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  • कड़े का मूल चमत्कार

    कड़े का मूल चमत्कार
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    कड़ा हनुमानजी का प्रतीक है। पीतल और तांबा मिश्रित धातु का कड़ा पहनने से सभी तरह के भूत-प्रेत आदि नकारात्मक शक्तियों से व्यक्ति की रक्षा होती है।

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    इसके अलावा हाथ में कड़ा धारण करने से कई तरह की बीमारियों से भी रक्षा होती है। जो व्यक्ति बार-बार बीमार होता है उसे सीधे हाथ में अष्टधातु का कड़ा पहनना चाहिए। मंगलवार को अष्टधातु का कड़ा बनवाएं। इसके बाद शनिवार को वह कड़ा लेकर आएं। शनिवार को ही किसी भी हनुमान मंदिर में जाकर कड़े को बजरंग बली के चरणों में रख दें। अब हनुमान चालीसा का पाठ करें। इसके बाद कड़े में हनुमानजी का थोड़ा सिंदूर लगाकर बीमार व्यक्ति स्वयं सीधे हाथ में पहन लें।

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    ध्यान रहे, यह कड़ा हनुमानजी का आशीर्वाद स्वरूप है अत: अपनी पवित्रता पूरी तरह बनाए रखें। कोई भी अपवित्र कार्य कड़ा पहनकर न करें अन्यथा कड़ा प्रभावहीन हो जाता है ।

  • फाल्गुन पूर्णिमा 2026: फाल्गुन पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण तो फिर कैसे करेंगे स्नान-दान? सुबह से ही लगेगा सूतक काल, जानें क्या करें🕉️

    🕉️फाल्गुन पूर्णिमा 2026: फाल्गुन पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण तो फिर कैसे करेंगे स्नान-दान? सुबह से ही लगेगा सूतक काल, जानें क्या करें🕉️
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    ⭕हिंदू धर्म में फाल्गुन पूर्णिमा को बेहद शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है। वहीं पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण का साया रहेगा। वहीं ग्रहण के कारण सभी भक्तों में मन में कंफ्यूजन है कि पूर्णिमा के दिन ग्रहण है तो फिर स्नान और दान कैसे करेंगे और पूजा-पाठ किस तरह किया जाएगा?

    आइए इस लेख में विस्तार जानते हैं कि फाल्गुन पूर्णिमा के दिन स्नान और दान कब और कैसे करें और इसका महत्व क्या है?

    ⚜️चंद्र ग्रहण का साया और फाल्गुन पूर्णिमा के दिन स्नान-दान का महत्व
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    हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन मास की पूर्णिमा का विशेष महत्व है। •इसी दिन होलिका दहन होता है। वहीं •इस साल फाल्गुन पूर्णिमा 3 मार्च को पड़ रही है और चंद्र ग्रहण भी इसी दिन फाल्गुन पूर्णिमा पड़ रही है। लेकिन इस बार इस पावन तिथि पर चंद्र ग्रहण लग रहा है, जिससे सूतक काल और पूजा की विधियों में बदलाव आएगा।

    ⚜️फाल्गुन पूर्णिमा पर कैसे करें स्नान और दान?
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    ग्रहण के साये में भी फाल्गुन पूर्णिमा का पुण्य फल प्राप्त किया जा सकता है। चूंकि पूर्णिमा तिथि सुबह से लग जाएगी, इसलिए ग्रहण के सूतक काल शुरू होने से पहले ही पवित्र नदियों में स्नान कर लेना श्रेष्ठ है। यदि घर पर स्नान कर रहे हैं, तो पानी में गंगाजल मिला लें।

    ग्रहण काल समाप्त होने के बाद दान करना •’अक्षय पुण्य’ देता है। 3 मार्च की शाम या अगले दिन सुबह सफेद वस्तुओं का दान करना चंद्रमा को मजबूत करता है और दोषों का निवारण करता है। साथ ही व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

    ⚜️फाल्गुन पूर्णिमा के दिन स्नान-दान का मुहूर्त
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    🚩पूर्णिमा तिथि प्रारंभ- 3 मार्च 2026, सुबह 03:55 बजे से

    🚩पूर्णिमा तिथि समाप्त- 4 मार्च 2026, रात 01:50 बजे तक

    🚩स्नान के लिए मुहूर्त- सुबह 05:05 से 05:54 तक

    🚩दान के लिए मुहूर्त- दोपहर 12:09 से 12:56 तक

    ⚜️सूतक कब से हो रहा है शुरू?
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    🚩सूतक शुरू- 3 मार्च 2026, सुबह 9:39 से

