर 12:17 तक रहेगा। इस दिन अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:18 से 01:03 तक रहेगा।

    भौमवती अमावस्या का महत्व

    भौमवती अमावस्या का महत्व अनेक धर्म ग्रंथों में बताया गया है। जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष है वे यदि इस दिन कुछ खास उपाय करें तो उनके जीवन में चल रही परेशानियां काफी हद तक कम हो सकती है। इसके अलावा भौमवती अमावस्या पर किया गया दान, उपाय, मंत्र जाप आदि का भी कई गुना फल प्राप्त होता है।

    भौमवती अमावस्या पर क्या करें?

    1. जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष हैं वे भौमवती अमावस्या पर अपने घर पर या किसी तीर्थ स्थान पर तर्पण, श्राद्ध आदि करें।
    2. जिन लोगों की जन्म कुंडली में मंगल अशुभ स्थान पर है या मांगलिक दोष है वे इस दिन मंगल ग्रह के उपाय करें तो इनके जीवन में चल रही परेशानी दूर हो सकती है।
    3. भौमवती अमावस्या को दान के लिए भी श्रेष्ठ तिथि माना गया है।
    4. भौमवती अमावस्या पर गाय को हरा चारा खिलाना चाहिए। अगर ऐसा न कर पाएं तो किसी गौशाला में पैसों का दान करें।

  • मंगल और राहु का संघर्षकारी योग

    मंगल और राहु का संघर्षकारी योग
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    ज्योतिष में मंगल को क्रोध, वाद विवाद, लड़ाई झगड़ा, हथियार, दुर्घटना, एक्सीडेंट, अग्नि, विद्युत आदि का कारक ग्रह माना गया है तथा राहु को आकस्मिकता, आकस्मिक घटनाएं, शत्रु, षड़यंत्र, नकारात्मक ऊर्जा, तामसिकता, बुरे विचार, छल, और बुरी आदतों का कारक ग्रह माना गया है, इसलिए फलित ज्योतिष में मंगल और राहु के योग को बाहुत नकारात्मक और उठापटक कराने वाला योग माना गया है मंगल और राहु स्वतंत्र रूप से अलग अलग इतने नाकारात्मक नहीं होते पर जब मंगल और राहु का योग होता है तो इससे मंगल और राहु की नकारात्मक प्रचंडता बहुत बढ़ जाती है जिस कारण यह योग विध्वंसकारी प्रभाव दिखाता है, मंगल राहु का योग प्राकृतिक और सामाजिक उठापटक की स्थिति तो बनाता ही है पर व्यक्तिगत रूप से भी मंगल राहु का योग नकारात्मक परिणाम देने वाला ही होता है।

    यदि जन्मकुंडली में मंगल और राहु एक साथ हो अर्थात कुंडली में मंगल राहु का योग हो तो सर्वप्रथम तो कुंडली के जिस भाव में यह योग बन रहा हो उस भाव को पीड़ित करता है और उस भाव से नियंत्रित होने वाले घटकों में संघर्ष की स्थिति बनी रहती है उदाहरण के लिए यदि कुंडली के लग्न भाव में मंगल राहु का योग हो तो ऐसे में स्वास्थ पक्ष की और से हमेशा कोई न कोई समस्या लगी रहेगी, धन भाव में मंगल राहु का योग होने पर आर्थिक संघर्ष और क़ुतुब के सुख में कमी होगी इसी प्रकार पंचम भाव में मंगल राहु का योग शिक्षा और संतान पक्ष को बाधित करेगा।

