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  • शनि जयंती पर 4 फूलों का चमत्कार

    शनि जयंती पर 4 फूलों का चमत्कार, कर्मफलदाता को चढ़ाकर पाएं साढ़ेसाती और पनौती से छुटकारा!

    ● शनिदेव अच्छे बुरे कर्मों का पूरा पूरा हिसाब करते हैं, शनि की साढ़ेसाती और पनौती से अगर आप भी परेशान है तो आपको शनि जयंती 2025 पर शनि देव के प्रिय फूल उन्हें जरूर अर्पित करें, शास्त्रों के अनुसार शनिदेव का जन्म ज्येष्ठ अमावस्या तिथि हुआ, शनिदेव के पिता सूर्यदेव है और माता देवी संज्ञा हैं, ज्योतिष अनुसार शनि जयंती एक बहुत विशेष दिवस है, इस दिन कुछ विशेष फूल चढ़ाकर शनिदेव को जल्द प्रसन्न किया जा सकता है, इस बार 27 मई 2025 को शनि जयंती मनाई जाएगी।

    ● ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि देव को आक का फूल चढ़ाने से शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव कम होता है, शनि जयंती के मौके पर अगर यह उपाय करें तो इसका और भी अच्छा परिणाम हासिल होता है, आक के फूल अर्पित करने से शनि देव अति प्रसन्न होते हैं और जातक की किस्मत का ताला खोल सकते हैं।

    ● शनिदेव को गुड़हल का फूल अति प्रिय है जिसे चढ़ाने से शनि दोष दूर होता है, शनि जयंती या किसी भी शनिवार को अगर गुड़हल का फूल शनिदेव को अर्पित करें तो इसके बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।

    ● अपराजिता का फूल शनिदेव को अति प्रिय है, यह नीले रंग का फूल शनिदेव को तो अर्पित किया जाता है, साथ ही भगवान शिव को भी यह फूल चढ़ाने की परंपरा है, शनि जयंती पर अगर कोई जातक 5, 7, 11 अपराजिता के फूल शनिदेव के चरणों में अर्पित करता है तो शनिदेव प्रसन्न होकर साढ़ेसाती और पनौती के प्रभाव को कम कर देते हैं।

    ● शनि जयंती के मौके पर शनि देव को शमी के फूल चढ़ाना अति शुभ माना गया है, शनि महाराज की विधि विधान से पूजा करें और पूजा के समय ही शमी के पत्ते, शमी के फूल व शमी की जड़ अर्पित करें, शमी के फल चढ़ाने से भी शनि देव का आशीर्वाद प्राप्त होता है और साढ़ेसाती का प्रभाव कम होता है, दुख दूर होते हैं और धन की आवक बढ़ती है।

  • शनि प्रदोष व्रत आज

    शनि प्रदोष व्रत आज


    हर महीने में दो बार प्रदोष व्रत किया जाता है, दो हर माह की कृष्ण और शुक्ल पक्ष में आने वाली त्रयोदशी तिथि पर किया जाता है। साथ ही इस दिन पर शिव जी की पूजा प्रदोष काल में करने का विधान है। शनिवार को किए जाने वाले प्रदोष व्रत को शनि प्रदोष व्रत के रूप में जाना जाता है, जो शनिदेव की कृपा के लिए भी उत्तम तिथि मानी गई है।

    प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त

    ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि का शुभारंभ 24 मई को शाम 7 बजकर 20 मिनट पर हो रहा है। वहीं इस तिथि का समापन 25 मई को दोपहर 3 बजकर 51 मिनट पर होगा। प्रदोष व्रत शनिवार 24 मई को किया जाएगा। इस दिन पर शिव जी की पूजा का मुहूर्त शाम 7 बजकर 20 मिनट से रात 9 बजकर 13 मिनट तक रहने वाला है।

    शिवलिंग पर चढ़ाएं ये चीजें

    शनि प्रदोष व्रत के दिन शिवलिंग का गंगाजल से अभिषेक करें, इसके बाद दूध और दही से अभिषेक करें। इसी के साथ प्रदोष व्रत के दिन शिवलिंग पर गंगाजल और चावल अर्पित करने से आपको कर्ज की समस्या से मुक्ति मिल सकती है। साथ ही शनि प्रदोष व्रत के दिन शिवलिंग पर काले तिल अर्पित करने से भी साधक को शुभ फल प्राप्त होते हैं।