    🚩सूतक समाप्त- 3 मार्च 2026, शाम 6:46

    ⚜️फाल्गुन पूर्णिमा का महत्व क्या है?
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    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा विधिवत रूप से पूजा करने से पितरों को मोक्ष मिलता है और घर में सुख-समृद्धि आती है। चंद्र ग्रहण के कारण इस बार संयम और साधना का महत्व दोगुना हो गया है।
    🚩#हरिऊँ🚩
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  • फुलेरादौज आज

    फुलेरादौज आज


    पौराणिक कथा के अनुसार, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण ने राधा रानी और गोपियों के संग फूलों की होली खेली थी। इसलिए इस दिन फुलेरा दूज का पर्व उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर ब्रज के मंदिरों में खास रौनक देखने को मिलती है और मंदिरो को फूलों से सुंदर तरीके से सजाया जाता है। 

    शुभ मुहूर्त और तारीख

    हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि इस बार 18 फरवरी 2026 की शाम 04:57 बजे से शुरू होगी और 19 फरवरी को दोपहर 03:58 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि की मान्यताओं का पालन करते हुए, फुलेरा दूज का मुख्य उत्सव 19 फरवरी 2026 यानी गुरुवार को मनाया जाएगा।
    इस दिन को शास्त्रों में ‘अबूझ मुहूर्त’ कहा गया है, जिसका अर्थ है कि आज के दिन कोई भी मांगलिक कार्य- जैसे विवाह, मुंडन या गृह प्रवेश- बिना पंचांग देखे किया जा सकता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यह दिन दोषमुक्त होता है और इस दिन शुरू किए गए कार्यों में सफलता की संभावना प्रबल रहती है।

    फुलेरा दूज पर किए जाने वाले शुभ कार्य

    • शास्त्रों के अनुसार, इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और राधा-कृष्ण के पूजन का संकल्प लें।
    • पूजा में ताजे और सुगंधित फूलों का उपयोग अनिवार्य है। भगवान श्री कृष्ण को पीले फूल विशेष रूप से अर्पित करें क्योंकि यह उन्हें अत्यंत प्रिय हैं।
    • ठाकुर जी को प्रेमपूर्वक गुलाल का टीका लगाएं।
    • भगवान की कमर पर गुलाल से भरी एक छोटी पोटली बांधने की परंपरा निभाएं, जो होली के आगमन का संकेत देती है।
    • प्रसाद में माखन-मिश्री, पोहा या सफेद मिठाइयों का भोग लगाना उत्तम माना गया है।

    इन बातों का रखें खास ध्यान

    मान्यताओं के अनुसार, इस दिन काले या गहरे रंग के कपड़ों से पूरी तरह परहेज करना चाहिए। घर में सात्विक भोजन ही बनाएं और तामसिक चीजों (मांस-मदिरा) से दूर रहें। इसके अलावा, किसी भी व्यक्ति का अपमान न करें और मन में ईर्ष्या या क्रोध जैसे भाव न लाएं, क्योंकि यह दिन प्रेम और क्षमा का प्रतीक है।

    विवाह में आ रही बाधा दूर

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, फुलेरा दूज के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने राधा रानी की पूजा-अर्चना करने से जातक के विवाह में आ रही बाधा दूर होती है और पति-पत्नी के रिश्ते में मधुरता आती है। साथ ही प्रभु की कृपा से प्राप्त होती है। इस दिन दान करने का भी विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि दान करने से धन लाभ के योग बनते हैं और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।

  • भौमवती अमावस्या एवं सूर्य ग्रहण :

    भौमवती अमावस्या एवं सूर्य ग्रहण : शास्त्रसम्मत विस्तृत विवेचन

    इस वर्ष भौमवती अमावस्या का पावन पर्व 17 फरवरी, मंगलवार को मनाया जाएगा। मंगलवार को पड़ने वाली अमावस्या को भौमवती अमावस्या कहा जाता है, जो शास्त्रों में अत्यंत दुर्लभ, सिद्धिदायक और महापुण्यकारी मानी गई है।

    🌊 गंगा स्नान का अद्भुत महत्व
    भौमवती अमावस्या के दिन गंगा स्नान का विशेष विधान है।
    शास्त्रों में कहा गया है कि—

    इस दिन गंगा में स्नान करने से
    सौ करोड़ सूर्य ग्रहणों में दान करने के समान पुण्य प्राप्त होता है।