    इसके अलावा कुंडली में मंगल राहु का योग होने से व्यक्ति का क्रोध विध्वंसकारी होता है, समान्य रूप से तो प्रत्येक व्यक्ति को क्रोध आता है पर कुंडली में राहु मंगल का योग होने पर व्यक्ति का क्रोध बहुत प्रचंड स्थिति में होता है और व्यक्ति अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं कर पाता और बहुत बार क्रोध में बड़े गलत कदम उठा बैठता है, कुंडली में मंगल राहु का योग होने पर जीवन में दुर्घटनाओं की अधिकता होती है और कई बार दुर्घटना या एक्सीडेंट का सामना करना पड़ता है कुंडली में मंगल राहु का योग होने पर व्यक्ति को वहां चलाने में भी सावधानी बरतनी चाहिए , कुंडली में मंगल राहु का योग होने पर व्यक्ति को शत्रु और विरोधियों की और से भी बहुत समस्याएं रहती है और जीवन में वाद विवाद तथा झगड़ों की अधिकता होती है, कुंडली में मंगल राहु का योग बड़े भाई के सुख में कमी या वैचारिक मतभेद उत्पन्न करता है और मंगल राहु के योग के नकारात्मक परिणाम के कारण ही व्यक्ति को जीवन में कर्ज की समस्या का भी सामना करना पड़ता है, इसके अलावा यदि स्त्री जातक की कुंडली में मंगल राहु का योग हो तो वैवाहिक जीवन को बिगड़ता है स्त्री की कुंडली में मंगल पति और मांगल्य का प्रतिनिधि ग्रह होता है और राहु से पीड़ित होने के कारण ऐसे में पति सुख में कमी या वैवाहिक जीवन में संघर्ष की स्थिति बनी रहती है, जिन लोगो की कुंडली में मंगल राहु का योग होता है उन्हें अक्सर जमीन जायदात से जुडी समस्याएं भी परेशान करती हैं इसके अलावा मंगल राहु का योग हाई बी.पी. मांसपेशियों की समस्या, एसिडिटी, अग्नि और विद्युत दुर्घटना जैसी समस्याएं भी उत्पन्न करता है l

    तो यहाँ हमने देखा की मंगल और राहु का योग किस प्रकार की समस्याएं उत्पन्न करता है यदि कुंडली में मंगल राहु के योग के कारण समस्याएं उत्पन्न हो रही हो तो निम्नलिखित उपाय लाभकारी होंगे –

    सामान्य उपाय
    🔸🔸🔹🔸🔸

    1. ॐ अंग अंगारकाय नमः का नियमित जाप करें।
    2. हनुमान चालीसा का पाठ करें।
    3. प्रत्येक शनिवार को साबुत उडद का दान करें।
    4. प्रत्येक मंगलवार को गाय को गुड़ खिलाएं।
    5. प्रतिदिन मस्तक पर सफ़ेद चन्दन का तिलक लगाएं।

    ।। श्री हनुमते नमः।।

  • शिवरात्रि सरल पूजन विधि-

    🕉️🔱सभी शिव भक्तों को
    पावन व्रत महाशिवरात्रि
    की हार्दिक शुभकामनाएं !

    शिवरात्रि सरल पूजन विधि-
    कल रविवार सुबह नहा धोकर भगवान शिव का पूजन करें, पंचोपचार पूजन करें, फिर शिवरात्रि का व्रत करने का संकल्प लें। संकल्प में स्पष्ट कहें कि व्रत जलाहार, फलाहार या निराहार जैसे रहना हो कहैं।

    दिन भर, नमः शिवाय या ॐ नमः शिवाय। मानसिक जप करते रहें, शाम होने पर फिर से शिवजी का पंचोपचार पूजन करें, फिर रात मे प्रथम प्रहर होने पर शिवजी का पूजन चन्दन चावल काले तिल कमल और कनेर के फूल से करें।
    ॐ भवाय नमः
    ॐ शर्वाय नमः
    ॐ रूद्राय नमः
    ॐ पशुपताय नमः
    ॐ उग्राय नमः
    ॐ महानाय नमः
    ॐ भीमाय नमः
    ॐ ईषानाय नमः
    इन आठ नामो का जाप करें। नैवेध मे पकवान अर्पित करें। नारियल और पान के साथ अर्घ्य दें।
    ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करते रहें।

    दूसरे प्रहर लगने पर शिवजी का तिल जौ कमल पुष्प विल्वपत्र द्वारा पूजन करें। खीर का नैवेद्य प्रदान करें। बिजौरा नीबू के साथ अर्घ्य दें, ॐ नमः शिवाय का प्रथम प्रहर की अपेक्षा दुगना मंत्र जाप करें।

    तीसरे प्रहर होने पर फिर से शिवजी का गेहूं, आक के फूल, कमल पुष्प, विल्वपत्र, तिल द्वारा पूजन करें। पुऐ का नैवेध एवं शाक अर्पित करें। कपूर से आरती करें अनार के फल के साथ अर्घ्य दें। ॐ नमः शिवाय का दूसरे प्रहर की अपेक्षा दुगने मंत्र का जाप करें।

    चतुर्थ प्रहर होने पर शिवजी का उडद, कागनी मूगं, सप्तधान, शंखपुष्पी, विल्वपत्र से पूजा करें। उडद के बडै, मिठाई का नैवेध प्रदान करें। केले के साथ अर्घ्य दें। तीसरे प्रहर की अपेक्षा ॐ नमः शिवाय का आठ गुना मंत्र का जाप करें फिर सुबह होने तक जाप भजन करते रहें। सुबह फिर भगवान शिव का पूजन करें और पूजन का विसर्जन करें तथा क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।