    इन चीजों का करें दान

    शनि प्रदोष व्रत का दिन शनि देव को प्रसन्न करने के लिए भी बहुत उत्तम माना गया है। ऐसे में आप इस दिन काले तिल और सरसों के तेल का दान कर सकते हैं, जिससे शिव जी के साथ-साथ शनिदेव की भी कृपा मिलती है। इसी के साथ शनि प्रदोष व्रत के दिन उड़द की दाल, लोहे की वस्तुएं, वस्त्र और अन्न का दान करने से भी साधक को अच्छे परिणाम मिलते हैं।

    शनि प्रदोष व्रत महत्व

    शनिवार के दिन पड़ने के कारण आप इस दिन भोलेनाथ के साथ-साथ शनिदेव की भी पूजा अर्चना कर सकते हैं। अगर आपकी कुंडली में शनि की स्थिति कमजोर है तो फिर इस दिन शनि मंदिर में जाकर पूजा पाठ कर सकते हैं। इससे आप पर शनि देव की कुदृष्टि का असर कम होगा।

  • पार्वती पंचक स्तोत्र के फायदे

    पार्वती पंचक स्तोत्र के फायदे

    पार्वती पंचक स्तोत्र का पाठ करने से विभिन्न आर्थिक, सामाजिक और परिवारिक समस्याओं का समाधान होता है। यहां हम कुछ महत्वपूर्ण फायदे देखेंगे जो पार्वती पंचक स्तोत्र के पाठ करने से होते हैं। पार्वती पंचक स्तोत्र के पाठ से अनेक लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं, जो इस प्रकार हैं:

    1. शांति और सुख: पार्वती पंचक स्तोत्र के पाठ से मन और आत्मा की शांति प्राप्त होती है। यह स्तोत्र हमें सुख, समृद्धि और सम्पन्नता की प्राप्ति में सहायता करता है।
    2. भक्ति और श्रद्धा: पार्वती पंचक स्तोत्र के पाठ से हमारे मन में भक्ति और श्रद्धा का विकास होता है। हम देवी पार्वती के प्रति अपने अनुराग को व्यक्त करते हैं और उनकी कृपा को प्राप्त करते हैं।
    3. नेगेटिविटी से मुक्ति: यह स्तोत्र हमें सभी बुराईयों से मुक्ति दिलाता है। इसके पाठ के प्रभाव से हमारे दिमाग में नकरात्मक विचार और भावनाएं कम होती हैं और हम पूर्णतः प्रकाशमय विचारों में स्थिर होते हैं।
    4. स्वास्थ्य और अच्छे संबंध: पार्वती पंचक स्तोत्र के पाठ से हमारे शरीर, मन और आत्मा का सम्पूर्ण स्वास्थ्य बना रहता है। इसके अलावा, यह स्तोत्र हमें अच्छे संबंध और परिवारिक समृद्धि को भी प्राप्त करने में सहायता करता है।
    5. विवाह का योग बनना: पार्वती पंचक स्तोत्र का पाठ करने से बहुत ही जल्द विवाह का योग बनता है। यह स्तोत्र विवाह की समस्याओं को हल करने में मददगार साबित होता है और अच्छा जीवनसाथी प्राप्त करने में सहायता करता है।
    6. दरिद्रता को दूर करना: पार्वती पंचक स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करने से दरिद्रता दूर होती है। यह स्तोत्र आर्थिक तंगी से राहत दिलाने और समृद्धि की प्राप्ति में सहायता करता है।
    7. घर परिवार में सुख शांति: पार्वती पंचक स्तोत्र के पाठ से घर परिवार में सुख और शांति की प्राप्ति होती है। यह स्तोत्र परिवार के सभी सदस्यों की सुरक्षा, उन्नति, और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करता है।
    8. धन प्राप्ति: पार्वती पंचक स्तोत्र के पाठ से धन प्राप्ति में सहायता मिलती है। यह स्तोत्र आर्थिक समस्याओं को हल करने और धन की प्राप्ति में मदद करता है।
    9. विद्या प्राप्ति: पार्वती पंचक स्तोत्र के पाठ से विद्या प्राप्ति में सहायता मिलती है। यह स्तोत्र छात्रों को बुद्धि, ज्ञान और विद्या की प्राप्ति के लिए आशीर्वाद प्रदान करता है।