    यदि गंगा स्नान संभव न हो, तो
    निकटवर्ती नदी, तालाब, कुआँ
    अथवा गंगाजल मिश्रित जल से स्नान अवश्य करें।

    यह स्नान पापक्षय, पितृ शांति और ग्रहदोष निवारण में अत्यंत सहायक होता है।

    ☀️ सूर्य ग्रहण को लेकर शास्त्रीय मत
    इस दिन सूर्य ग्रहण अवश्य है, परंतु—
    यह भारत की संपूर्ण भूमि पर दृश्य नहीं होगा
    इसलिए सूतक, दान-नियम या ग्रहण काल की कोई मान्यता नहीं मानी जाएगी
    पूजा-पाठ, जप, स्नान आदि पूर्णतः मान्य रहेंगे
    👉 अतः किसी भी प्रकार के भ्रम या भय से बचें।

    🪔 पितृ दोष, मंगल दोष एवं अन्य ग्रह बाधाओं का निवारण

    भौमवती अमावस्या विशेष रूप से उन जातकों के लिए फलदायी है जिनकी कुंडली में—
    पितृ दोष
    मंगल दोष
    कालसर्प दोष
    ऋण, रोग या दरिद्रता योग
    विद्यमान हों।

    इस दिन किए गए दान, जप, तर्पण और देवी उपासना से दोषों की तीव्रता में भारी कमी आती है।

    🌙 शतभिषा नक्षत्र का दुर्लभ रात्रिकालीन योग
    इस वर्ष भौमवती अमावस्या की रात्रि में शतभिषा नक्षत्र का विशेष संयोग बन रहा है। (रात्रि को लगभग 21:15 के बाद)
    इस योग का उल्लेख मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत दुर्गासप्तशती में अत्यंत स्पष्ट रूप से मिलता है

    “भौमावस्या निशामग्रे चन्द्रे चन्द्रे शतभिषां गते।
    विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां पदम्॥”

    🔍 भावार्थ
    जब भौमवती अमावस्या की अर्धरात्रि में चंद्रमा शतभिषा नक्षत्र में स्थित हो, तब किया गया देवी स्तोत्र-पाठ महान धन, ऐश्वर्य, सुख और सिद्धि प्रदान करने वाला योग बनाता है।

    📿 क्या करें इस शुभ योग में? (सरल उपाय)
    इस विशेष रात्रि में—

    1. स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
    2. देवी दुर्गा का पूजन करें
    3. दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का पाठ करें
    4. संभव हो तो दीपदान अवश्य करें

    🔱 फल
    इस साधना से—
    दैहिक (शारीरिक कष्ट)
    दैविक (ग्रह, भाग्य, अदृश्य बाधाएँ)
    भौतिक (धन, परिवार, समाज)
    👉 तीनों प्रकार के तापों से मुक्ति प्राप्त होती है तथा जीवन में शांति, सुरक्षा और समृद्धि आती है।

    माँ जगदंबा की कृपा से यह भौमवती अमावस्या आप सभी के जीवन में मंगल, आरोग्य और ऐश्वर्य प्रदान करे।

  • भौमवती अमावस्या

    भौमवती अमावस्या


    ज्योतिष शास्त्र में जो 16 तिथियां बताई गई हैं, इनमें से अमावस्या भी एक है। इस तिथि के स्वामी पितृ हैं, इसलिए इसका विशेष महत्व धर्म ग्रंथों में बताया गया है। जब भी किसी महीने की अमावस्या मंगलवार को पड़ती है तो इसे भौमवती अमावस्या कहते हैं। भौम का अर्थ है मंगल ग्रह। भौमवती अमावस्या पितरों के तर्पण, पूजा, उपाय आदि के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।

    कब है भौमवती अमावस्या?

    पंचांग के अनुसार 17 फरवरी को फाल्गुन मास की अमास्या तिथि दिन भर रहेगी। इस दिन मंगलवार होने से ये भौमवती अमावस्या कहलाएगी। खास बात ये है कि इस तिथि सूर्य ग्रहण भी होगा लेकिन भारत में दिखाई न देने के कारण यहां इसका कोई भी महत्व नहीं माना जाएगा। इस दिन कईं शुभ योग भी बनेंगे, जिससे भौमवती अमावस्या का महत्व और भी बढ़ गया है।

