You Can Consult me Regarding Your Problems….

.Call Now +91-9910057645 / 7065481958

  • षोडश वर्ग अध्ययन

    षोडश वर्ग अध्ययन

    षोडश वर्ग का फलित ज्योतिष में विशेष महत्व है। जन्मपत्री का सूक्ष्म अध्ययन करने में यह विशेष सहायक है। इन वर्गों के अध्ययन के बिना जन्मकुंडली का विश्लेषण अधूरा होता है क्योंकि जन्म कुण्डली से केवल जातक के शरीर, उसकी संरचना एवं स्वास्थ्य के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है, लेकिन षोडश वर्ग का प्रत्येक वर्ग जातक के जीवन के एक विशिष्ट कारकत्व या घटना के अध्ययन में सहायक होता है। जातक के जीवन के जिस पहलू के बारे में हम जानना चाहते हैं उस पहलू के वर्ग का जब तक हम अध्ययन न करें तो विश्लेषण अधूरा ही रहता है।

    जैसे यदि जातक की सम्पत्ति, संपन्नता आदि के विषय में जानना हो, तो जरूरी है कि होरा वर्ग का अध्ययन किया जाए।

    इसी प्रकार व्यवसाय के बारे में पूर्ण जानकारी के लिए दशमांश की सहायता ली जाए।

    वर्ग क्या है ? वर्ग वास्तव में गहो और लग्न का सूक्ष्म विभाजन है। यह इसलिए भी आवश्यक है की एक लग्न मे कई जातक जन्म लेते है। लेकिन हर एक का गुण, शरीर, धन, पराक्रम, सुख, बुद्धि, भार्या, भाग्य एक सा नही होता। अतः यही जानने के लिए वर्ग बनाये जाते है। एक राशि 30 अंशो की होती है इसके सूक्ष्म विभाजन करने पर कुल सोलह वर्ग बनते है। इनके नाम इस प्रकार है :- 01 लग्न, 02 होरा, 03 द्रेष्काण, 04 चतुर्थांश, 05 सप्तमांश, 06 नवमांश, 07 दशांश, 08 द्वादशंश, 09 षोडशांश, 10 विशांश, 11 चतुर्विंशांश, 12 त्रिशांश, 13 खवेदांश, 14 अक्षवेदांश, 15 भांश, 16 षष्टयांश (1 / 60)

    षट्वर्ग : लग्न, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश, त्रिशांश ये छः वर्ग होते है।
    सप्तवर्ग : उपरोक्त षट्वर्ग मे सप्तांश जोड़ देने पर सप्तवर्ग हो जाते है।
    दसवर्ग : उपरोक्त सप्तवर्ग मे दशांश, षोड़शांश, षष्टयांश जोड़ देने पर दस वर्ग होते है।

    जातक के जीवन के विभिन्न पहलुओं को जानने के लिए किसी विशेष वर्ग का अध्ययन किए बिना फलित गणना में चूक हो सकती है। षोडश वर्ग में सोलह वर्ग होते हैं जो जातक के जीवन के विभिन्न पहलुओं की जानकरी देते हैं। जैसे –

    होरा से सम्पत्ति व समृद्धि;
    द्रेष्काण से भाई-बहन, पराक्रम,
    चतुर्थांश से भाग्य, चल एवं अचल सम्पत्ति,
    सप्तांश से संतान,
    नवांश से वैवाहिक जीवन व जीवन साथी,
    दशांश से व्यवसाय व जीवन में उपलब्धियां,
    द्वादशांश से माता-पिता,
    षोडशांश से सवारी एवं सामान्य खुशियां,
    विंशांश से पूजा-उपासना और आशीर्वाद,
    चतुर्विंशांश से विद्या, शिक्षा, दीक्षा, ज्ञान आदि,
    सप्तविंशांश से बल एवं दुर्बलता,
    त्रिशांश से दुःख, तकलीफ, दुर्घटना, अनिष्ट;
    खवेदांश से शुभ या अशुभ फलों,
    अक्षवेदांश से जातक का चरित्र,
    षष्ट्यांश से जीवन के सामान्य शुभ-अशुभ फल आदि अनेक पहलुओं का सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है।
    षोडश वर्ग में सोलह वर्ग ही होते हैं, लेकिन इनके अतिरिक्त और चार वर्ग पंचमांश, षष्ट्यांश, अष्टमांश, और एकादशांश होते हैं।

    पंचमांश से जातक की आध्यात्मिक प्रवृत्ति, पूर्व जन्मों के पुण्य एवं संचित कर्मों की जानकारी प्राप्त होता है।
    षष्ट्यांश से जातक के स्वास्थ्य, रोग के प्रति अवरोधक शक्ति, ऋण, झगड़े आदि का विवेचन किया जाता है।
    एकादशांश जातक के बिना प्रयास के धन लाभ को दर्शाता है। यह वर्ग पैतृक सम्पत्ति, शेयर, सट्टे आदि के द्वारा स्थायी धन की प्राप्ति की जानकारी देता है।

    अष्टमांश से जातक की आयु एवं आयुर्दाय के विषय में जानकारी मिलती है।

    षोडश वर्ग में सभी वर्ग महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आज के युग में जातक धन, पराक्रम, भाई-बहनों से विवाद, रोग, संतान वैवाहिक जीवन, साझेदारी, व्यवसाय, माता-पिता और जीवन में आने वाले संकटों के बारे में अधिक प्रश्न करता है।
    इन प्रश्नों के विश्लेषण के लिए सात वर्ग
    होरा, द्रेष्काण, सप्तांश, नवांश, दशमांश, द्वादशांश और त्रिशांश ही पर्याप्त हैं।
    होरादि सात वर्गों का फलित में प्रयोग

    होरा: जन्म कुंडली की प्रत्येक राशि के दो समान भाग कर सिद्धांतानुसार जो वर्ग बनता है होरा कहलाता है। इससे जातक के धन से संबंधित पहलू का अध्ययन किया जाता है।