    यह स्तोत्र महादेव शिव के जीवनसंगी पार्वती देवी की महिमा और आराधना में समर्पित है। इस स्तोत्र के द्वारा देवी पार्वती की कृपा प्राप्त की जाती है और विवाह, संतान प्राप्ति, सौभाग्य और प्रेम जैसे क्षेत्र में समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह स्तोत्र देवी पार्वती के मातृ भाव, मानवता के प्रतीक और सौभाग्य का प्रतीक है।

  • बुध के लिए करे उपाय

    बुध के लिए करे उपाय
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    अगर किसी की जन्मकुण्डली में बुध अच्छा न हो शुभ फल न दे रहा हो तो उसको तांबे के गिलास में जल पीना चाहिये ।

    सफेद और हरे रंग के धागे को आपस में मिला कर अर्थात कलावा जैसा बनाकर अपनी कलाई में बाँधना चाहिये इससे बहुत ही लाभ होता है अशुभ बुध से भी शुभ फलों की प्राप्ति होने लगती है ।।
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    बुध शांति की उत्तम उपाय में नित्य “विष्णु-सहस्त्रनाम” का पाठ करें |
    नित्य भगवान शालिग्राम का पूजन करें, तुलसी दलपत्र अवश्य अर्पित करें व बुध-मंत्र का जप करें, प्रसाद रूप में उस तुलसी के पत्ते को ग्रहण करें, ऐसा करने से चमत्कारी लाभ होगा |

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    पुरुष-सूक्त के द्वारा भगवान विष्णु की षोडशोपचार पूजा करने से बुध कृत समस्त अरिष्ट शांत होतें हैं | इस पूजन से सन्तान कष्ट, गर्भ-दोष, वाणी एवं मानसिक कष्ट दूर हो जाते हैं | सुख शांति की वृद्दि होती हैं |

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    व्यापारिक अडचनों एवं सन्तान कष्ट में “गोपालसह्स्त्रनाम” एवं कृष्ण पूजा अमोघ हैं |
    ग्यारह बुधवार, ब्राह्मण को दूध दान में देना व बुध स्त्रोत का पाठ करना |
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    गणपति जी के दर्शन तथा व्रत रहना |

    घर में इलेक्ट्रानिक वस्तुओ का चालू हालत में रखना |

    9910057645
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  • अपरा एकादशी व्रत आज

    अपरा एकादशी व्रत आज


    सनातन धर्म में एकादशी तिथि को अत्यंत पवित्र और फलदायी माना गया है। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को “अपरा एकादशी” कहा जाता है। इस दिन उपवास के साथ-साथ अन्न, वस्त्र और धन का दान करना पुण्यदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत रखने और दान-पुण्य करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है और शुभ फल की प्राप्ति होती है।

    अपरा एकादशी की तिथि

    ज्योतिषीय गणना के अनुसार ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 23 मई को रात 01:12 बजे प्रारंभ होगी और इसी दिन रात 10:29 बजे समाप्त हो जाएगी। सनातन धर्म में उदया तिथि को प्राथमिकता दी जाती है, अतः अपरा एकादशी व्रत 23 मई को रखा जाएगा। अगले दिन यानी 24 मई को व्रत का पारण किया जाएगा।

    अपरा एकादशी पारण का समय

    एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि के दौरान किया जाता है। 24 मई को पारण के लिए शुभ समय सुबह 05:26 बजे से शाम 08:11 बजे तक रहेगा। इस दौरान कभी भी व्रत खोला जा सकता है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:04 से 04:45 बजे तक रहेगा, जो पूजा-पाठ के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है।