    शिवलिंग पर पूजा करने वाले साधक प्रत्येक पूजा मे शिवलिंग को दूध दही घी शहद शक्कर गंगाजल गन्ना का रस शुद्ध पानी आदि से स्नान कराये या जो सुलभ हो जाये उससे करा लें।

    पूजन मे कोई सामग्री ना मिले तो जो मिल जाये उसी से पूजन करें। प्रथम प्रहर मे जाप उतना ही करें जितने का चौथे प्रहर मे आठ गुना जाप कर सकें।

    किसी कामना के लिये पूजन करना चाहते हैं तो संकल्प में स्पष्ट बोल दें शिव जी की कृपा से वो कामना अवश्य ही शीघ्र पूरी हो जायेगी। प्रत्येक प्रहर मे धूप दीप अवश्य दें। शिवरात्रि का पूजन आप परिवार सहित करें, मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
    🕉️🙏🚩🕉️🙏🚩🕉️🚩

  • महाशिवरात्रि पर्व पर शिवलिंग व जल अर्पण

    महाशिवरात्रि पर्व पर शिवलिंग व जल अर्पण
    🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱
    शास्त्रों में कहा गया है कि शिव कृपा पाने के लिए पूरे नियम से शिवलिंग पर जल अर्पित करना चाहिए क्योंकि जल धारा भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है और नियम से इसे शिवलिंग पर चढ़ाने से भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

    🔹किस दिशा की ओर चढ़ाएं जल-:

    • शिवलिंग पर जल उत्तर दिशा की ओर मुंह करके जल चढ़ाएं क्योंकि उत्तर दिशा को शिव जी का बायां अंग माना जाता है जो माता पार्वती को समर्पित है। इस दिशा की ओर मुंह करके जल अर्पित करने से भगवान शिव और माता पार्वती दोनों की कृपा दृष्टि प्राप्त होती है।

    🔹कौन से पात्र से अर्पित करें जल-:

    • शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय सबसे ज्यादा ध्यान में रखने वाली बात ये है कि आप किस पात्र से जल अर्पित करें। जल चढ़ाने के लिए सबसे अच्छे पात्र तांबे, चांदी और कांसे के माने जाते हैं। स्टील के पात्र से शिवलिंग पर जल नहीं चढ़ाना चाहिए। जल अर्पण के लिए सर्वोत्तम पात्र तांबे का है। इसलिए इसी पात्र से जल चढ़ाना उत्तम है। लेकिन तांबे के पात्र से शिव जी को दूध न चढ़ाएं क्योंकि तांबे में दूध विष के समान बन जाता है।

    🔹कभी भी शिवलिंग पर तेजी से जल नहीं चढ़ाना चाहिए-:

    • शास्त्रों में भी बताया गया है कि शिव जी को जल धारा अत्यंत प्रिय है। इसलिए जल चढ़ाते समय ध्यान रखें कि जल के पात्र से धार बनाते हुए धीरे से जल अर्पित करें। पतली जल धार शिवलिंग पर चढाना ज्यादा उचित रहता है।

    🔹बैठकर चढ़ाएं जल-:

    • हमेशा शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय ध्यान रखें कि बैठकर ही जल अर्पित करें। यहां तक कि रुद्राभिषेक करते समय भी खड़े नहीं होना चाहिए। खड़े होकर जल चढ़ाने पर शिवजी के ऊपर जल गिरने के बाद हमारे पैरों में उसके छींटें लगते हैं जो सही नहीं है।

    🔹जल के साथ कुछ और न मिलाएं-:

    • कभी भी शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए जल के पात्र में कोई अन्य सामग्री न मिलाएं। कोई भी सामग्री जैसे पुष्प, अक्षत या रोली जल में मिलाने से उनकी पवित्रता ख़त्म हो जाती है। इसलिए भगवान शिव की कृपा दृष्टि पाने के लिए हमेशा जल को अकेले ही चढ़ाना चाहिए। लेकिन जल में कुछ बूंदे नमर्दा या गंगा आदि पवित्र नदियों की जरूर मिलानी चाहिए।

    🔹 वस्तु अर्पित करने के बाद जल चढ़ाएं-:

    • आप यदि भगवान शिव को शहद, दूध, दही या किसी प्रकार का रस अर्पित करते हैं तो वह जल में ना मिलाएं।कोई भी वस्तु भगवान को अलग से चढ़ाएं फिर उसके बाद में जल अर्पित करें।

    🔹देसी गाय का दूध ही काम लें-:

    • शिवलिंग पर केवल शुद्ध देसी भारतीय गाय का कच्चा दूध ही चढ़ाना चाहिए, अन्य प्रकार का दूध बिल्कुल भी ना चढ़ाएं।

    कल माता पार्वती व बाबा भोलेनाथ को समर्पित महाशिवरात्रि का महापर्व है, अतः आप इस पवित्र महापर्व के शुभ अवसर पर पूर्ण समर्पित भाव से भोलेनाथ की पूजा- उपासना करके आनंद प्राप्त करें।

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  • शिवलिंग व जल अर्पण

    🕉️शिवलिंग व जल अर्पण🕉️

    शास्त्रों में कहा गया है कि शिव कृपा पाने के लिए पूरे नियम से शिवलिंग पर जल अर्पित करना चाहिए क्योंकि जल धारा भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है और नियम से इसे शिवलिंग पर चढ़ाने से भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

    🔹किस दिशा की ओर चढ़ाएं जल-:

    • शिवलिंग पर जल उत्तर दिशा की ओर मुंह करके जल चढ़ाएं क्योंकि उत्तर दिशा को शिव जी का बायां अंग माना जाता है जो माता पार्वती को समर्पित है। इस दिशा की ओर मुंह करके जल अर्पित करने से भगवान शिव और माता पार्वती दोनों की कृपा दृष्टि प्राप्त होती है।

    🔹कौन से पात्र से अर्पित करें जल-:

    • शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय सबसे ज्यादा ध्यान में रखने वाली बात ये है कि आप किस पात्र से जल अर्पित करें। जल चढ़ाने के लिए सबसे अच्छे पात्र तांबे, चांदी और कांसे के माने जाते हैं। स्टील के पात्र से शिवलिंग पर जल नहीं चढ़ाना चाहिए। जल अर्पण के लिए सर्वोत्तम पात्र तांबे का है। इसलिए इसी पात्र से जल चढ़ाना उत्तम है। लेकिन तांबे के पात्र से शिव जी को दूध न चढ़ाएं क्योंकि तांबे में दूध विष के समान बन जाता है।

    🔹कभी भी शिवलिंग पर तेजी से जल नहीं चढ़ाना चाहिए-:

    • शास्त्रों में भी बताया गया है कि शिव जी को जल धारा अत्यंत प्रिय है। इसलिए जल चढ़ाते समय ध्यान रखें कि जल के पात्र से धार बनाते हुए धीरे से जल अर्पित करें। पतली जल धार शिवलिंग पर चढाना ज्यादा उचित रहता है।

    🔹बैठकर चढ़ाएं जल-:

    • हमेशा शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय ध्यान रखें कि बैठकर ही जल अर्पित करें। यहां तक कि रुद्राभिषेक करते समय भी खड़े नहीं होना चाहिए। खड़े होकर जल चढ़ाने पर शिवजी के ऊपर जल गिरने के बाद हमारे पैरों में उसके छींटें लगते हैं जो सही नहीं है।

    🔹जल के साथ कुछ और न मिलाएं-:

    • कभी भी शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए जल के पात्र में कोई अन्य सामग्री न मिलाएं। कोई भी सामग्री जैसे पुष्प, अक्षत या रोली जल में मिलाने से उनकी पवित्रता ख़त्म हो जाती है। इसलिए भगवान शिव की कृपा दृष्टि पाने के लिए हमेशा जल को अकेले ही चढ़ाना चाहिए। लेकिन जल में कुछ बूंदे नमर्दा या गंगा आदि पवित्र नदियों की जरूर मिलानी चाहिए।

    🔹 वस्तु अर्पित करने के बाद जल चढ़ाएं-:

    • आप यदि भगवान शिव को शहद, दूध, दही या किसी प्रकार का रस अर्पित करते हैं तो वह जल में ना मिलाएं।कोई भी वस्तु भगवान को अलग से चढ़ाएं फिर उसके बाद में जल अर्पित करें।

    🔹देसी गाय का दूध ही काम लें-:

    • शिवलिंग पर केवल शुद्ध देसी भारतीय गाय का कच्चा दूध ही चढ़ाना चाहिए, अन्य प्रकार का दूध बिल्कुल भी ना चढ़ाएं।