    भौमवती अमावस्या 2026 शुभ मुहूर्त

    अमावस्या तिथि पर पवित्र नदी में स्नान करने और जरूरतमंदों को दान करने का विशेष महत्व है। इस दिन स्नान के लिए ब्रह्म मुहूर्त सुबह 05:24 से 06:12 तक रहेगा। इसके बाद अमृत काल सुबह 10:39 से दोपहर 12:17 तक रहेगा। इस दिन अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:18 से 01:03 तक रहेगा।

    भौमवती अमावस्या का महत्व

    भौमवती अमावस्या का महत्व अनेक धर्म ग्रंथों में बताया गया है। जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष है वे यदि इस दिन कुछ खास उपाय करें तो उनके जीवन में चल रही परेशानियां काफी हद तक कम हो सकती है। इसके अलावा भौमवती अमावस्या पर किया गया दान, उपाय, मंत्र जाप आदि का भी कई गुना फल प्राप्त होता है।

    भौमवती अमावस्या पर क्या करें?

    1. जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष हैं वे भौमवती अमावस्या पर अपने घर पर या किसी तीर्थ स्थान पर तर्पण, श्राद्ध आदि करें।
    2. जिन लोगों की जन्म कुंडली में मंगल अशुभ स्थान पर है या मांगलिक दोष है वे इस दिन मंगल ग्रह के उपाय करें तो इनके जीवन में चल रही परेशानी दूर हो सकती है।
    3. भौमवती अमावस्या को दान के लिए भी श्रेष्ठ तिथि माना गया है।
    4. भौमवती अमावस्या पर गाय को हरा चारा खिलाना चाहिए। अगर ऐसा न कर पाएं तो किसी गौशाला में पैसों का दान करें।

  • मंगल और राहु का संघर्षकारी योग

    मंगल और राहु का संघर्षकारी योग
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    ज्योतिष में मंगल को क्रोध, वाद विवाद, लड़ाई झगड़ा, हथियार, दुर्घटना, एक्सीडेंट, अग्नि, विद्युत आदि का कारक ग्रह माना गया है तथा राहु को आकस्मिकता, आकस्मिक घटनाएं, शत्रु, षड़यंत्र, नकारात्मक ऊर्जा, तामसिकता, बुरे विचार, छल, और बुरी आदतों का कारक ग्रह माना गया है, इसलिए फलित ज्योतिष में मंगल और राहु के योग को बाहुत नकारात्मक और उठापटक कराने वाला योग माना गया है मंगल और राहु स्वतंत्र रूप से अलग अलग इतने नाकारात्मक नहीं होते पर जब मंगल और राहु का योग होता है तो इससे मंगल और राहु की नकारात्मक प्रचंडता बहुत बढ़ जाती है जिस कारण यह योग विध्वंसकारी प्रभाव दिखाता है, मंगल राहु का योग प्राकृतिक और सामाजिक उठापटक की स्थिति तो बनाता ही है पर व्यक्तिगत रूप से भी मंगल राहु का योग नकारात्मक परिणाम देने वाला ही होता है।

    यदि जन्मकुंडली में मंगल और राहु एक साथ हो अर्थात कुंडली में मंगल राहु का योग हो तो सर्वप्रथम तो कुंडली के जिस भाव में यह योग बन रहा हो उस भाव को पीड़ित करता है और उस भाव से नियंत्रित होने वाले घटकों में संघर्ष की स्थिति बनी रहती है उदाहरण के लिए यदि कुंडली के लग्न भाव में मंगल राहु का योग हो तो ऐसे में स्वास्थ पक्ष की और से हमेशा कोई न कोई समस्या लगी रहेगी, धन भाव में मंगल राहु का योग होने पर आर्थिक संघर्ष और क़ुतुब के सुख में कमी होगी इसी प्रकार पंचम भाव में मंगल राहु का योग शिक्षा और संतान पक्ष को बाधित करेगा।