    होरा में दो ही लग्न होते हैं –
    सूर्य का अर्थात् सिंह और चंद्र का अर्थात् कर्क। ग्रह या तो चंद्र होरा में रहते हैं या सूर्य होरा में। बृहत पाराशर होराशास्त्र के अनुसार गुरु, सूर्य एवं मंगल सूर्य की होरा में और चंद्र, शुक्र एवं शनि चंद्र की होरा में अच्छा फल देते हैं। बुध दोनोें होराओं में फलदायक है। यदि सभी ग्रह अपनी शुभ होरा में हो तो जातक को धन संबंधी समस्याएं कभी नहीं आएंगी और वह धनी होगा। यदि कुछ ग्रह शुभ और कुछ अशुभ होरा में होंगे तो फल मध्यम और यदि ग्रह अशुभ होरा में होंगे तो जातक निर्धन होता है।

    द्रेष्काण: जन्म कुंडली की प्रत्येक राशि के तीन समान भाग कर सिद्धांतानुसार जो वर्ग बनता है वह दे्रष्काण कहलाता है। दूसरे शब्दों में यह कुण्डली का तीसरा भाग है। द्रेष्कोण जातक के भाई-बहन से सुख, परस्पर संबंध, पराक्रम के बारे में जानकारी के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त इससे जातक की मृत्यु का स्वरूप भी मालूम किया जाता है। द्रेष्काण से फलित करते समय लग्न कुंडली के तीसरे भाव के स्वामी, तीसरे भाव के कारक मंगल एवं मंगल से तीसरे स्थित बुध की स्थिति और इसके बल का ध्यान रखना चाहिए। यदि द्रेष्काण कुंडली में संबंधित ग्रह अपने शुभ स्थान पर स्थित है तो जातक को भाई-बहनों से विशेष लाभ होगा और उसके पराक्रम में भी वृद्धि होगी। इसके विपरीत यदि संबंधित ग्रह अपने अशुभ द्रेष्काण में हों तो जातक को अपने भाई-बहनों से किसी प्रकार का सहयोग प्राप्त नहीं होगा। यह भी संभव है कि जातक अपने मां-बाप की एक मात्र संतान हो।

    सप्तांश वर्ग: जन्मकुंडली का सातवां भाग सप्तांश कहलाता है। इससे जातक के संतान सुख की जानकारी मिलती है। जन्मकुंडली में पंचम भाव संतान का भाव माना जाता है। इसलिए पंचमेश पंचम भाव के कारक ग्रह गुरु, गुरु से पंचम स्थित ग्रह और उसके बल का ध्यान रखना चाहिए। सप्तांश वर्ग में संबंधित ग्रह अपने उच्च या शुभ स्थान पर हो तो शुभ फल प्राप्त होता है अर्थात् संतान का सुख प्राप्त होता है। इसके विपरीत अशुभ और नीचस्थ ग्रह जातक को संतानहीन बनाता है या संतान होने पर भी सुख प्राप्त नहीं होता। सप्तांश लग्न और जन्म लग्न दोनों के स्वामियों में परस्पर नैसर्गिक और तात्कालिक मित्रता आवश्यक है।

    नवांश वर्ग: जन्म कुंडली का नौवां भाग नवांश कहलाता है। यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण वर्ग है। इस वर्ग को जन्मकुंडली का पूरक भी समझा जाता है। आमतौर पर नवांश के बिना फलित नहीं किया जाता। यह ग्रहों के बलाबल और जीवन के उतार-चढ़ाव को दर्शाता है। मुख्य रूप से यह वर्ग विवाह और वैवाहिक जीवन में सुख-दुख को दर्शाता है। लग्नकुंडली में जो ग्रह अशुभ स्थिति में हो वह यदि नवांश में शुभ हो तो शुभ फलदायी माना जाता है। यदि ग्रह लग्न और नवांश दोनों में एक ही राशि में हो तो उसे वर्गोत्मता हासिल होती है जो शुभ सूचक है। लग्नेश और नवांशेश दोनों का आपसी संबंध लग्न और नवांश कुंडली में शुभ हो तो जातक का जीवन में विशेष खुशियों से भरा होता है। उसका वैवाहिक जीवन सुखमय होता है और वह हर प्रकार के सुखों को भोगता हुआ जीवन व्यतीत करता है। वर-वधू के कुंडली मिलान में भी नवांश महत्वपूर्ण है। यदि लग्न कुंडलियां आपस में न मिलें, लेकिन नवांश मिल जाएं तो भी विवाह उत्तम माना जाता है और गृहस्थ जीवन आनंदमय रहता है। सप्तमेश, सप्तम् के कारक शुक्र (कन्या की कुंडली में गुरु), शुक्र से सप्तम स्थित ग्रह और उनके बलाबल की नवांश कुंडली में शुभ स्थितियां शुभ फलदायी होती हैं। ऐसा देखा गया है कि लग्न कुंडली में जातक को राजयोग होते हुए भी राजयोग का फल प्राप्त नहीं होता यदि नवांश वर्ग में ग्रहों की स्थिति प्रतिकूल होती है। देखने में जातक संपन्न अवश्य नजर आएगा, लेकिन अंदर से खोखला होता है। वह स्त्री से पेरशान होता है और उसका जीवन संघर्षमय रहता है।

    दशमांश: दशमांश अर्थात् कुण्डली के दसवें भाग से जातक के व्यवसाय की जानकारी प्राप्त होती है। वैसे देखा जाए तो जन्मकुण्डली में दशम भाव जातक का कर्म क्षेत्र अर्थात् व्यवसाय का है। जातक के व्यवसाय में उतार चढ़ाव, स्थिरता आदि की जानकरी प्राप्त करने में दशमांश वर्ग सहायक होता है। यदि दशमेश, दशम भाव में स्थित ग्रह, दशम भाव का कारक बुध और बुध से दशम स्थित ग्रह दशमांशवर्ग में स्थिर राशि में स्थित हों और शुभ ग्रह से युत हों तो व्यवसाय में जातक को सफलता प्राप्त होती है। दशमांश लग्न का स्वामी और लग्नेश दोनों एक ही तत्व राशि के हों, आपस में नैसर्गिक और तात्कालिक मित्रता रखते हों तो व्यवसाय में स्थिरता देते हैं। इसके विपरीत यदि ग्रह दशमांश में चर राशि स्थित और अशुभ ग्रह से युत हो, लग्नेश और दशमांशेश में आपसी विरोध हो तो जातक का व्यवसाय अस्थिर होता है। दशमांश और लग्न कुंडली दोनों में यदि ग्रह शुभ और उच्च कोटि के हो तो जातक को व्यवसाय में उच्च कोटि की सफलता देते हैं।