    , 15 फरवरी, रविवार को माता पार्वती व बाबा भोलेनाथ को समर्पित महाशिवरात्रि का महापर्व है, अतः आप इस पवित्र महापर्व के शुभ अवसर पर पूर्ण समर्पित भाव से भोलेनाथ की पूजा- उपासना करके आनंद प्राप्त करें। ☘️

  • महाशिवरात्रि के दिन राशि के अनुसार जप करने हेतु शिव मंत्र ।

    ।। महाशिवरात्रि के दिन राशि के अनुसार जप करने हेतु शिव मंत्र ।।

    इस बार शिवरात्रि शनिवार १५ फरवरी २०२६ को मनाना शुभ होगा। महाशिवरात्रि के दिन उपवास और शिव पूजन करने से आपकी सभी इच्छाएं पूरी होंगी, आपकी तरक्की होगी और आपकी सभी समस्याओं का हल निकलेगा। प्रस्तुत है विभिन्न राशि वालों के लिए महाशिवरात्रि के दिन जप करने हेतु शिव मंत्र-

    मेष राशि-
    महाशिवरात्रि के दिन आप शिवजी के अघोर मंत्र का जाप करें। मंत्र है-
    ॐ अघोरेभ्यो अथघोरेभ्यो, घोर घोर तरेभ्यः। सर्वेभ्यो सर्व शर्वेभ्यो, नमस्ते अस्तु रूद्ररूपेभ्यः।।

    वृष राशि-
    इस राशि वालों को इस मंत्र का जाप करना चाहिए-
    ॐ शं शंकराय भवोद्भवाय शं ॐ नमः।।

    मिथुन राशि-
    इस राशि वालों को इस मंत्र का जाप करना चाहिए-
    ॐ शिवाय नमः ॐ।।

    कर्क राशि-
    इस मंत्र का जाप करें-
    ॐ शं शिवाय शं ॐ नमः।।

    सिंह राशि-
    महाशिवरात्रि के दिन आप इस मंत्र का जाप करें-
    नमामिशमीशान निर्वाण रूपं विभुं व्यापकं ब्रह्म वेद स्वरूपं।।

    कन्या राशि-
    इस दिन शिव जी के त्र्यम्बक मंत्र का जाप करना चाहिए। मंत्र है-
    ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।

    तुला राशि-
    महाशिवरात्रि के दिन तुला राशि वाले इस मंत्र का जाप करें-
    ॐ शं भवोद्भवाय शं ॐ नमः।।

    वृश्चिक राशि-
    वृश्चिक राशि के लोग इस दिन इस मंत्र का जाप करें-
    निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाश माकाश वासं भजेऽहं।।

    धनु राशि-
    धनु राशि वाले इस दिन इन विशेष मंत्र का जाप करें-
    ॐ ऐं ह्रीं क्लीं आं शं शंकराय मम सकल जन्मांतरार्जित पाप विध्वंसनाय श्रीमते आयुः प्रदाय, धनदाय, पुत्रदारादि सौख्य प्रदाय महेश्वराय ते नमः।।

    कष्टं घोर भयं वारय वारय पूर्णायुः वितर वितर मध्ये मा खण्डितं कुरु कुरु सर्वान् कामान् पूरय पूरय शं आं क्लीं ह्रीं ऐं ॐसम संख्याम सावित्रीम् जपेत्।।

    ॐ तत्पुरुषाय च विद्महे, महादेवाय च धीमहि। तन्नो रुद्र प्रचोदयात।।

    मकर राशि-
    मकर राशि वाले महाशिवरात्रि के दिन इस मंत्र का जाप करें-
    ॐ शं विश्वरूपाय अनादि अनामय शं ॐ।।

    कुंभ राशि-
    कुंभ राशि वाले महाशिवरात्रि के दिन इस मंत्र का जाप करें-
    ॐ क्लीं क्लीं क्लीं वृषभारूढ़ाय वामांगे गौरी कृताय क्लीं क्लीं क्लीं ॐ नमः शिवाय।।

    मीन राशि-
    मीन राशि वाले महाशिवरात्रि के दिन इस मंत्र का जाप करें-
    ॐ शं शं शिवाय शं शं कुरु कुरु ॐ।। ।। ॐ नमः शिवाय ।।

  • शनि प्रदोष व्रत आज

    शनि प्रदोष व्रत आज


    हर माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को प्रदोष व्रत रखा जाता है। प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन करने से सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूरी हो जाती है। साल 2026 के फरवरी महीने के पहले प्रदोष व्रत को लेकर लोगों में संशय है, क्योंकि इस बार त्रयोदशी तिथि 14 फरवरी से शुरू होकर 15 फरवरी को खत्म हो रही है।

    प्रदोष कब है?

