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  • विष योग  और उसके उपाय

    लोगों के दुश्मन बढ़ने लगते हैं। इंसान जिंदगी से भी नाखुश हो जाता है और कभी-कभी तो घर जाने का फैसला भी कर लेता है।

    इन सभी दुखों को दूर करने के लिए भगवान हमेशा साथ देते हैं। इसलिए जहां दर्द है वहां दर्द से मुक्ति भी है, आइए जानते हैं कुंडली में विष योग के प्रभाव को दूर करने के उपाय:

    1.   विष योग से बचने के लिए चन्द्रमा और शनि को मनाना बेहद जरूरी है। इसलिए चन्द्रमा शनि को शांत करने के लिए कुछ उपाय बताए गए हैं, जिन्हें जरूर करें। 

    2.  पीपल के वृक्ष में अन्य देवी-देवताओं का वास माना जाता है। अत: इस अत्यंत महत्वपूर्ण एवं विष योग के निवारण हेतु पीपल के पेड़ पर नारियल को 7 बार सिर से उतारकर उस नारियल को पीपल में भिगोकर प्रसाद के रूप में सभी को बांट दें।

    3.   शनि को प्रसन्न करने के लिए हर शनिवार को शनि मंदिर जाएं और तेल का दीपक जलाएं साथ ही याद रखें कि शनिवार को कभी भी चीनी न खाएं।

    4.   शनिवार के दिन पीपल के पेड़ पर तेल चढ़ाएं और उसमें काली उड़द व काले तिल डालें, दीपक जलाएं और ॐ सौं शनैश्चै नमः का जाप करें।

    5.   शनि मंदिर में जाने से पहले गुड़ की रोटी बनाएं और तिल का प्रसाद बनाकर भगवान को चढ़ाएं तथा उसके बाद कुत्तों को खिला दें।

    6.   साथ ही भगवान शिव को भी प्रसन्न करें। गायत्री मंत्र का जाप करें और भगवान शिव के मंदिर में जाकर शिवलिंग पर जल चढ़ाएं।

    7.   महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। यह मंत्र हर समस्या से बचने में मदद करता है। विष योग के प्रभाव से बचने के लिए भगवान शिव को प्रसन्न करें ताकि चंद्र देव भी प्रसन्न हो सकें। 

    8.   सोमवार और शनिवार को विशेष मानकर दोनों दिन व्रत रखें और भूखे को भोजन कराकर इस खतरनाक विष योग से अवश्य मुक्ति पा सकते हैं।

  • विष नवमांश के लिए, निम्नलिखित उपाय मददगार साबित हो सकते हैं:

    विष नवमांश के लिए, निम्नलिखित उपाय मददगार साबित हो सकते हैं: 

    • हनुमान जी की पूजा:हनुमानजी की पूजा करने से विष नवमांश के प्रभाव को कम करने में मदद मिलती है। हर मंगलवार और शनिवार को हनुमान चालीसा का पाठ करें।
    • शनिदेव की पूजा:शनिदेव की पूजा करना भी विष नवमांश के प्रभाव को कम करने में सहायक होता है। हर शनिवार को शनि मंदिर में दीपक जलाएं और शनि मंत्र का जाप करें।
    • शिवलिंग का जलाभिषेक:शिवलिंग का जलाभिषेक करने से विष नवमांश के नकारात्मक प्रभाव को दूर करने में मदद मिलती है।
    • पिप्पले वृक्ष के नीचे नारियल फोड़ना:शनिवार के दिन पीपल वृक्ष के नीचे नारियल फोड़ने से विष नवमांश का प्रभाव कम हो सकता है।
    • कुएं में दूध डालना:शनिवार के दिन कुएं में कच्चा दूध डालने से विष नवमांश के प्रभाव को दूर करने में मदद मिलती है।
    • अनुशासन में रहना:शनि अनुशासन का प्रतीक है, इसलिए अनुशासन में रहना विष नवमांश के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकता है।
    • कर्म सुधारना:यदि कुंडली में विष नवमांश बन रहा है, तो अपने कर्मों को सुधारने से भी इस योग के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

    यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इन उपायों को करने के साथ-साथ, आपको अपनी जीवनशैली में भी बदलाव करने चाहिए, जैसे कि नियमित रूप से व्यायाम करना, स्वस्थ भोजन करना और पर्याप्त नींद लेना। इन उपायों को करने से आप विष नवमांश के नकारात्मक प्रभाव से बच सकते हैं और अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। 

  • चम्पक द्वादशी आज

    चम्पक द्वादशी आज


    ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को चंपक द्वादशी का पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष चम्पा द्वादशी 07 जून 2025 को मनाई जाएगी। इस तिथि में भगवन श्री विष्णु का पूजन होता है और भगवान की चंपा के फूलों से पूजा होती है। श्री कृष्णा को चंपा के फूल अति प्रिय हैं और इस दिन उनका श्रृंगार करने से वो प्रसन्न होते हैं और मनोवांछित फल प्राप्त होता है।

    चम्पा द्वादशी के अन्य नाम

    हर महीने दो द्वादशी तिथि आती है। जिनमें से एक द्वादशी को भगवान श्री विष्णु जी के पूजन से जोड़ा गया है। द्वादशी तिथि को विष्णु द्वादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन शास्त्रों में भगवान विष्णु के भिन्न-भिन्न रुपों की पूजा आराधना करने का महत्व बताया गया है। इसलिए श्रद्धालुओं को इस दिन भगवान श्री विष्णु के कृष्ण रुप की पूजा करने से सुख-संपत्ति, वैभव और एश्वर्य की प्राप्ति होती है।
    चम्पा द्वादशी को राघव द्वादशी और रामलक्ष्मण द्वादशी के नाम से भी संबोधित किया गया है। इस दिन विष्णु के अवतार श्रीराम और श्री लक्ष्मण की मूर्तियों का पूजन भी होता है। राम और लक्ष्मण की पूजा करने के बाद एक घी से भरा हुआ घड़ा या कलश दान करने से सौभाग्य में वृद्धि होती है। पाप समाप्त होते हैं, मोक्ष पद की प्राप्ति होती है।
    उदया तिथि के साथ व्रत का प्रारंभ होता है। सर्वप्रथम ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पूजा के लिए आसन पर बैठना चाहिए। धरती पर कुछ अनाज रखकर उसके ऊपर एक कलश की स्थापना करें। कलश में पूजा के लिए एक भगवान विष्णुजी की प्रतिमा को डाल दें। अबीर, गुलाल, कुमकुम, सुगंधित फूल, चंदन से भगवान की पूजा करें। भगवान को खीर का भोग लगाना चाहिए। ब्राह्मण भोजन का आयोजन करना चाहिए। ब्राह्मणों वस्त्र, दक्षिणा आदि का दान करना चाहिए। मान्यता है कि त्रयोदशी तिथि को प्रतिमा को किसी योग्य ब्राह्मण को दान कर करना उत्तम होता है।

    चंपक द्वादशी पूजा विधि

    चंपक द्वादशी तिथि के दिन भगवान श्री कृष्ण का स्मरण करते हुए दिन का आरंभ करना चाहिए।
    दैनिक क्रियाओं से निवृत होकर, पूजा का संकल्प करना चाहिए।
    श्री कृष्ण का पूजन करना चाहिए। भगवान श्री विष्णु के कृष्ण रुप की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।
    इस दिन श्री विष्णु के राम अवतार का भी पूजन करना चाहिए।
    श्री रामदरबार को सजाना चाहिए।
    चंदन, अक्षत, तुलसी दल व पुष्प को भगवान श्री विष्णु के कृष्ण नाम व श्री राम नाम को बोलते हुए भगवान को अर्पित करने चाहिए।
    भगवान की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करवाना चाहिए। इसके पश्चात प्रतिमा को पोंछ कर सुन्दर वस्त्र पहनाने चाहिए।
    भगवान को दीप, गंध , पुष्प अर्पित करना, धूप दिखानी चाहिए।
    अगर चम्पा के फूल उपलब्ध ना हों तो पीले-सफेद फूलों का उपयोग कर सकते हैं। साथ ही चंदन को अर्पित करना चाहिए।
    आरती करने के पश्चात भगवान को भोग लगाना चाहिए।
    भगवान के भोग को प्रसाद रुप में को सभी में बांटना चाहिए। सामर्थ्य अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए व दान-दक्षिणा इत्यादि भेंट करनी चाहिए।
    चंपक द्वादशी व्रत में एकादशी से ही व्रत का आरंभ करना श्रेयस्कर होता है। अगर संभव न हो सके तो द्वादशी को व्रत आरंभ करें। पूरे दिन उपवास रखने के बाद रात को जागरण कीर्तन करना चाहिए। और दूसरे दिन स्नान करने के पश्चात ब्राह्मणों को फल और भोजन करवा कर उन्हें अपनी क्षमता अनुसार दान देना चाहिए। जो पूरे विधि-विधान से चम्पा द्वादशी का व्रत करता है। वह बैकुंठ को पाता है। इस व्रत की महिमा से व्रती के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। और वह सभी सांसारिक सुखों को भोग कर पाता है।