    अपरा एकादशी की पूजा विधि

    प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और सूर्य को अर्घ्य दें।
    पूजा स्थान को शुद्ध करें और गंगाजल का छिड़काव करें।
    स्वच्छ वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
    चंदन, फूलमाला अर्पित करें और देसी घी का दीपक जलाकर आरती करें।
    भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें और विष्णु चालीसा का पाठ करें।
    व्रत कथा का श्रवण या पाठ करें।
    फल, मिठाई और तुलसी के पत्तों सहित भोग अर्पित करें।
    अंत में जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और धन का दान करें।

    इस विधि से करें भगवान विष्णु को प्रसन्न

    अपरा एकादशी के दिन सुबह उठकर स्नान करने के बाद भगवान विष्णु का ध्यान करके व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद अपरा एकादशी का व्रत शुरू होता है। इस दिन भगवान विष्णु के प्रिय रंग के कपड़े यानी पीले रंग के कपड़े पहने जा सकते हैं। अपरा एकादशी पर श्रीहरि की पूजा करने के लिए चौकी पर पीले रंग का वस्त्र बिछाकर विष्णु भगवान की प्रतिमा को उसपर सजाएं। इसके बाद दीप जलाएं, फल, अक्षत, फल, तुलसी और मेवा वगैरह अर्पित करें। आरती करें, मंत्रों का जाप करें और पूजा का समापन करें।

    भगवान विष्णु के मंत्र

    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय:
    ॐ नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णु प्रचोदयात्:
    ॐ विष्णवे नमः
    कृष्णाय वासुदेवाय हराय परमात्मने प्रणतः क्लेशनशाये गोविंदाय नमो नमः
    हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे:

  • ग्रहों से संबंधित ऐसी वस्तुओं, पौधों और जड़ियों की जानकारी जिनके उपायोग से आपके संकट तो मिटेंगे ही साथ आप मालामाल हो जाएंगे।

    सूर्य ग्रह के लिए लाल किताब में तेजफल का वृक्ष माना गया है जबकि ज्योतिष में आंकड़ा माना गया है। इसके अलावा पर्वतों पर उगने वाले पौधे, मिर्च, काली मिर्च, शलज़म, सूर्यमुखी का फूल, सरसों, गेहूं पर भी सूर्य का अधिकार होता है। विल्वमूल की जड़ को धारण करने से सूर्य ग्रह तेज होता है।

    गुड़ खाना से सूर्य का दोष दूर होता है। बंदर, पहाड़ी गाय और कपिला गाय को भी अन्य देने से सूर्य का दोष शांत होता है। सूर्य को अर्ध देना और भगवान विष्णु की पूजा करने से भी सूर्य का दुष्प्रभाव दूर होता है। माणिक पत्थर इसका है।

    2.चंद्र ग्रह-

    चंद्र ग्रह के लिए लाल किताब में पोस्त का हरा पौधा, जिसमें दूध हो बताया गया है जबकि ज्योतिष में पलाश के पौधे का वर्णन मिलता है। इसके अलावा खोपरा, ठंडे पदार्थ, रसीले फल, चावल और सब्जियों पर भी चंद्र का अधिकार रहता है। खिरनी की जड़ धारण करने से चंद्र के सभी दोष दूर होते हैं। वस्तुओं में दूध, मोती, चंदी, चावल और पशुओं में घोड़ा चंद्र का प्रतीक है।

    3.मंगल-

    लाल किताब के अनुसार मंगल दो प्रकार के होते हैं। मंगल नेक के लिए नीम का वृक्ष और मंगल बद के लिए ढाक का वृक्ष बताया गया है जबकि ज्योतिष में खैर के वृक्ष को भी मंगल की शांति के लिए लाभदायक बताया गया है। इसके अलावा नुकीले वृक्ष, बरगद, अदरक, अनाज, जिन्सें, तुअर दाल, मूंगफली पर मंगल का अधिकार रहता है अनंतमूल की जड़ धारण करने से मंगल दोष दूर होता है।

    मंगल नेक का पशु शेर और मंगलबद का पशु ऊंट-ऊंटनी और हिरन है। जोभी लाल पत्थर है वह मंगल नेक का और चमकीला पत्थर मंगल बद का माना गया है। वस्त्रों में पोशाक बंडी मंगल नेक की है। यदि सिर को खुला रखा तो समझो मंगल बद का असर होगा।