    फरवरी 2026 में त्रयोदशी तिथि 14 फरवरी की शाम 04:01 बजे से शुरू होकर 15 फरवरी की शाम 05:04 बजे तक रहेगी। ऐसे में 14 फरवरी की संध्या बेला यानी प्रदोष काल में त्रयोदशी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए प्रदोष व्रत 14 फरवरी 2026, दिन शनिवार को रखा जाएगा। शनिवार के दिन पड़ने के कारण इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाएगा।

    क्यों खास है यह प्रदोष व्रत?

    जब प्रदोष व्रत शनिवार के दिन पड़ता है तो उसका महत्व और बढ़ जाता है। शनि प्रदोष व्रत भगवान शिव और शनिदेव दोनों की कृपा प्राप्त करने का विशेष अवसर माना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा से रखने पर जीवन की बाधाएं कम होती हैं और कर्म संबंधी परेशानियों से राहत मिलती है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार शनि प्रदोष व्रत शनि दोष, कालसर्प दोष और पितृ दोष के शमन में सहायक माना जाता है। जो लोग करियर में रुकावट, आर्थिक दबाव या मानसिक तनाव से गुजर रहे हों, उनके लिए यह व्रत विशेष फलदायी माना जाता है।

    प्रदोष व्रत का पूजा मुहूर्त

    14 फरवरी 2026 को प्रदोष काल में पूजा करना सबसे शुभ माना जाएगा। इस दिन शाम 06:10 बजे से रात 08:44 बजे तक का समय विशेष रूप से पूजन के लिए अनुकूल रहेगा। यही वह अवधि है जब भगवान शिव की आराधना का सर्वोत्तम फल प्राप्त होता है।
    इसके अतिरिक्त गोधूलि मुहूर्त 06:08 बजे से 06:34 बजे तक रहेगा, जो शिव पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। श्रद्धालु इस समय शिवलिंग का अभिषेक कर सकते हैं और मंत्र जाप कर सकते हैं। निशिता मुहूर्त 15 फरवरी की रात्रि में अवश्य रहेगा, लेकिन प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा 14 फरवरी की संध्या में ही की जाएगी।

    प्रदोष व्रत की पूजा विधि

    प्रदोष व्रत के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। दिनभर यथाशक्ति उपवास रखें। संध्या समय पुनः स्नान कर पूजा स्थल को शुद्ध करें और भगवान शिव का जल, दूध और गंगाजल से अभिषेक करें। बेलपत्र, अक्षत, धूप, दीप और सफेद पुष्प अर्पित करें।
    पूजा के दौरान ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें और प्रदोष व्रत की कथा श्रवण करें। आरती के बाद भगवान को नैवेद्य अर्पित करें। व्रत खोलते समय सात्विक भोजन ग्रहण करें। कुछ लोग फलाहार करते हैं तो कुछ एक समय भोजन लेकर व्रत पूर्ण करते हैं। यह श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार रखा जा सकता है। व्रत के अगले दिन 15 फरवरी को व्रत का पारण करें।

    क्या न करें

    • तामसिक भोजन: लहसुन, प्याज, मांस या मदिरा का सेवन न करें।
    • अनाज का सेवन: व्रत के दौरान अन्न ग्रहण न करें।
    • क्रोध और वाद-विवाद: मन शांत रखें, किसी का अपमान न करें और झूठ बोलने से बचें।
    • नमक से परहेज: यदि व्रत में कुछ खाएं तो साधारण नमक की जगह केवल सेंधा नमक का उपयोग करें।
    • दिन में न सोएं: व्रत के दिन दिन में सोने से बचना चाहिए, इससे व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता।

  • विजया एकादशी फरवरी 13 विशेष===========================

    विजया एकादशी फरवरी 13 विशेष
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    भगवान विष्णु को प्रसन्न करने का व्रत है विजया एकादशी। इसे फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। कहा जाता है कि एकादशी का व्रत धारण करने से न सिर्फ समस्त कार्यों में सफलता मिलती है, बल्कि पूर्व जन्म के पापों का भी नाश हो जाता है। वहीं इसका पुण्य उस व्यक्ति को भी मिलता है जिसकी मृत्यु हो चुकी है आप आप उसकी आत्मा की शांति या मोक्ष की कामना से यह व्रत धारण कर रहे हैं।