    चंपा के फूलों का पूजा में महत्व

    चंपा द्वादशी के दिन भगवान श्री कृष्ण के पूजन में चम्पा फूलों का मुख्य रुप से उपयोग होता है. एक अन्य मान्यता है कि चंपा के पुष्प का संबंध शिव भगवान से भी रहा है। लेकिन ज्येष्ठ मास की द्वादशी के दिन श्री विष्णु पूजन में इन पुष्पों का उपयोग विशेष आराधना और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए होता है।
    चंपा के फूलों के विषय में एक पौराणिक मान्यता भी बहुत प्रचलित है जिसके अनुसार चंपा के फूलों पर न ही कोई भंवरा और न ही तितली, मधुमक्खी बैठते हैं. एक कहावत है कि ’’चम्पा तुझमें तीन गुण-रंग रूप और वास, अवगुण तुझमें एक ही भँवर न आयें पास’’। रूप तेज तो राधिके, अरु भँवर कृष्ण को दास, इस मर्यादा के लिये भँवर न आयें पास।।
    मान्यताओं अनुसार चम्पा को राधिका और कृष्ण को भंवरा और मधुमक्खियों को गोप और गोपिकाओं के रूप में माना गया है। राधिका कृष्ण की सखी होने के कारण मधुमक्खियां चम्पा पर कभी नहीं बैठती हैं।
    वास्तुशास्त्र में भी इस पुष्प को अत्यंत शुभ माना गया है। यह सौभाग्य का प्रतीक माना गया है। इसे घर पर लगाने से धन संपदा का आगमन होता है।
    इस फूल में परागण नहीं होता जिस कारण तितली अथवा भवरे इत्यादि इस पर नहीं आते हैं। इसके साथ ही यह भी कहा जाता है। कि चंपा फूल वासना रहित माना होता है यह सभी गुणों से मुक्त होते हुए भी त्याग की भावना को दर्शाता है। इसलिए भगवान श्री विष्णु जी को इन फूलों की माला, कंगन, पैर के कड़े इत्यादि आभूषण बना कर शृंगार किया जाता है। इस दिन इन पुष्पों से भगवान को सजाने एवं उनका पूजन करने से वह शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

    चंपक/ चम्पा द्वादशी महत्व

    ऐसी मान्यता है कि चम्पा द्वादशी के दिन चंपा के फूलों से विधिवत भगवान श्री कृष्ण की पूजा करने से व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है। चम्पा द्वादशी की कथा श्रीकृष्ण ने माहाराज युधिष्ठिर को बतलाई थी। श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा था कि, हे युधिष्ठिर ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को जो भक्त उपवास करके श्री कृ्ष्ण , राम नाम से मेरी आराधना करता है, उनको एक हजार गो के दान के बराबर फल प्राप्‍त होता है। चम्पा द्वादशी का व्रत कर विधि-विधान से पूजा करने पर मानव की सभी इच्छाएं इस लोक में पूरी होती है और विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।