    4.बुध ग्रह-

    बुध ग्रह के लिए केला, चौड़े पत्ते के पौधे या वृक्ष होते हैं। हालांकि आंधीझाड़ा की झाड़ी को भी बुध की शांति के लिए लाभदायक बताया गया है। इसके अलावा नर्म फसल, मूंग दाल और बैंगन पर भी बुध का अधिकार होता है। विधारा की जड़ धारण करने से बुध का दोष दूर होता है। हरे मुंग की दाल खाने से लाभ मिलेगा। बकरा, बकरी, भेड़, चमगादड़ इसके पशु हैं। टोपी, नाड़ा, तगारी और पेटी इसकी वस्तुएं हैं। हिरा और पन्ना इसकी धातुएं हैं।

    5.गुरु ग्रह-

    गुरु ग्रह के लिए पीपल का वृक्ष बताया गया है। कुछ लोग पारस पीपल की बात करते हैं। इसके अलावा केले के वृक्ष, खड़ी फसल, बंगाली चला और गांठों वाले पादप से जुड़े पौधे पर भी गुरु का अधिकार होता है। भारंगी/केले की जड़ धारण करने से गुरु का दोष दूर होता है। पीली वस्तुएं गुरु ग्रह की हैं। पशुओं में बब्बर शेर और वस्त्रों में पगड़ी गुरु हैं। सोना या पुखराज पहनने से गुरु के दोष दूर होते हैं।

    6.शुक्र ग्रह-

    शुक्र ग्रह के लिए लाल किताब में कपास का पौधा और बेलदार पौधे बताए गए हैं जबकि अन्य ज्योतिष में गुलर का पौधा बताया गया है। इसके अलावा फलदार वृक्ष, फूलदार पौधे, मटर, बींस, पहाड़ी पादप, मेवे पैदा करने वाले पादप और लताओं पर भी शुक्र का अधिकार होता है। सिंहपुछ की जड़ धारण करने से शुक्र का दोष दूर होता है। पशुओं में अश्व, गाय और बैल, पोशाक में कमीज और वस्तुओं में मिट्टी एवं है। हीरा इसकी धातु है।

    7.शनि ग्रह-

    शनि ग्रह के लिए लाल किताब में कीकर, आक, खजूर का वृक्ष बताया गया है लेकिन ज्योतिष में शमी का पेड़ बताया गया है। इसके अलावा पादपों में जहरीले और कांटेदार पौधे, खारी सब्जियां, तम्बाकू पर भी शनि का अधिकार होता है। बिच्छोल की जड़ धारण करने से शनि का दोष दूर होता है। पशुओं में भैंस या भैंसा, पोशाक में जुराब और जूता बताया गया है। वस्तुओं में शहद, लोहा या फौलाद और नग में नीलम। घर में शहद रखने और खाने से शनि शांत रहता है।

    8.राहु ग्रह-

    राहु ग्रह के लिए लाल किताब में नारियल का पेड़ और कुत्ता घास बताई गई है जबकि ज्योषित में चंदन का पेड़ बताया गया है। इसके अलावा लहसुन, काले चने, काबुली चने और मसले पैदा करने वाले पौधों पर राहु और केतु का अधिकार होता है। चंदन की जड़ धारण करने से राहु का दोष दूर होता है। पशुओं में हाथी और कांटेदार जंगली चूहा जबकि वस्तुओं में नीलम, सिक्का और गोमेद महत्वपूर्ण है। पोशाक में पायजामा और पतलून है।

    9.केतु ग्रह-

    केतु ग्रह के लिए लाल किताब में इमली का दरख्त, तिल के पौधे और केले के वृक्ष को बताया गया है जबकि ज्योतिष में अश्वगंधा को। इसके अलावा लहसुन, काले चने, काबुली चने और मसले पैदा करने वाले पौधों पर राहु और केतु का अधिकार होता है। अश्वगंध की जड़ धारण करने से केतु का दोष दूर होता है। पशुओं में कुत्ता, गधा, सूअर और छिपकली एवं पोशाक में दुपट्टा, कंबल एवं ओढ़नी को बताया गया है। वस्तुओं में द्विरंगा पत्थर बताया गया है