    कथा के अनुसार वनवास के दौरान जब भगवान श्रीराम को रावण से युद्ध करने जाना था तब उन्होंने भी अपनी पूरी सेना के साथ इस महाव्रत को रखकर ही लंका पर विजय प्राप्त की थी।

    व्रत विधि
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    इस दिन भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित कर उनकी धूम, दीप, पुष्प, चंदन, फूल, तुलसी आदि से आराधना करें, जिससे कि समस्त दोषों का नाश हो और आपकी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकें। भगवान विष्णु को तुलसी अत्यधिक प्रिय है इसलिए इस दिन तुलसी को आवश्यक रूप से पूजन में शामिल करें। भगवान की व्रत कथा का श्रवण और रात्रि में हरिभजन करते हुए उनसे आपके दुखों का नाश करने की प्रार्थना करें। रात्रि जागकरण का पुण्य फल आपको जरूर ही प्राप्त होगा। व्रत धारण करने से एक दिन पहले ब्रम्हचर्य धर्म का पालन करते हुए व्रती को सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। व्रत धारण करने से व्यक्ति कठिन कार्यों एवं हालातों में विजय प्राप्त करता है।

    एकादशी कथा
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    युधिष्ठिर ने पूछा: हे वासुदेव! फाल्गुन (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार माघ) के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है और उसका व्रत करने की विधि क्या है? कृपा करके बताइये।

    भगवान श्रीकृष्ण बोले: युधिष्ठिर एक बार नारदजी ने ब्रह्माजी से फाल्गुन के कृष्णपक्ष की ‘विजया एकादशी’ के व्रत से होनेवाले पुण्य के बारे में पूछा था तथा ब्रह्माजी ने इस व्रत के बारे में उन्हें जो कथा और विधि बतायी थी, उसे सुनो।

    ब्रह्माजी ने कहा : नारद यह व्रत बहुत ही प्राचीन, पवित्र और पाप नाशक है । यह एकादशी राजाओं को विजय प्रदान करती है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

    त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्रजी जब लंका पर चढ़ाई करने के लिए समुद्र के किनारे पहुँचे, तब उन्हें समुद्र को पार करने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। उन्होंने लक्ष्मणजी से पूछा ‘सुमित्रानन्दन किस उपाय से इस समुद्र को पार किया जा सकता है ? यह अत्यन्त अगाध और भयंकर जल जन्तुओं से भरा हुआ है। मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे इसको सुगमता से पार किया जा सके।

    लक्ष्मणजी बोले हे प्रभु आप ही आदिदेव और पुराण पुरुष पुरुषोत्तम हैं। आपसे क्या छिपा है? यहाँ से आधे योजन की दूरी पर कुमारी द्वीप में बकदाल्भ्य नामक मुनि रहते हैं। आप उन प्राचीन मुनीश्वर के पास जाकर उन्हींसे इसका उपाय पूछिये।

    श्रीरामचन्द्रजी महामुनि बकदाल्भ्य के आश्रम पहुँचे और उन्होंने मुनि को प्रणाम किया। महर्षि ने प्रसन्न होकर श्रीरामजी के आगमन का कारण पूछा।

    श्रीरामचन्द्रजी बोले ब्रह्मन् मैं लंका पर चढ़ाई करने के उद्धेश्य से अपनी सेनासहित यहाँ आया हूँ। मुने अब जिस प्रकार समुद्र पार किया जा सके, कृपा करके वह उपाय बताइये।

    बकदाल्भय मुनि ने कहा : हे श्रीरामजी फाल्गुन के कृष्णपक्ष में जो ‘विजया’ नाम की एकादशी होती है, उसका व्रत करने से आपकी विजय होगी निश्चय ही आप अपनी वानर सेना के साथ समुद्र को पार कर लेंगे।