    द्वादशांश: लग्न कुण्डली का बारहवां भाग द्वादशांश कहलाता है। द्वादशांश से जातक के माता-पिता के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है। लग्नेश और द्वादशांशेश इन दोनों में आपसी मित्रता इस बात का संकेत करती है कि जातक और उसके माता-पिता के आपसी संबंधी अच्छे रहेंगे। इसके विपरीत ग्रह स्थिति से आपसी संबंधों में वैमनस्य बनता है। इसके अतिरिक्त चतुर्थेश और दशमेश यदि द्वादशांश में शुभ स्थित हों तो भी जातक को माता-पिता का पूर्ण सुख प्राप्त होगा, यदि चतुर्थेश और दशमेश दोनों में से एक शुभ और एक अशुभ स्थिति में हो तो जातक के माता-पिता दोनों में से एक का सुख मिलेगा और दूसरे के सुख में अभाव बना रहेगा। इन्हीं भावों के और कारक ग्रहों से चतुर्थ और दशम स्थित ग्रहों और राशियों के स्वामियों की स्थिति भी द्वादशांश में शुभ होनी चाहिए। यदि सभी स्थितियां शुभ हों तो जातक को माता-पिता का पूर्ण सुख और सहयोग प्राप्त होगा अन्यथा नहीं।

    त्रिंशांश: लग्न कुंडली का तीसवां भाग त्रिंशांश कहलाता है। इससे जातक के जीवन में अनिष्टकारी घटनाओं की जानकारी प्राप्त होती है। दुःख, तकलीफ, दुर्घटना, बीमारी, आॅपरेशन आदि सभी का पता इस त्रिंशांश से किया जाता है। त्रिंशांशेश और लग्नेश की त्रिंशांश में शुभ स्थिति जातक को अनिष्ट से दूर रखती है। जातक की कुंडली में तृतीयेश, षष्ठेश, अष्टमेश और द्वादशेश इन सभी ग्रहों की त्रिंशांश में शुभ स्थिति शुभ जातक को स्वस्थ एवं निरोग रखती है और दुर्घटना से बचाती है। इसके विपरीत अशुभ स्थिति में जातक को जीवन भर किसी न किसी अनिष्टता से जूझना पड़ता है।

    इन सात वर्गों की तरह ही अन्य षोड्श वर्ग के वर्गों का विश्लेषण किया जाता है। इन वर्गों का सही विश्लेषण तभी हो सकता है यदि जातक का जन्म समय सही हो, अन्यथा वर्ग गलत होने से फलित भी गलत हो जाएगा। जैसे दो जुड़वां बच्चों के जन्म में तीन-चार मिनट के अंतर में ही जमीन आसमान का आ जाता है, इसी तरह जन्म समय सही न होने से जातक के किसी भी पहलू की सही जानकारी प्राप्त नहीं हो सकती। कई जातकों की कुंडलियां एक सी नजर आती हैं, लेकिन सभी में अंतर वर्गों का ही होता है। यदि वर्गों के विश्लेषण पर विशेष ध्यान दिया जाए तो जुड़वां बच्चों के जीवन के अंतर को समझा जा सकता है। यही कारण है कि हमारे विद्वान महर्षियों ने फलित ज्योतिष की सूक्ष्मता तक पहुंचने के लिए इन षोड्श वर्गों की खोज की और इसका ज्ञान हमें दिया।

  • ज्योतिषशास्त्र के अनुसार व्याधि (बीमारी) निवारण के लिए औषधि(दवाई) लेने का उचित मुहूर्त और रोगी की सेवा करनेवाले सेवक की कुंडली के योग

     Menu

    ज्योतिषशास्त्र के अनुसार व्याधि (बीमारी) निवारण के लिए औषधि(दवाई) लेने का उचित मुहूर्त और रोगी की सेवा करनेवाले सेवक की कुंडली के योग

    शीघ्र स्वास्थ्य लाभ हो; इसलिए ज्योतिषशास्त्रानुसार व्याधि से ग्रस्त व्यक्ति को धन्वंतरी देवता को प्रार्थना करके औषधि लेनी चाहिए । औषधि सेवन का आरंभ करते समय यथासंभव आवश्यक नक्षत्र, तिथि और वार का पालन करें । यदि ऐसा करना संभव न हो, तो धन्वंतरी देवता का प्रसाद समझकर औषधि ग्रहण करें । औषधि ग्रहण करते समय ईश्‍वर पर पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए । रोगी (बीमार व्यक्ति) जिसके माध्यम से उपचार करवाता है; उस व्यक्ति का, उदा. वैद्य, परिचारिका (नर्स), साथ में रहनेवाले व्यक्ति इत्यादि के ग्रह पूरक होने पर, रोगी शीघ्र ठीक हो सकता है । यदि रोगी की किसी डॉक्टर पर श्रद्धा होने पर भी अनेक बार उस व्यक्ति की बीमारी में विशेष अंतर नहीं पडता; क्योंकि उनके ग्रह आपस में मेल नहीं खाते हैं । इसके विपरीत अन्य रोगियों को तुरंत आराम मिलता है । इसलिए रोगी को औषधि का सेवन करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और रोगी की सेवा में लगे व्यक्ति के ग्रह कैसे होने चाहिए ? इस विषय में संक्षेप में जानकारी आगे दे रहे हैं ।

    १. औषधि सेवन करने का मुहूर्त

    १ अ. औषधि सेवन करने के आरंभ में कौन-से नक्षत्र होने चाहिए ?