    इसके अलावा कुंडली में मंगल राहु का योग होने से व्यक्ति का क्रोध विध्वंसकारी होता है, समान्य रूप से तो प्रत्येक व्यक्ति को क्रोध आता है पर कुंडली में राहु मंगल का योग होने पर व्यक्ति का क्रोध बहुत प्रचंड स्थिति में होता है और व्यक्ति अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं कर पाता और बहुत बार क्रोध में बड़े गलत कदम उठा बैठता है, कुंडली में मंगल राहु का योग होने पर जीवन में दुर्घटनाओं की अधिकता होती है और कई बार दुर्घटना या एक्सीडेंट का सामना करना पड़ता है कुंडली में मंगल राहु का योग होने पर व्यक्ति को वहां चलाने में भी सावधानी बरतनी चाहिए , कुंडली में मंगल राहु का योग होने पर व्यक्ति को शत्रु और विरोधियों की और से भी बहुत समस्याएं रहती है और जीवन में वाद विवाद तथा झगड़ों की अधिकता होती है, कुंडली में मंगल राहु का योग बड़े भाई के सुख में कमी या वैचारिक मतभेद उत्पन्न करता है और मंगल राहु के योग के नकारात्मक परिणाम के कारण ही व्यक्ति को जीवन में कर्ज की समस्या का भी सामना करना पड़ता है, इसके अलावा यदि स्त्री जातक की कुंडली में मंगल राहु का योग हो तो वैवाहिक जीवन को बिगड़ता है स्त्री की कुंडली में मंगल पति और मांगल्य का प्रतिनिधि ग्रह होता है और राहु से पीड़ित होने के कारण ऐसे में पति सुख में कमी या वैवाहिक जीवन में संघर्ष की स्थिति बनी रहती है, जिन लोगो की कुंडली में मंगल राहु का योग होता है उन्हें अक्सर जमीन जायदात से जुडी समस्याएं भी परेशान करती हैं इसके अलावा मंगल राहु का योग हाई बी.पी. मांसपेशियों की समस्या, एसिडिटी, अग्नि और विद्युत दुर्घटना जैसी समस्याएं भी उत्पन्न करता है l

    तो यहाँ हमने देखा की मंगल और राहु का योग किस प्रकार की समस्याएं उत्पन्न करता है यदि कुंडली में मंगल राहु के योग के कारण समस्याएं उत्पन्न हो रही हो तो निम्नलिखित उपाय लाभकारी होंगे –

    सामान्य उपाय
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    1. ॐ अंग अंगारकाय नमः का नियमित जाप करें।
    2. हनुमान चालीसा का पाठ करें।
    3. प्रत्येक शनिवार को साबुत उडद का दान करें।
    4. प्रत्येक मंगलवार को गाय को गुड़ खिलाएं।
    5. प्रतिदिन मस्तक पर सफ़ेद चन्दन का तिलक लगाएं।

    ।। श्री हनुमते नमः।।

  • शिवरात्रि सरल पूजन विधि-

    🕉️🔱सभी शिव भक्तों को
    पावन व्रत महाशिवरात्रि
    की हार्दिक शुभकामनाएं !

    शिवरात्रि सरल पूजन विधि-
    कल रविवार सुबह नहा धोकर भगवान शिव का पूजन करें, पंचोपचार पूजन करें, फिर शिवरात्रि का व्रत करने का संकल्प लें। संकल्प में स्पष्ट कहें कि व्रत जलाहार, फलाहार या निराहार जैसे रहना हो कहैं।

    दिन भर, नमः शिवाय या ॐ नमः शिवाय। मानसिक जप करते रहें, शाम होने पर फिर से शिवजी का पंचोपचार पूजन करें, फिर रात मे प्रथम प्रहर होने पर शिवजी का पूजन चन्दन चावल काले तिल कमल और कनेर के फूल से करें।
    ॐ भवाय नमः
    ॐ शर्वाय नमः
    ॐ रूद्राय नमः
    ॐ पशुपताय नमः
    ॐ उग्राय नमः
    ॐ महानाय नमः
    ॐ भीमाय नमः
    ॐ ईषानाय नमः
    इन आठ नामो का जाप करें। नैवेध मे पकवान अर्पित करें। नारियल और पान के साथ अर्घ्य दें।
    ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करते रहें।

    दूसरे प्रहर लगने पर शिवजी का तिल जौ कमल पुष्प विल्वपत्र द्वारा पूजन करें। खीर का नैवेद्य प्रदान करें। बिजौरा नीबू के साथ अर्घ्य दें, ॐ नमः शिवाय का प्रथम प्रहर की अपेक्षा दुगना मंत्र जाप करें।

    तीसरे प्रहर होने पर फिर से शिवजी का गेहूं, आक के फूल, कमल पुष्प, विल्वपत्र, तिल द्वारा पूजन करें। पुऐ का नैवेध एवं शाक अर्पित करें। कपूर से आरती करें अनार के फल के साथ अर्घ्य दें। ॐ नमः शिवाय का दूसरे प्रहर की अपेक्षा दुगने मंत्र का जाप करें।