    राजन् ! अब इस व्रत की फलदायक विधि सुनिये: दशमी के दिन सोने, चाँदी, ताँबे अथवा मिट्टी का एक कलश स्थापित कर उस कलश को जल से भरकर उसमें पल्लव डाल दें। उसके ऊपर भगवान नारायण के सुवर्णमय विग्रह की स्थापना करें। फिर एकादशी के दिन प्रात: काल स्नान करें। कलश को पुन: स्थापित करें। माला, चन्दन, सुपारी तथा नारियल आदि के द्वारा विशेष रुप से उसका पूजन करें। कलश के ऊपर सप्तधान्य और जौ रखें। गन्ध, धूप, दीप और भाँति भाँति के नैवेघ से पूजन करें। कलश के सामने बैठकर उत्तम कथा वार्ता आदि के द्वारा सारा दिन व्यतीत करें और रात में भी वहाँ जागरण करें । अखण्ड व्रत की सिद्धि के लिए घी का दीपक जलायें । फिर द्वादशी के दिन सूर्योदय होने पर उस कलश को किसी जलाशय के समीप (नदी, झरने या पोखर के तट पर) स्थापित करें और उसकी विधिवत् पूजा करके देव प्रतिमासहित उस कलश को वेदवेत्ता ब्राह्मण के लिए दान कर दें कलश के साथ ही और भी बड़े बड़े दान देने चाहिए। श्रीराम आप अपने सेनापतियों के साथ इसी विधि से प्रयत्नपूर्वक ‘विजया एकादशी’ का व्रत कीजिये इससे आपकी विजय होगी।

    ब्रह्माजी कहते हैं नारद यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि के कथनानुसार उस समय ‘विजया एकादशी’ का व्रत किया। उस व्रत के करने से श्रीरामचन्द्रजी विजयी हुए। उन्होंने संग्राम में रावण को मारा, लंका पर विजय पायी और सीता को प्राप्त किया बेटा जो मनुष्य इस विधि से व्रत करते हैं, उन्हें इस लोक में विजय प्राप्त होती है और उनका परलोक भी अक्षय बना रहता है।

    भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : युधिष्ठिर ! इस कारण ‘विजया’ का व्रत करना चाहिए । इस प्रसंग को पढ़ने और सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।

    जगदीश जी की आरती
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    ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
    भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश…

    जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।
    सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश…

    मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।
    तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश…

    तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी।
    पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश…

    तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
    मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश…

    तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
    किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश…

    दीनबंधु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे।
    करुणा हाथ बढ़ाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश…

    विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
    श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश…

    विजया एकादशी मुहूर्त
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    एकादशी आरम्भ👉 12 फरवरी दोपहर 12 बजकर 21 मिनट से।

    एकादशी तिथि समाप्त👉 13 फरवरी दोपहर 02 बजकर 25 मिनट तक।

    पारण का समय👉 14 फरवरी प्रातः 06 बजकर 57 मिनट से प्रातः 09 बजकर 10 मिनट के बीच कर लेना चाहिए।

    पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय सायं 04:01।
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  • स्वास्तिक

    स्वास्तिक एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र प्रतीक है, जिसका भारतीय संस्कृति और धर्म में गहरा महत्व है। ‘स्वास्तिक’ शब्द संस्कृत के ‘सु’ (शुभ) और ‘अस्ति’ (होना) से बना है, जिसका अर्थ है— ‘कल्याण करने वाला’ या ‘मंगलमय’।
    यहाँ स्वास्तिक से जुड़ी कुछ प्रमुख जानकारियाँ दी गई हैं:

    1. आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व
      भारतीय धर्मों (हिंदू, जैन और बौद्ध) में स्वास्तिक को सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत माना जाता है:
    • हिंदू धर्म: यह भगवान गणेश का प्रतीक है, जो विघ्नहर्ता हैं। स्वास्तिक की चार भुजाओं को चार दिशाओं, चार वेदों और पुरुषार्थ के चार लक्ष्यों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का प्रतीक माना जाता है।
    • जैन धर्म: इसमें यह सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ का प्रतीक है और इसकी चार भुजाएं पुनर्जन्म के चार स्थानों (देव, मनुष्य, पशु और नर्क) को दर्शाती हैं।
    • बौद्ध धर्म: इसे बुद्ध के हृदय की मुहर या उनके पैरों के निशान के रूप में देखा जाता है।
    1. वास्तु और सौभाग्य
    • नकारात्मकता का नाश: माना जाता है कि घर के मुख्य द्वार पर सिंदूर से स्वास्तिक बनाने से नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं।
    • शुभ कार्य की शुरुआत: किसी भी पूजा, व्यापारिक बही-खाते या नए काम की शुरुआत में स्वास्तिक बनाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
    1. वैज्ञानिक और ज्यामितीय दृष्टिकोण
      स्वास्तिक की संरचना एक केंद्र से निकलती हुई चार भुजाओं जैसी है, जो निरंतर गति और स्थिरता के संतुलन को दर्शाती है। कुछ विद्वान इसे सौर मंडल या ब्रह्मांडीय ऊर्जा के चक्र का प्रतीक भी मानते हैं।