  • ज्येष्ठ मास में सूर्य पूजा

    भविष्यपुराण प्रतिसर्गपर्व चतुर्थ अध्याय ७ के अनुसार ज्येष्ठ मास में सूर्य पूजा का अत्यधिक महत्त्व है। धनार्थी अर्यमा विप्र द्वारा ज्येष्ठ मास में सूर्य पूजा का एक वृत्तान्त आता है जो इस प्रकार है –
    बृहस्पति ने कहा – इन्द्र ! सूर्य की ज्येष्ठ मास की एक रम्य कथा तुम्हें सुना रहा हूँ । पहले सत्ययुग में अर्यमा नामक एक ब्राह्मण हुआ, जो वेद, वेदाङ्ग का मर्मज्ञ और धर्मशास्त्र का महान् विद्वान् था । श्राद्धयज्ञ नामक राजा की पितृमती नामक कन्या उसकी पत्नी थी । उस अर्यमा ब्राह्मण ने उस पत्नी द्वारा सात पुत्र और एक साध्वी पुत्री उत्पन्न किया । उसके वे पुत्र धर्मशास्त्र के निपुण विद्वान् थे । एक बार उस बुद्धिमान् ब्राह्मण ने अपने हृदय में भली-भाँति विचारकर धन के लिए अनेक पूजनों द्वारा भास्कर देव की उपासना की । प्रातःकाल में श्वेतपुष्प एवं चन्दनादि, मध्याह्न में रक्तपुष्प और सायंकाल में पीतपुष्पों द्वारा उनकी आराधना प्रारम्भ की । विधानपूर्वक एक मास तक उनकी पूजा करने के उपरान्त ज्येष्ठ-मास के अन्त में भगवान सूर्य ने उसे एक शुभमणि प्रदान किया, जिससे उस मणि के प्रभाव से एक प्रस्थ स्वर्ण प्रतिदिन उन्हें मिलने लगा । उसके द्वारा उन्होंने अत्यन्त धर्म किया — पृथ्वी में अनेक स्थानों पर बाबली, कुएँ, तालाब और सुन्दर मन्दिरों का निर्माण कराया । पश्चात् सूर्यदेव के प्रसन्नतावश इन कार्यों के सुसम्पन्न होने के उपरान्त उस धार्मिक ने एक सहस्र वर्ष तक तरुण एवं आरोग्य जीवन व्यतीत किया । अनन्तर अपने शरीर को त्यागकर रमणीक सूर्यलोक की प्राप्तिपूर्वक वहाँ एक लाख वर्ष तक रह पुनः सूर्यरूप की प्राप्ति की । इस प्रकार सूर्य का माहात्म्य मैंने तुम्हें सुना दिया । इसलिए इन्द्र ! देवों समेत तुम मण्डलस्थ सूर्य की उपासना करो। इसे सुनकर देवों ने सूर्यदेव की पद्यात्मक कथाओं द्वारा उनकी आराधना आरम्भ की । उससे प्रसन्न होकर ज्येष्ठ मास में सूर्य ने वहाँ प्रकट होकर देवों से कहा —देवगण ! भयानक कलि के समय में कृष्ण-सप्त-सुदर्शन निम्बादित्य के रूप में उत्पन्न होकर ख्यातिपूर्वक देवों का कार्य सफल करेगा, तथा धर्म की ग्लानि को हरेगा ।

    मित्राय नमः! मित्राय नमः! मित्राय नमः! मित्राय नमः! मित्राय नमः! मित्राय नमः! मित्राय नमः!