    चतुर्थ प्रहर होने पर शिवजी का उडद, कागनी मूगं, सप्तधान, शंखपुष्पी, विल्वपत्र से पूजा करें। उडद के बडै, मिठाई का नैवेध प्रदान करें। केले के साथ अर्घ्य दें। तीसरे प्रहर की अपेक्षा ॐ नमः शिवाय का आठ गुना मंत्र का जाप करें फिर सुबह होने तक जाप भजन करते रहें। सुबह फिर भगवान शिव का पूजन करें और पूजन का विसर्जन करें तथा क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।

    शिवलिंग पर पूजा करने वाले साधक प्रत्येक पूजा मे शिवलिंग को दूध दही घी शहद शक्कर गंगाजल गन्ना का रस शुद्ध पानी आदि से स्नान कराये या जो सुलभ हो जाये उससे करा लें।

    पूजन मे कोई सामग्री ना मिले तो जो मिल जाये उसी से पूजन करें। प्रथम प्रहर मे जाप उतना ही करें जितने का चौथे प्रहर मे आठ गुना जाप कर सकें।

    किसी कामना के लिये पूजन करना चाहते हैं तो संकल्प में स्पष्ट बोल दें शिव जी की कृपा से वो कामना अवश्य ही शीघ्र पूरी हो जायेगी। प्रत्येक प्रहर मे धूप दीप अवश्य दें। शिवरात्रि का पूजन आप परिवार सहित करें, मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
    🕉️🙏🚩🕉️🙏🚩🕉️🚩

  • महाशिवरात्रि पर्व पर शिवलिंग व जल अर्पण

    महाशिवरात्रि पर्व पर शिवलिंग व जल अर्पण
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    शास्त्रों में कहा गया है कि शिव कृपा पाने के लिए पूरे नियम से शिवलिंग पर जल अर्पित करना चाहिए क्योंकि जल धारा भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है और नियम से इसे शिवलिंग पर चढ़ाने से भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

    🔹किस दिशा की ओर चढ़ाएं जल-:

    • शिवलिंग पर जल उत्तर दिशा की ओर मुंह करके जल चढ़ाएं क्योंकि उत्तर दिशा को शिव जी का बायां अंग माना जाता है जो माता पार्वती को समर्पित है। इस दिशा की ओर मुंह करके जल अर्पित करने से भगवान शिव और माता पार्वती दोनों की कृपा दृष्टि प्राप्त होती है।

    🔹कौन से पात्र से अर्पित करें जल-:

    • शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय सबसे ज्यादा ध्यान में रखने वाली बात ये है कि आप किस पात्र से जल अर्पित करें। जल चढ़ाने के लिए सबसे अच्छे पात्र तांबे, चांदी और कांसे के माने जाते हैं। स्टील के पात्र से शिवलिंग पर जल नहीं चढ़ाना चाहिए। जल अर्पण के लिए सर्वोत्तम पात्र तांबे का है। इसलिए इसी पात्र से जल चढ़ाना उत्तम है। लेकिन तांबे के पात्र से शिव जी को दूध न चढ़ाएं क्योंकि तांबे में दूध विष के समान बन जाता है।

    🔹कभी भी शिवलिंग पर तेजी से जल नहीं चढ़ाना चाहिए-:

    • शास्त्रों में भी बताया गया है कि शिव जी को जल धारा अत्यंत प्रिय है। इसलिए जल चढ़ाते समय ध्यान रखें कि जल के पात्र से धार बनाते हुए धीरे से जल अर्पित करें। पतली जल धार शिवलिंग पर चढाना ज्यादा उचित रहता है।

    🔹बैठकर चढ़ाएं जल-:

    • हमेशा शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय ध्यान रखें कि बैठकर ही जल अर्पित करें। यहां तक कि रुद्राभिषेक करते समय भी खड़े नहीं होना चाहिए। खड़े होकर जल चढ़ाने पर शिवजी के ऊपर जल गिरने के बाद हमारे पैरों में उसके छींटें लगते हैं जो सही नहीं है।

    🔹जल के साथ कुछ और न मिलाएं-:

    • कभी भी शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए जल के पात्र में कोई अन्य सामग्री न मिलाएं। कोई भी सामग्री जैसे पुष्प, अक्षत या रोली जल में मिलाने से उनकी पवित्रता ख़त्म हो जाती है। इसलिए भगवान शिव की कृपा दृष्टि पाने के लिए हमेशा जल को अकेले ही चढ़ाना चाहिए। लेकिन जल में कुछ बूंदे नमर्दा या गंगा आदि पवित्र नदियों की जरूर मिलानी चाहिए।