    औषधि सेवन करते समय और श्री गुरु की सेवा करते समय आरंभ में अश्‍विनी, मृग, पुष्य, हस्त, चित्रा, अनुराधा और रेवती, ये नक्षत्र होने चाहिए । औषधि सेवन में जन्मनक्षत्र सर्वथा वर्जित करें ।

    १ आ. सेवा के आरंभ में कौन-सा वार होना चाहिए ?

    सेवा का आरंभ करते समय और औषधि देते समय रविवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार होना चाहिए । इनमें से रविवार बहुत ही शुभ माना जाता है, क्योंकि रवि ग्रह तेजतत्त्व का कारक है । किसी भी प्रकार की औषधि रविवार को लेना आरंभ करने पर रोग प्रतिकारक शक्ति बढती है ।

    १इ. औषधि लेना आरंभ करते समय कौन-सी तिथि होनी चाहिए ?

    औषधि लेते समय शुभ तिथि होनी चाहिए । क्षयतिथि, अमावस्या और पूर्णिमा, ये तिथियां नहीं होनी चाहिए ।

    २. रोगी और उसकी सेवा करनेवाले की कुंडली में क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए ?

    २ अ. सेवक की कुंडली में अशुभ ग्रह न हों !

    सेवक की कुंडली में रवि, चंद्र, बुध और गुरु, ये शुभ ग्रह होने चाहिए । सेवक की कुंडली में अशुभ ग्रह अथवा नीच राशि में होने से रोगी के कष्ट बढने की संभावना अधिक होती है अथवा रोगी को देर से आराम मिलता है; क्योंकि सेवक की कुंडली के ग्रह अशुभ होने से उसका रोगी पर विपरीत परिणाम होता पाया जाता है । (परात्पर गुरू डॉ. आठवले की सेवा में रहने वाले साधकों की कुंडलियां देखकर सेवा देने पर उनके उपचारों को अनुकूलता प्राप्त होगी ।)

    २ आ. ग्रह, ग्रहों की नीच राशि और राशि का अनुक्रमांक

    ग्रहग्रह की नीच राशिराशि का अनुक्रमांक१ . रवितुला७२. चंद्रवृश्‍चिक८३. मंगलकर्क४४. बुधमीन१२५. गुरूमकर१०६. शुक्रकन्या६७. शनिमेष१८. राहुधनु९९. केतुमिथुन३

    २ इ. रोगी और सेवक में ग्रहमित्रता होनी चाहिए !

    ग्रहमित्रता अर्थात दो व्यक्तियों की राशि के स्वामी, मित्र ग्रह होने चाहिए । उदा. रोगी की राशि मकर होने पर उसका राशि स्वामी शनि ग्रह है । शनि ग्रह के मित्र ग्रह, बुध और शुक्र हैं । इसका अर्थ मकर राशि के व्यक्ति की बुध ग्रह से संबंधित (मिथुन और कन्या) राशि और शुक्र ग्रह से संबंधित (वृषभ और तुला) राशियों के व्यक्तियों से ग्रह मित्रता है, इसलिए इस राशि के व्यक्तियों की सेवा अधिक फलदायी होती है, ऐसा अनुभव है । आगे की सारणी में ग्रह, ग्रहानुसार उनकी राशि और ग्रहानुसार ग्रह मित्र दिए हैं ।ग्रहग्रहों की स्वामी राशिमित्र ग्रहरविसिंहचंद्र, मंगल, गुरूचंद्रकर्करवि, बुधमंगलमेष और वृश्‍चिकरवि, गुरू, चंद्रबुधमिथुन और कन्यारवि, शुक्रगुरूधनु और मीनरवि, चंद्र, मंगलशुक्रवृषभ और तुलाबुध, शनीशनिमकर और कुम्भबुध, शुक्र

    २ ई. रोगी के नक्षत्र से सेवक के नक्षत्र दोयम (दूसरी श्रेणी का) नहीं होने चाहिए !

    जिसकी सेवा करनी है उसके नक्षत्र से, सेवा करनेवाले के नक्षत्र दोयम होने पर सेवा व्यर्थ जाती है । (परात्पर गुरू डॉक्टरजी के नक्षत्र उत्तराषाढा’ होने से उनके नक्षत्र से दूसरी श्रेणी का नक्षत्र अर्थात ‘श्रवण’ नक्षत्र होने वाले साधकों को उनकी सेवा नहीं करनी चाहिए ।

  • जया एकादशी व्रत

    जया एकादशी व्रत आज


    धार्मिक मान्यता के अनुसार, जया एकदाशी के दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की साधना करने से साधक के जीवन में आ रहे सभी दुख दूर होते हैं। यह व्रत मानसिक और शारीरिक पवित्रता प्रदान करता है। ऐसा माना जाता है कि व्रत का पारण न करने से शुभ फल प्राप्त नहीं होता है।
    इसलिए द्वादशी तिथि पर व्रत का पारण जरूर करना चाहिए। इससे साधक को व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

    जया एकादशी 2026 डेट और शुभ मुहूर्त

    वैदिक पंचांग के अनुसार, माघ माह में जया एकादशी व्रत किया जाएगा 29 जनवरी को किया जाएगा और व्रत का पारण 30 जनवरी को किया जाएगा।
    माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत- 28 जनवरी को दोपहर 04 बजकर 35 मिनट पर
    माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का समापन- 29 जनवरी को 01 दोपहर 55 मिनट पर

    जया एकादशी 2026 व्रत पारण का टाइम

    द्वादशी तिथि पर ही एकदाशी व्रत का पारण करना चाहिए। 30 जनवरी को व्रत का पारण करने का शुभ मुहूर्त सुबह 07 बजकर 10 मिनट से लेकर सुबह 09 बजकर 20 मिनट तक है। इस दौरान किसी भी समय व्रत का पारण कर सकते हैं।