  • पीपल से ग्रह का ईलाज


    हमारे घर में ही कई ऐसी भाग्यवर्धक चीजें होती है, जिनका प्रयोग करने पर हम स्वयं अपने घर-ऑफिस आदि के नकारात्मक ऊर्जा को दूर करके सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि कर सकते हैं। ऐसे आसान उपाय जिससे हम सकारात्मक ऊर्जा का विकास कर अपने भाग्य को बदल सकते हैं, अपना भाग्य जागृत कर सकते

    पीपल से ग्रह का ईलाज
    चन्द्र
    जिन नक्षत्रों के स्वामी भगवान चन्द्र देव है, उन व्यक्तियों के लिए निम्न प्रयोग है.
    (अ) प्रति सोमवार तथा जिस दिन जन्म नक्षत्र हो उस दिन पीपल वृक्ष को सफेद पुष्प अर्पण करें लेकिन पहले 4 परिक्रमा पीपल की अवश्य करें.
    (आ) पीपल वृक्ष की कुछ सुखी टहनियों को स्नान के जल में कुछ समय तक रख कर फिर उस जल से स्नान करना चाहिए.
    (इ) पीपल का एक पत्ता सोमवार को और एक पत्ता जन्म नक्षत्र वाले दिन तोड़ कर उसे अपने कार्य स्थल पर रखने से सफलता प्राप्त होती है और धन लाभ के मार्ग प्रशस्त होने लगते है.
    (ई) पीपल वृक्ष के नीचे प्रति सोमवार कपूर मिलकर घी का दीपक लगाना चाहिए.

    पीपल से ग्रह का ईलाज
    मंगल
    जिन नक्षत्रो के स्वामी मंगल है. उन नक्षत्रों के व्यक्तियों के लिए निम्न प्रयोग है…..
    (अ) जन्म नक्षत्र वाले दिन और प्रति मंगलवार को एक ताम्बे के लोटे में जल लेकर पीपल वृक्ष को अर्पित करें.
    (आ) लाल रंग के पुष्प प्रति मंगलवार प्रातःकाल पीपल देव को अर्पण करें.
    (इ) मंगलवार तथा जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल वृक्ष की 8 परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए.
    (ई) पीपल की लाल कोपल को (नवीन लाल पत्ते को ) जन्म नक्षत्र के दिन स्नान के जल में डाल कर उस जल से स्नान करें.
    (उ) जन्म नक्षत्र के दिन किसी मार्ग के किनारे १ अथवा 8 पीपल के वृक्ष रोपण करें.
    (ऊ) पीपल के वृक्ष के नीचे मंगलवार प्रातः कुछ शक्कर डाले.
    (ए) प्रति मंगलवार और अपने जन्म नक्षत्र वाले दिन अलसी के तेल का दीपक पीपल के वृक्ष के नीचे लगाना चाहिए.

    पीपल से ग्रह का ईलाज
    बुध
    जिन नक्षत्रों के स्वामी बुध ग्रह है, उन नक्षत्रों से सम्बंधित
    व्यक्तियों को निम्न प्रयोग करने चाहिए.
    (अ) किसी खेत में जंहा पीपल का वृक्ष हो वहां नक्षत्र वाले
    दिन जा कर, पीपल के नीचे स्नान करना चाहिए.
    (आ) पीपल के तीन हरे पत्तों को जन्म नक्षत्र वाले दिन और
    बुधवार को स्नान के जल में डाल कर उस जल से स्नान
    करना चाहिए.
    (इ) पीपल वृक्ष की प्रति बुधवार और नक्षत्र वाले दिन 6
    परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए.
    (ई) पीपल वृक्ष के नीचे बुधवार और जन्म, नक्षत्र वाले दिन
    चमेली के तेल का दीपक लगाना चाहिए.
    (उ) बुधवार को चमेली का थोड़ा सा इत्र पीपल
    लगाना चाहिए अत्यंत लाभ होता है.
    क्रमश:……..