    🔹 वस्तु अर्पित करने के बाद जल चढ़ाएं-:

    • आप यदि भगवान शिव को शहद, दूध, दही या किसी प्रकार का रस अर्पित करते हैं तो वह जल में ना मिलाएं।कोई भी वस्तु भगवान को अलग से चढ़ाएं फिर उसके बाद में जल अर्पित करें।

    🔹देसी गाय का दूध ही काम लें-:

    • शिवलिंग पर केवल शुद्ध देसी भारतीय गाय का कच्चा दूध ही चढ़ाना चाहिए, अन्य प्रकार का दूध बिल्कुल भी ना चढ़ाएं।

    कल माता पार्वती व बाबा भोलेनाथ को समर्पित महाशिवरात्रि का महापर्व है, अतः आप इस पवित्र महापर्व के शुभ अवसर पर पूर्ण समर्पित भाव से भोलेनाथ की पूजा- उपासना करके आनंद प्राप्त करें।

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  • शिवलिंग व जल अर्पण

    🕉️शिवलिंग व जल अर्पण🕉️

    शास्त्रों में कहा गया है कि शिव कृपा पाने के लिए पूरे नियम से शिवलिंग पर जल अर्पित करना चाहिए क्योंकि जल धारा भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है और नियम से इसे शिवलिंग पर चढ़ाने से भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

    🔹किस दिशा की ओर चढ़ाएं जल-:

    • शिवलिंग पर जल उत्तर दिशा की ओर मुंह करके जल चढ़ाएं क्योंकि उत्तर दिशा को शिव जी का बायां अंग माना जाता है जो माता पार्वती को समर्पित है। इस दिशा की ओर मुंह करके जल अर्पित करने से भगवान शिव और माता पार्वती दोनों की कृपा दृष्टि प्राप्त होती है।

    🔹कौन से पात्र से अर्पित करें जल-:

    • शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय सबसे ज्यादा ध्यान में रखने वाली बात ये है कि आप किस पात्र से जल अर्पित करें। जल चढ़ाने के लिए सबसे अच्छे पात्र तांबे, चांदी और कांसे के माने जाते हैं। स्टील के पात्र से शिवलिंग पर जल नहीं चढ़ाना चाहिए। जल अर्पण के लिए सर्वोत्तम पात्र तांबे का है। इसलिए इसी पात्र से जल चढ़ाना उत्तम है। लेकिन तांबे के पात्र से शिव जी को दूध न चढ़ाएं क्योंकि तांबे में दूध विष के समान बन जाता है।

    🔹कभी भी शिवलिंग पर तेजी से जल नहीं चढ़ाना चाहिए-:

    • शास्त्रों में भी बताया गया है कि शिव जी को जल धारा अत्यंत प्रिय है। इसलिए जल चढ़ाते समय ध्यान रखें कि जल के पात्र से धार बनाते हुए धीरे से जल अर्पित करें। पतली जल धार शिवलिंग पर चढाना ज्यादा उचित रहता है।

    🔹बैठकर चढ़ाएं जल-:

    • हमेशा शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय ध्यान रखें कि बैठकर ही जल अर्पित करें। यहां तक कि रुद्राभिषेक करते समय भी खड़े नहीं होना चाहिए। खड़े होकर जल चढ़ाने पर शिवजी के ऊपर जल गिरने के बाद हमारे पैरों में उसके छींटें लगते हैं जो सही नहीं है।

    🔹जल के साथ कुछ और न मिलाएं-:

    • कभी भी शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए जल के पात्र में कोई अन्य सामग्री न मिलाएं। कोई भी सामग्री जैसे पुष्प, अक्षत या रोली जल में मिलाने से उनकी पवित्रता ख़त्म हो जाती है। इसलिए भगवान शिव की कृपा दृष्टि पाने के लिए हमेशा जल को अकेले ही चढ़ाना चाहिए। लेकिन जल में कुछ बूंदे नमर्दा या गंगा आदि पवित्र नदियों की जरूर मिलानी चाहिए।

    🔹 वस्तु अर्पित करने के बाद जल चढ़ाएं-:

    • आप यदि भगवान शिव को शहद, दूध, दही या किसी प्रकार का रस अर्पित करते हैं तो वह जल में ना मिलाएं।कोई भी वस्तु भगवान को अलग से चढ़ाएं फिर उसके बाद में जल अर्पित करें।

    🔹देसी गाय का दूध ही काम लें-:

    • शिवलिंग पर केवल शुद्ध देसी भारतीय गाय का कच्चा दूध ही चढ़ाना चाहिए, अन्य प्रकार का दूध बिल्कुल भी ना चढ़ाएं।

    , 15 फरवरी, रविवार को माता पार्वती व बाबा भोलेनाथ को समर्पित महाशिवरात्रि का महापर्व है, अतः आप इस पवित्र महापर्व के शुभ अवसर पर पूर्ण समर्पित भाव से भोलेनाथ की पूजा- उपासना करके आनंद प्राप्त करें। ☘️

  • महाशिवरात्रि के दिन राशि के अनुसार जप करने हेतु शिव मंत्र ।

    ।। महाशिवरात्रि के दिन राशि के अनुसार जप करने हेतु शिव मंत्र ।।

    इस बार शिवरात्रि शनिवार १५ फरवरी २०२६ को मनाना शुभ होगा। महाशिवरात्रि के दिन उपवास और शिव पूजन करने से आपकी सभी इच्छाएं पूरी होंगी, आपकी तरक्की होगी और आपकी सभी समस्याओं का हल निकलेगा। प्रस्तुत है विभिन्न राशि वालों के लिए महाशिवरात्रि के दिन जप करने हेतु शिव मंत्र-

    मेष राशि-
    महाशिवरात्रि के दिन आप शिवजी के अघोर मंत्र का जाप करें। मंत्र है-
    ॐ अघोरेभ्यो अथघोरेभ्यो, घोर घोर तरेभ्यः। सर्वेभ्यो सर्व शर्वेभ्यो, नमस्ते अस्तु रूद्ररूपेभ्यः।।

    वृष राशि-
    इस राशि वालों को इस मंत्र का जाप करना चाहिए-
    ॐ शं शंकराय भवोद्भवाय शं ॐ नमः।।

    मिथुन राशि-
    इस राशि वालों को इस मंत्र का जाप करना चाहिए-
    ॐ शिवाय नमः ॐ।।

    कर्क राशि-
    इस मंत्र का जाप करें-
    ॐ शं शिवाय शं ॐ नमः।।

    सिंह राशि-
    महाशिवरात्रि के दिन आप इस मंत्र का जाप करें-
    नमामिशमीशान निर्वाण रूपं विभुं व्यापकं ब्रह्म वेद स्वरूपं।।

    कन्या राशि-
    इस दिन शिव जी के त्र्यम्बक मंत्र का जाप करना चाहिए। मंत्र है-
    ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।

    तुला राशि-
    महाशिवरात्रि के दिन तुला राशि वाले इस मंत्र का जाप करें-
    ॐ शं भवोद्भवाय शं ॐ नमः।।

    वृश्चिक राशि-
    वृश्चिक राशि के लोग इस दिन इस मंत्र का जाप करें-
    निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाश माकाश वासं भजेऽहं।।

    धनु राशि-
    धनु राशि वाले इस दिन इन विशेष मंत्र का जाप करें-
    ॐ ऐं ह्रीं क्लीं आं शं शंकराय मम सकल जन्मांतरार्जित पाप विध्वंसनाय श्रीमते आयुः प्रदाय, धनदाय, पुत्रदारादि सौख्य प्रदाय महेश्वराय ते नमः।।

    कष्टं घोर भयं वारय वारय पूर्णायुः वितर वितर मध्ये मा खण्डितं कुरु कुरु सर्वान् कामान् पूरय पूरय शं आं क्लीं ह्रीं ऐं ॐसम संख्याम सावित्रीम् जपेत्।।

    ॐ तत्पुरुषाय च विद्महे, महादेवाय च धीमहि। तन्नो रुद्र प्रचोदयात।।

    मकर राशि-
    मकर राशि वाले महाशिवरात्रि के दिन इस मंत्र का जाप करें-
    ॐ शं विश्वरूपाय अनादि अनामय शं ॐ।।

    कुंभ राशि-
    कुंभ राशि वाले महाशिवरात्रि के दिन इस मंत्र का जाप करें-
    ॐ क्लीं क्लीं क्लीं वृषभारूढ़ाय वामांगे गौरी कृताय क्लीं क्लीं क्लीं ॐ नमः शिवाय।।

    मीन राशि-
    मीन राशि वाले महाशिवरात्रि के दिन इस मंत्र का जाप करें-
    ॐ शं शं शिवाय शं शं कुरु कुरु ॐ।। ।। ॐ नमः शिवाय ।।