  • होमाहुति विशेष

    होमाहुति विशेष
    १- अग्नि के “मुख” में आहुति देने से सर्व कार्य सिद्धि
    होते है।
    २-अग्नि के “कर्ण प्रदेश” में – व्याधि होती है।
    ३- अग्नि के “नेत्र” में – अन्धापन आ सकता है।
    ४,-अग्नि के “नासिका” में – मानसिक कष्ट होंगे।
    ५-अग्नि के “मस्तक” में आहुति देने से – धन का क्षय
    होता है।
    अग्निदेव जानकारी
    १ जिस भाग में काष्ठ हो – कर्ण
    २ कम जलने वाला भाग – नेत्र
    ३ धुआं वाला भाग – नासिका
    ४ अंगारों वाला भाग- मस्तक व
    ५ अग्नि शिखा वाला भागअग्निकामुख(जिह्वा)कहलाताहै
    हवन आहुति फल
    १ मधु के होम से – उपद्रव नष्ट
    २ घी-सम्पत्ति प्राप्ति
    ३ दही-आरोग्य प्राप्ति
    ४ दूध-गांव प्राप्ति
    ५ अंगूर-इष्ट सिद्धि
    ६ लाजा(खील)-राज्य प्राप्ति
    ७ कमल-धन प्राप्ति
    ८ अनार-राजा वश
    ९ बिजौरा-क्षत्रिय वश
    १० नारंगी-वैश्य वश
    ११ पेठा-शूद्र वश
    १२ केला-मंत्री वश
    १३ चम्पा व गुलाब-विश्व वश
    १४ नारियल-सम्पत्ति प्राप्ति
    १५ गुग्गुल-दु:ख नष्ट
    १६ गुड़-मनोरथ सिद्धि
    १७ तिल-अभीष्ट सिद्धि
    १८ क्षीर-धन धान्य प्राप्ति
    १९ आम-जीव वश
    २० बेल फल-अतुल लक्ष्मी प्राप्ति
    २१ ईख-सुख प्राप्ति
    २२ कपूर-कवित्व प्राप्ति
    २३ राई नमक-दु:ख नाश
    २४ घी,तिल,चावल-शांति प्राप्ति
    २५ केशर,कुमकुम,कपूर-रूप प्राप्ति।
    २६ मालती फूल-वागीशता की प्राप्ति होती
    अग्निवास का मुहूर्त जानना – होम,यज्ञ या हवन आदि में
    कोई भी अनुष्ठान के पश्चात हवन करने का शास्त्रीय विधान है
    और हवन करने हेतु भी कुछ नियम बताये गए हैं जिसका अनुसरण करना अति – आवश्यक है ,
    अन्यथा अनुष्ठान का दुष्परिणाम भी आपको झेलना पड़ सकता है ।
    इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात है हवन के दिन ‘अग्नि के वास ‘ का पता करना ताकि हवन का शुभ फल आपको प्राप्त हो सके ।
    1-जिस दिन आपको होम करना हो , उस दिन की तिथि और वार की संख्या को जोड़कर 1 जमा (1 जोड़ ) करें फिर कुल जोड़ को 4 से भाग देवें- अर्थात् शुक्ल प्रतिपदा से वर्तमान तिथि तक गिनें तथा एक जोड़े , रविवारसे दिन गिने पुनः दोनों को जोड़कर चार का भाग दें।
    2-यदि शेष शुन्य (0) अथवा 3 बचे, तो अग्नि का वास पृथ्वी पर होगा और इस दिन होम करना कल्याणकारक होता है ।
    3-यदि शेष 2 बचे तो अग्नि का वास पाताल में होता है और इस दिन होम करने से धन का नुक्सान होता है ।
    4-यदि शेष 1बचे तो आकाश में अग्नि का वास होगा, इसमें होम करने से आयु का क्षय होता है ।
    अतः यह आवश्यक है की होम में अग्नि के वास का पता करने के बाद ही हवन करें ।
    5-शास्त्रीय विधान के अनुसार वार की गणना रविवार से तथा तिथि की गणना शुक्ल-पक्ष की प्रतिपदा से करनी चाहिए।
    6-मान लो आज हम कृष्ण पक्ष की चौथी तिथि मे चल रहे है तो।
    शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा तक 15 तिथि तो कुल योग
    आया 15 + 4 + 1 = 20 आज कौन सा दिन हैं
    और इस दिन को रविवार से गिने।मानलो आज बुधवार हैं
    तो रविवार से गिनने पर बुधवार 3आया ।
    कुल योग 20 + 3 = 23/4 कर दे तो शेषकितना
    बचा । 4 – 23 / 5- 20 । 3 को शेष कहा जायेगा । परिणाम इस प्रकार से होंगे ।
    शेष 0 तो अग्नि का निवास पृथ्वी पर ।
    शेष 1 तो अग्नि का निवास आकाश मे ।
    शेष 2 तो अग्नि का निवास पाताल मे ।
    शेष 3 बचे तो पृथ्वी पर माने ।
    पृथ्वी पर अग्नि वास सुख कारी होता हैं ।
    आकाश मे प्राणनाश और पाताल मे धन नाश होता हैं । मतलब हमें वह तिथि चुनना हैं जिस तिथि मे शेष 3 बचे । वह तिथि ही लाभकारी होगी।
    इस तरह से अग्नि वास का पता हमें लगाना हैं।
    समस्याएं आपकी समाधान हमारा