  • पीपल से ग्रह का ईलाज

    पीपल से ग्रह का ईलाज
    वृहस्पति* जिन नक्षत्रो के स्वामी वृहस्पति है. उन नक्षत्रों से सम्बंधित व्यक्तियों को निम्न प्रयोग करने चाहियें. (अ) पीपल वृक्ष को वृहस्पतिवार के दिन और अपने जन्म नक्षत्र वाले दिन पीले पुष्प अर्पण करने चाहिए. (आ) पिसी हल्दी जल में मिलाकर वृहस्पतिवार और अपने जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल वृक्ष पर अर्पण करें (इ) पीपल के वृक्ष के नीचे इसी दिन थोड़ा सा मावा शक्कर मिलाकर डालना या कोई भी मिठाई पीपल पर अर्पित करें. (ई) पीपल के पत्ते को स्नान के जल में डालकर उस जल से स्नान करें (उ) पीपल के नीचे उपरोक्त दिनों में सरसों के तेल का दीपक जलाएं.

  • पीपल से ग्रह का ईलाज

    पीपल से ग्रह का ईलाज
    सूर्य
    जिन नक्षत्रों के स्वामी भगवान सूर्य देव है, उन व्यक्तियों के लिए निम्न प्रयोग है.
    (अ) रविवार के दिन प्रातः काल पीपल वृक्ष की 5 परिक्रमा करें.
    (आ) व्यक्ति का जन्म जिस नक्षत्र में हुआ हो उस दिन (जो कि प्रत्येक माह में अवश्य आता है) भी पीपल वृक्ष की 5 परिक्रमा अनिवार्य करें.
    (इ) पानी में कच्चा दूध मिला कर पीपल पर अर्पण करें.
    (ई) रविवार और अपने नक्षत्र वाले दिन 5 पुष्प अवश्य चढ़ाए. साथ ही अपनी कामना की प्रार्थना भी अवश्य करे तो जीवन की समस्त बाधाए दूर होने

  • कालसर्प दोष

    कुंडली में कालसर्प दोष के कारण कई समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। यहाँ कुछ संभावित समस्याएं हैं:

    1. स्वास्थ्य समस्याएं: कालसर्प दोष के कारण स्वास्थ्य समस्याएं जैसे कि मानसिक तनाव, अनिद्रा, और शारीरिक दर्द हो सकती हैं।
    2. वैवाहिक जीवन में समस्याएं: कालसर्प दोष के कारण वैवाहिक जीवन में समस्याएं जैसे कि मतभेद, अविश्वास, और तलाक हो सकती हैं।
    3. कार्यक्षेत्र में समस्याएं: कालसर्प दोष के कारण कार्यक्षेत्र में समस्याएं जैसे कि नौकरी में समस्याएं, व्यापार में नुकसान, और आर्थिक समस्याएं हो सकती हैं।
    4. मानसिक तनाव और अवसाद: कालसर्प दोष के कारण मानसिक तनाव और अवसाद जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

    कालसर्प दोष के निवारण के लिए कुछ उपाय हैं:

    1. नाग पंचमी का व्रत: नाग पंचमी के दिन व्रत रखने से कालसर्प दोष का प्रभाव कम हो सकता है।
    2. राहु और केतु की पूजा: राहु और केतु की पूजा करने से कालसर्प दोष का प्रभाव कम हो सकता है।
    3. नाग देवता की पूजा: नाग देवता की पूजा करने से कालसर्प दोष का प्रभाव कम हो सकता है।
  • अनिष्ट ग्रहों के निवारण हेतु


    हमारे घर में ही कई ऐसी भाग्यवर्धक चीजें होती है, जिनका प्रयोग करने पर हम स्वयं अपने घर-ऑफिस आदि के नकारात्मक ऊर्जा को दूर करके सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि कर सकते हैं। ऐसे आसान उपाय जिससे हम सकारात्मक ऊर्जा का विकास कर अपने भाग्य को बदल सकते हैं, अपना भाग्य जागृत कर सकते हैं।