    जया एकादशी व्रत की विधि

    जया एकदशी व्रत वाले दिन प्रात:काल सूर्योदय से पहले उठ जाएं। इसके बाद तन-मन से पवित्र होने के बाद श्री हरि का ध्यान करते हुए व्रत को विधि-विधान से करने का संकल्प लें। इसके बाद घर के पूजा घर या फिर ईशान कोण में भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करें। एकादशी व्रत की पूजा में श्री हरि को सबसे पहले शुद्ध जल अर्पित करें। इसके बाद उन्हें चंदन, रोली, धूप-दीप, फल-फूल, तुलसी दल, पंचामृत आदि अर्पित करें। इसके बाद जया एकादशी व्रत की कथा कहें या सुने। कथा सुनने के बाद भगवान श्री विष्णु और एकादशी माता की आरती अवश्य करें। पूरे दिन व्रत करने के बाद अगले दिन शुभ मुहूर्त में इसका पारण करें। और भगवान विष्णु से स्वयं तथा अपने परिवार के लिए मंगलकामना करें। 

    जया एकादशी का धार्मिक महत्व

    जया एकादशी का व्रत सभी प्रकार की बाधाओं को दूर करके शत्रुओं पर विजय दिलाता है।
    जया एकादशी व्रत के पुण्य प्रभाव से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है।
    जया एकादशी व्रत को विधि-विधान से करने पर साधक को सुख-सौभाग्य और मोक्ष प्राप्त होता है।
    माघ मास में पड़ने वाली जया एकादशी पर दान करने पर साधक को तीन गुना ज्यादा फल मिलता है।

  • महानंदा नवमी आज

    महानंदा नवमी आज


    महानंद नवमी एक शुभ हिंदू त्योहार है जो हिंदू पंचांग के माघ, भाद्रपद और मार्गशीर्ष महीनों में शुक्ल पक्ष (चंद्रमा के शुक्ल पक्ष की अवधि) की नवमी (नौवें दिन) को मनाया जाता है। ग्रेगोरियन पंचांग के अनुसार यह तिथि क्रमशः जनवरी-फरवरी, अगस्त-सितंबर और दिसंबर महीनों में पड़ती है। इसके अलावा, महानंद नवमी कुछ अन्य हिंदू चंद्र महीनों में भी मनाई जाती है। इस दिन का मुख्य अनुष्ठान गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों में स्नान करके शुद्धि करना है। हिंदू भक्त शुक्ल पक्ष की नवमी पर देवी दुर्गा की पूजा करते हैं। महानंद नवमी, जिसे ‘ताल नवमी’ भी कहा जाता है, भारत के उत्तरी और पूर्वी राज्यों, विशेष रूप से ओडिशा और पश्चिम बंगाल में अत्यंत उत्साह और उमंग के साथ मनाई जाती है।

    तिथि

    महानंदा नवमी 27 जनवरी मंगलवार को मनाई जायेगी।

    महानंदा नवमी का महत्व:

    महानंद नवमी का त्योहार हिंदू भक्तों के लिए बहुत धार्मिक महत्व रखता है। इस दिन पूजी जाने वाली मुख्य देवी दुर्गा हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी दुर्गा शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक हैं। हिंदू भक्त, विशेषकर महिलाएं, सभी बुराइयों से लड़ने की शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए उनकी पूजा करती हैं। ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा की पूजा करने से सभी बुरी आत्माओं पर विजय प्राप्त होती है। उन्हें ‘दुर्गातिनाशिनी’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है सभी दुखों को दूर करने वाली। इसलिए, जो लोग श्रद्धापूर्वक देवी दुर्गा की पूजा करते हैं, उन्हें सभी दुखों और कष्टों से मुक्ति मिलती है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी दुर्गा के नौ अवतार हैं, जिनके नाम हैं: चंद्रघंटा, शैलपुत्री, कालरात्रि, स्कंद माता, ब्रह्मचारिणी, सिद्धिदायनी, कुष्मांडा, कात्यायनी और महागौरी। महानंद नवमी का आध्यात्मिक महत्व इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि इस दिन देवी दुर्गा के इन सभी रूपों की सामूहिक रूप से पूजा की जाती है।

    महानंदा नवमी के दौरान अनुष्ठान:

    • महानंद नवमी के दिन, भक्त सुबह जल्दी उठकर सूर्योदय के समय स्नान करने की तैयारी करते हैं। हजारों भक्त गंगा, सरस्वती, कावेरी, तुंगभद्रा और गोदावरी जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने के लिए एकत्रित होते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस पुण्य स्नान से व्यक्ति अपने वर्तमान और पिछले जन्मों के सभी पापों और कुकर्मों से मुक्त हो जाता है।
    • हिंदू श्रद्धालु, विशेषकर विवाहित महिलाएं, इस दिन कठोर उपवास रखती हैं। वे दिन भर कुछ नहीं खातीं और रात में चंद्र देव के दर्शन के बाद अपना उपवास तोड़ती हैं।
    • महानंद नवमी के अवसर पर देवी दुर्गा की पूर्ण श्रद्धा से पूजा की जाती है। देवी को भोग लगाने के लिए स्वादिष्ट भोज तैयार किया जाता है, जिसमें राजभोग, कलाकंद, मुरमुरा लड्डू, सुनहरी रस मलाई, भापा आलू, लूची आदि शामिल होते हैं। महानंद नवमी के अवसर पर ताड़ के पके फल, कसा हुआ नारियल, मैदा और चीनी से बना विशेष व्यंजन ‘ताल’एर बारा’ भी तैयार किया जाता है। देवी दुर्गा को भोग भोग चढ़ाने के बाद इसे मित्रों और परिवार के सदस्यों में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। महानंद नवमी के अवसर पर लोग पारंपरिक वस्त्र पहनते हैं, पुरुष सफेद धोती और महिलाएं लाल और सफेद साड़ी पहनती हैं।
    • इस दिन श्रद्धालु देवी दुर्गा के मंदिरों में दर्शन के लिए जाते हैं। महानंद नवमी पर विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठान किए जाते हैं। श्रद्धालु देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए धार्मिक भजन गाते हैं। पश्चिम बंगाल का कनक मंदिर और ओडिशा का बिजारा मंदिर महानंद नवमी समारोहों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