  • Homahuti

    Homahuti

    Many astrologers requested to include homahuti into panchangam. This is based on the distance between the sun’s nakshatra and the moon’s nakshatra. It is auspicious to do shanti karma/ shraut karma when the fire location is on earth and the ahuti goes to Budha — showers intelligence.,  Venus –> all material wishes fulfilled, worldly wealth property. Jupiter ->  fulfillment of desires. moon->crops will be inundated, Sun->destruction of auspicious effects, Mars->fear of fire, Saturn->destruction of wealth, Rahu/ketu-> loss of every kind, famine, health troubles.

    However, please remember for performing devi yaaga different chakra is used.

    If you find any discrepancy please let us know.

  • अग्निवास का फल

    विभिन्न स्थानों पर अग्निवास का फल- 

    • पृथ्वी पर अग्नि का वास सुखकारी होता है। 
    • आकाश में अग्नि का वास कष्टकारी होता है। 
    • पाताल में अग्नि का निवास धन- सम्पत्ति का नाश करता है। 

    किन वस्तुओं से होम करने से क्या लाभ होता है 

    • शान्ति की स्थापना हेतु पीपल के पत्ते, गिलोय अथवा घी के द्वारा होम करना चाहिए। 
    • शारीरिक पुष्टता हेतु बिल्वपत्र, चमेली का पुष्प अथवा घी से हवन करना चाहिए। 
    • सुन्दर स्त्री प्राप्ति हेतु कमल पुष्प से हवन करना चाहिए। 
    • आकर्षण हेतु पलाश पुष्प से हवन करना श्रेयस्कर है। 

    किस कार्य में कौन से हवन कुण्ड का उपयोग करना चाहिए 

    • शान्ति कार्यों में स्वर्ण, रजत अथवा तांबे का हवन कुण्ड उत्तम है। 
    • अभिचार- (अनिष्ट कार्यों की सिद्धि के लिए जादू, टोना आदि) लोहे का हवन कुण्ड उत्तम है। 
    • उच्चाटन- (भूत, प्रेत, डाकिनी के उत्पात या कुदृष्टि से उत्पन्न रोगों के निवारण के लिए) मिट्टी का हवन कुण्ड होना चाहिए। 

    किस क्रिया में किस नाम की अग्नि का आवाहन किया जाना चाहिए 

    • शान्ति कार्यों में वरदा नामक की अग्नि स्थापना की जाती है। 
    • विवाह में योजक नामक अग्नि का आवाहन होता है। 
    • पूर्णाहुति में (मृडा) शतमंगल नाम की अग्नि का आवाहन किया जाता है। 
    • वशीकरण में कामद नाम की अग्नि की स्थापना होती है। 
    • अभिचार कार्यों में क्रोध नाम की अग्नि की स्थापना होती है। 
    • इसके अलावा भी और भी अग्नियों का नाम है जो विभिन्न संस्कारों में आवाहन किया जाता है। 

    अग्नि स्थापन का मन्त्र 

    ॐ अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे। देवां२आ सादयादिह। 

    इस वैदिक मन्त्र के द्वारा अग्नि नारायण का आवाहन किया जाता है। 

    अग्नि का ध्यान मन्त्र 

    ॐ चत्वारि श्रृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य।  
    त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्यां२ आविवेश। 

    ॐ मुखं य: सर्वदेवानां हव्यभुक् कव्यभुक् तथा। 
    पितृणां च नमस्तस्मै विष्णवे पावकात्मने।। 

    ऐसा ध्यान करते हुए – ‘ॐ अग्ने शाण्डिल्य गोत्र मेषध्वज प्राङ्मुख मम सम्मुखो भव‘।