    *अनिष्ट ग्रहों के निवारण हेतु

    शुक्र के लिए
    ०१. सफ़ेद गुलाब के फूल शुक्रवार को नदी या कुएं में डालें | ०२. प्रतेक शुक्रवार को तिल जौ व देशी घी मिलाकर हवं करें
    ०३. चांदी के गहने पहनें व गले में हाथी का दांत पहने |
    ०४. लक्ष्मी या दुर्गा का पूजन करें |
    ०५. सफ़ेद गाय को शुक्र वार को रोटी खिलाएं |
    ०६. शुक्रवार को लाल ज्वार व दही किसी धार्मिक स्थान पर दान करें |
    ०७. सफ़ेद कांच के बर्तन में चांदी डालकर धूप में रखें व बाद में उसे पी लें |
    ०८. सफ़ेद रेशमी वस्त्र दान करें |
    ०९. चांदी घोड़े का रोज पूजन करें ।

  • अनिष्ट ग्रहों के निवारण हेतु


    हमारे घर में ही कई ऐसी भाग्यवर्धक चीजें होती है, जिनका प्रयोग करने पर हम स्वयं अपने घर-ऑफिस आदि के नकारात्मक ऊर्जा को दूर करके सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि कर सकते हैं। ऐसे आसान उपाय जिससे हम सकारात्मक ऊर्जा का विकास कर अपने भाग्य को बदल सकते हैं, अपना भाग्य जागृत कर सकते है

    *अनिष्ट ग्रहों के निवारण हेतु

    शनि के लिए* ०१. शनिवार को सफेदे का पत्ता अपनी जेब में रखें | ०२. नारियल के तेल में कपूर मिला के सिर पे लगायें | ०३. काले उड़द जल में प्रवाहित करें । ०४. ताम्बे या लोहे के पात्र से ही जल पियें | ०५. शनिवार को तेल से चुपड़ी रोटी काले कुत्ते को खिलाएं | ०६. काले घोड़े की नाल या नाव की कील की अंगूठी बनवाकर मध्यमा ऊँगली में शनिवार को पहनें | ०७. शनिवार को लोहे के बर्तन में सरसों का तेल व ताम्बे का सिक्का डालकर अपना चेहरा देख कर शनि मंदिर में चढ़ें या मांगने वाले को दें | ०८. शनिवार को सरसों का तेल, मांस, अंडा, शराब का शेवन न करें | ०९. शनिवार को तेल या शराब बहते पानी में प्रवाहित करें | १०. चिड़ियों को बाजरा डालें व पीपल पर जल चढ़ाएं |

  • पाँच मुखी

    पाँच मुखी
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    पाँचमुखी रूद्राक्ष को धारण करके अनेक प्रकार की व्याधियों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। जो निम्नलिखित हैं-

    1-पाँचमुखी रूद्राक्ष को शरीर में धारण करनें से व्यक्ति में जीवन के प्रति संघर्ष व धैर्य की क्षमता में वृद्धि होती है।
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    2- जो व्यक्ति अपने मन की बात कहने में संकोच करते है अथवा संकोची स्वभाव के होते है। ऐसे लोगों को पाँचमुखी रूद्राक्ष धारण करने से उनकी प्रतिभा व व्यक्तित्व में निखार आता है।

    3- जो लोग अधैर्य या जल्दबाजी में गलत निर्णय ले लेते है, और बाद में अफसोस करते है। ऐसे लोगों को पाँचमुखी रूद्राक्ष करने से लाभ मिलता है।
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    4- राजनीति से जुड़े व्यक्तियों को पाँचमुखी रूद्राक्ष पहनने से उनके नेतृत्व में गजब का निखार आता है।

    5- बृहस्पति ग्रह से जनित दोषों के निवारण हेतु पाँचमुखी रूद्राक्ष धारण करना काफी कारगर सिद्ध होता है।

    6-हाईब्लड प्रेशर के रोगियों को पाँचमुखी रूद्राक्ष को चांदी में जड़वाकर कण्ठ में धारण करने से उच्च रक्त चाप नियन्त्रित रहता है।
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    धारण विधि- किसी भी महीने की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा इन तीनों दिन में पाँचमुखी रूद्राक्ष को शिवलिंग के साथ रखकर गंगा जल और कुश से निम्न मन्त्र- “नमः शिवाय” से जल छिड़के। तत्पश्चात चन्दन का तेल लगाकर मन्त्र 1 माला का जाप करें।