  • वरद – कुंद चौथ व्रत आज

    वरद – कुंद चौथ व्रत आज


    धर्म ग्रंथों के अनुसार, माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि बहुत खास होती है। इसे तिलकुंद और वरद चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान श्रीगणेश के साथ-साथ चंद्रमा की पूजा का भी विधान है। इस व्रत को करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और हर तरह से संकटों से छुटकारा मिलता है, ऐसा पुराणों में लिखा है।

    वरद-तिल-कुंड चतुर्थी 2026 शुभ मुहूर्त

    पंचांग के अनुसार, माघ शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ 22 जनवरी 2026 को 02:47am पर होगा। चतुर्थी तिथि का समापन 23 जनवरी को 02:298 am पर होगा। चतुर्थी मध्याह्न मुहूर्त सुबह 11 बजकर 43 मिनट से दोपहर 1 बजकर 57 मिनट तक रहेगा। इस दिन मध्याह्न काल में भगवान गणेश का पूजन करना अत्यन्त शुभ माना जाता है। वहीं वर्जित चंद्रोदय का समय शाम 5 बजकर 26 मिनट से रात 8 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। 

    वरद-तिल-कुंड चतुर्थी का महत्व

    वरद-तिल-कुंड चतुर्थी को तिलकूट चतुर्थी को व्रत किया जाता है और इस दिन भगवान श्री गणेश जी का पूजा पूरी श्रद्धा के साथ की जाती है। हिंदु पुराणों में इस चतुर्थी को बहुत ही विशेष महत्व बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि यह व्रत महिलाओं के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होता है

    क्यो करें वरद-तिल-कुड चतुर्थी 

    भगवान गणेश जी की पूजा पूरी विधि से करने से भक्त को मानसिक सुख व शान्ति मिलती है। इसके साथ ही यह व्रत करने वाले भक्तों के जीवन सभी प्रकार के सुख और समृद्धि वास होता है। महिलाओं के द्वार इस प्रकार से व्रत करने से उनके परिवार के अन्य सभी लोगों की व्यवसाय में भरपूर तरक्की होती है। भक्त के दाम्पत्य जीवन में और अधिक सुख बढ़ता है और उन्हें अखंड सौभाग्य मिलता है।

    वरद-तिल-कुंड चतुर्थी पूजन विधि

    • वरद-तिल-कुंड चतुर्थी  के दिन सुबह जल्दी उठकर साफ-स्वच्छ वस्त्र पहनें।
    • श्रीगणेश की पूजा करते समय भक्त को अपना मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखना चाहिये क्योंकि यहा शुभ माना जाता है।
    • इसके बाद साफ व शांत चित्त के साथ आसन पर बैठकर भगवान श्रीगणेश का पूजन करें।
    • धूप-दीप जलाने के बाद भगवान गणेश को फल, फूल, चावल, रौली, मौली चढ़ाएं, पंचामृत से स्नान कराने के बाद तिल अथवा तिल-गुड़ का भोग लगायें।
    • पूजा के बाद भक्त को ‘ॐ श्रीगणेशाय नम:’ का जाप 108 जरुर करना चाहिये।
    • इसके बाद शाम के समय कथा सुनने के बाद भगवान गणेशजी की आरती करनी चाहिये।
    • भक्त इस शुभ दिन पर अपनी योग्यता के अनुसार गर्म कपड़े, कंबल, कपड़े व तिल आदि का दान कर सकते है।
    • पूजा के बाद गणेश मंदिर के पुजारी को भोजन भी कराना चाहिए।

  • Direction-wise Aroma Vastu Chart

    Direction-wise Aroma Vastu Chart

    1️⃣ East (Air Element – Sun / Indra)

    Best Aromas: Sandalwood, Rose, Jasmine

    Benefits: Fame, new opportunities, health

    Use: Diffusers/incense in living room or pooja room (East)

    2️⃣ West (Water Element – Varun Dev)

    Best Aromas: Lavender, Lotus, Frankincense

    Benefits: Creativity, relationships, peace

    Use: Aroma candles or flowers in bedroom/study (West)

    3️⃣ North (Wealth – Kuber)

    Best Aromas: Mint, Tulsi, Lemon, Camphor

    Benefits: Wealth, clears blockages, growth

    Use: Camphor or lemon oil diffuser in North zone

    4️⃣ South (Fire Element – Yama / Agni)

    Best Aromas: Cinnamon, Clove, Mogra

    Benefits: Strength, confidence, success

    Use: Spicy aroma diffuser in South zone

    5️⃣ Northeast (Ishaan – Divine Energy)

    Best Aromas: Sandalwood, Camphor, Lotus, Jasmine

    Benefits: Spiritual upliftment, clarity, blessings

    Use: Light camphor/sandalwood incense daily

    6️⃣ Northwest (Air – Vayu Dev)

    Best Aromas: Rose, Lavender, Champa

    Benefits: Strengthens relationships, support

    Use: Mild floral fragrance in bedrooms/meetings

    7️⃣ Southeast (Agni – Fire / Shakti)

    Best Aromas: Cinnamon, Orange, Lemongrass

    Benefits: Financial growth, motivation

    Use: Essential oil diffuser in kitchen/dining

    8️⃣ Southwest (Stability – Pitru/Ancestors)

    Best Aromas: Musk, Jasmine, Sandalwood

    Benefits: Stability, protection, bonding

    Use: Incense sticks/perfume in master bedroom

  • गौरी तृतीया व्रत आज

    गौरी तृतीया व्रत आज


    माघ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का समय गौरी तृतीया के नाम से पूजा जाता है। सुखी वैवाहिक जीवन के साथ पूर्ण होता है मनोकूल जीवन साथी का आशीर्वाद। गौरी तृतीया का व्रत बहुत ही शुभ एवं पवित्र उत्सव है जो सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए एक विशेष समय है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन देवी गौरी को भगवान शिव का साथ प्राप्त हुआ था और जो भी कुंवारी कन्याएं या विवाहित स्त्रियां इस व्रत को करती हैं उनका जीवन सुख एवं सौभाग्य से भर जाता है। 

    गौरी तृतीया व्रत पूजा 2026

    इस साल माघ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन गौरी तृतीया का व्रत रखा जाता है इस दिन को गौंतरी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इस साल गौरी तृतीया का व्रत 21 जनवरी 2026 को रखा जाएगा। माघ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का आरंभ 20 जनवरी 2026 को मध्य रात्रि 01:43 से होगा और माघ शुक्ल तृतीया तिथि का समापन अगले दिन 21 जनवरी 2026 को रात्रि 01:48 पर होगा। उदया तिथि के अनुसार 21 जनवरी को बुधवार के दिन इस व्रत को रखा जाएगा।

    इस साल गौरी तृतीया व्रत पर कई विशेष योग भी बन रहे होंगे। रवि योग की शुभता का प्रभाव मिलेगा इसके अलावा इस दिन पंचक का प्रभाव भी बना रहने वाला है। कुछ अन्य मुहूर्त इस प्रकार रहेंगे।

    ब्रह्म मुहूर्त का समय: 05:27 से 06:20 तक

    विजय मुहूर्त दोपहर 02:19 से 03:01 तक

    गोधूलि मुहूर्त का समय संध्या 05:49 से 06:15 तक

    रवि योग का समय दोपहर 01:58 से अगले दिन सुबह 07:14 तक

    गौरी तृतीया पूजा विधि

    सौभाग्य का प्रतीक गौरी तृतीया का व्रत स्त्रियों के मध्य बहुत ही लोकप्रिय रहा है। प्राचीन काल से ही इस व्रत को किया जा रहा है। माघ माह का समय अत्यंत ही शुभ एवं पुत्र समय माना गया है और इस माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि बहुत ही खास माना गया है। इस दिन देवी गौरी के साथ भगवान शिव का पूजन किया जाता है जिसके प्रभाव से भक्तों को विशेष सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। गौरी तृतीया की पूजा का आरंभ प्रात:काल से होता है। स्नान इत्यादि कार्यों से निवृत्त होकर पूजा स्थल पर देवी गोरी एवं भगवान शिव की प्रतिमाओं को स्थापित किया जाता है। पुष्प, धूप, दीप, अक्षत एवं अन्य पूजा सामग्री को भगवान को अर्पित करते हुए पूजा आरंभ की जाती है। देवी को श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करते हैं एवं विभिन्न प्रकार के मिष्ठान एवं भोग पदार्थों को अर्पित किया जाता है। इस दिन गौरी तृतीया व्रत की कथा को करते हैं एवं भगवान शिव एवं देवी पार्वती का एक साथ पूजन एवं आरती करते हुए पूजा संपन्न की जाती है।

    गौरी तृतीया पूजा पौराणिक महत्व

    गोरी तृतीया की पूजा को सौभाग्यवती स्त्रियां अपने सुहाग की लंबी उम्र की कामना हेतु करती हैं। अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद पाने की कामना से हर महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं और भक्ति भाव के साथ इस दिन को मनाती हैं। कुछ स्थानों पर इस दिन को निर्जला व्रत के रूप में भी रखा जाता है। कुंवारी कन्याएं भी अपने जीवन में सुख दांपत्य जीवन की कामना के लिए इस व्रत को करती हैं। मान्यताओं के अनुसार इस दिन को प्रेम जीवन की शुभता के लिए बहुत ही खास समय भी माना गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी और भगवान ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी जीवनसंगिनी होने का आशीर्वाद प्रदान किया था अत: देवी को जिस प्रकार अपने प्रेम का सुख प्राप्त हुआ उसी प्रकार हर भक्त को अपने जीवन का सुख प्राप्त होता है। सच्चे मन एवं भक्ति भाव से रखा गया गौरी तृतीया आ व्रत कभी निष्फल नहीं जाता है।

    गौरी तृतीया पूजा का ज्योतिष अनुसार प्रभाव

    • गोरी तृतीया का व्रत सुख समृद्धि को देने वाला एवं मनोकामनाओं को पूर्ण करने का वाला होता है। धार्मिक कथाओं एवं ज्योतिष शास्त्र में भी इस व्रत की महिमा बहुत ही उल्लेखनीय मानी गई है। इस व्रत के प्रभाव से विवाह विलंब के योग समाप्त हो जाते हैं। वैवाहिक जीवन में चल रही उथल – पुथल भी दूर होती है। किसी भी तरह का अलगाव यदि जीवन साथी से बन गया है तो वह भी इस दिन किए जाने वाले व्रत एवं पूजन के प्रभाव से शांत हो जाता है।
    • ज्योतिष शास्त्र में विवाह भाव की पीड़ा की शांति के लिए गौरी तृतीया का पूजन बहुत शुभ माना जाता है। जन्म कुंडली में बनने वाला मांगलिक दोष या मंगल के दुष्प्रभाव की शांति भी गौरी तृतीया पूजन से संभव हो पाती है। विवाह में आ रही किसी भी तरह की बाधा दूर होती है।
    • गौरी तृतीया व्रत का पूजन सुख दांपत्य जीवन को देने के साथ साथ व्यक्ति को संतान सुख एवं वंश वृद्धि का सुख भी प्रदान करता हे। जीवन में आनंद एवं भौतिक सुखों की कोई कमी नहीं रहती है। भक्तों को यह व्रत अनेकों तरह के शुभ फल देने में अत्यंत ही फलदायी माना गया है।

  • पंचांग के २७ योग

    ✨पंचांग के २७ योग✨

    पंचांग में ‘योग’ मुख्य रूप से व्यक्ति के चरित्र, व्यवहार और सामाजिक संबंधों को प्रभावित करता है। यहाँ २७ योगों की सूची और उनके मूल स्वभाव का संक्षिप्त विवरण दिया गया है:

    २७ योग और उनके सामान्य गुणधर्म
    १. विष्कुम्भ (Vishkumbha): प्रभावशाली व्यक्तित्व, लेकिन शत्रुओं से घिरे रहने वाले। (अशुभ माना जाता है)
    २. प्रीति (Preeti): प्रेमपूर्ण स्वभाव, मिलनसार और सुखद जीवन जीने वाले।
    ३. आयुष्मान (Ayushman): दीर्घायु, स्वस्थ और जीवन में सभी सुख प्राप्त करने वाले।
    ४. सौभाग्य (Saubhagya): भाग्यशाली, परोपकारी और सुखी वैवाहिक जीवन वाले।
    ५. शोभन (Shobhana): सुंदर, गुणी और कलाप्रेमी व्यक्तित्व।
    ६. अतिगण्ड (Atiganda): जीवन में संघर्ष और अचानक आने वाली बाधाएं। (अशुभ माना जाता है)
    ७. सुकर्मा (Sukarma): सत्कर्म करने वाले, कार्यकुशल और समाज में सम्मानित।
    ८. धृति (Dhriti): धैर्यवान, स्थिर बुद्धि और विद्वान।
    ९. शूल (Shoola): क्रोधी स्वभाव, साहसी लेकिन कभी-कभी कलह करने वाले। (अशुभ माना जाता है)
    १०. गण्ड (Ganda): स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं और अस्थिरता। (अशुभ माना जाता है)
    ११. वृद्धि (Vriddhi): निरंतर प्रगति करने वाले और व्यापार में सफल।
    १२. ध्रुव (Dhruva): एकाग्र, स्थिर और अपनी बात के पक्के।
    १३. व्याघात (Vyaghata): कार्य में चतुर लेकिन कभी-कभी हिंसक विचार वाले। (अशुभ माना जाता है)
    १४. हर्षण (Harshana): हमेशा प्रसन्न रहने वाले और उत्सव प्रेमी।
    १५. वज्र (Vajra): शारीरिक रूप से शक्तिशाली और शत्रुओं पर विजय पाने वाले। (अशुभ माना जाता है)
    १६. सिद्धि (Siddhi): हर कार्य में निपुण और सफलता प्राप्त करने वाले।
    १७. व्यतिपात (Vyatipata): जीवन में अस्थिरता और अप्रत्याशित घटनाएं। (अत्यंत अशुभ माना जाता है)
    १८. वरीयान (Variyana): श्रेष्ठ, धनवान और विलासी जीवन।
    १९. परिघ (Parigha): बाधाओं को पार करने वाले, लेकिन स्वभाव से जिद्दी। (अशुभ माना जाता है)
    २०. शिव (Shiva): शांत, धार्मिक और मंत्र-शास्त्र के ज्ञाता।
    २१. सिद्ध (Siddha): धार्मिक कार्यों में रुचि और शुद्ध आचरण।
    २२. साध्य (Sadhya): लक्ष्य के प्रति समर्पित और कार्य साधने में निपुण।
    २३. शुभ (Shubha): सत्य बोलने वाले, गुणी और मृदुभाषी।
    २४. शुक्ल (Shukla): शुद्ध अंतःकरण, तेजस्वी और ज्ञानवान।
    २५. ब्रह्म (Brahma): अत्यंत विद्वान, गोपनीय बातों के ज्ञाता और ईमानदार।
    २६. ऐन्द्र (Indra): नेतृत्व क्षमता, धनवान और राजसी ठाठ।
    २७. वैधृति (Vaidhriti): चतुर और साहसी, लेकिन जीवन में उतार-चढ़ाव। (अशुभ माना जाता है।

  • गुप्त नवरात्र

    गुप्त नवरात्र में प्रतिदिन नीचे दिए गए मंत्रो का ज्यादा से ज्यादा जाप करें ।

    1 . “सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते “।।

    2 . “ऊँ जयन्ती मङ्गलाकाली भद्रकाली कपालिनी ।दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते” ।।

    नवरात्र में प्रात: श्रीरामरक्षा स्तोत्र का पाठ करने से हर कार्य सफल होते है,कार्यों के मार्ग में आने वाली समस्त विघ्न बाधाएं शांत होती हैं।
    https://youtu.be/2m5-ESAr9Mk

    www.facebook.com/astroshaliini
    गुप्त नवरात्रि में दिल खोलकर आप अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान पुण्य करें …इन दिनों आपके द्वारा दान पुण्य करने से उसका अक्षय फल प्राप्त होता है । आप प्रतिदिन छोटी कन्याओं को कोई न कोई उपहार अवश्य जी दें । अपने माता पिता, बहन-भाई और पत्नी को भी कोई न कोई उपहार देकर चकित जरुर करते रहें, गरीब और असहाए की मदद करने का मौका तो बिलकुल भी न गवाएं। यकीन मानिये उन सभी के मुख से आपके लिए शुभ वचन निकलते ही रहेंगे ।
    astroshaliini.blogspot.com

  • गुप्तनवरात्र १९ से २७ जनवरी २०२६

    (गुप्तनवरात्र १९ से २७ जनवरी २०२६) हम धीरे धीरे दसमहाविद्याओं को भूल रहे हैं?

    आज की स्थिति को अगर गहराई से देखें तो कारण स्पष्ट दिखते हैं:

    1. बाहरी चमत्कार, भीतरी साधना का अभाव
      दस महाविद्याएँ तत्काल वरदान देने वाली देवियाँ नहीं, बल्कि
      अहंकार, भय, मोह, वासना, अज्ञान को काटने वाली शक्तियाँ हैं।
      आज का मन शॉर्टकट चाहता है —
      रील, वायरल बाबा, त्वरित उपाय —
      जबकि महाविद्याएँ तप, संयम और आत्मचिंतन मांगती हैं।
    2. भय के कारण दूरी
      काली, भैरवी, धूमावती, छिन्नमस्ता —
      इनके रूप सत्य के तीखे रूप हैं।
      आज का समाज सौम्य दिखावा चाहता है,सत्य का प्रचंड दर्शन नहीं।इसलिए लोग इन शक्तियों से डरकर दूर हो गए।
    3. आधुनिक जीवन और मानसिक रोग दस महाविद्याएँ सीधे-सीधे जुड़ी हैं—
      मां काली — मृत्यु का भय हरने वाली
      मां तारा — मानसिक शांति और वाणी की अधिष्ठात्री
      मां भैरवी — रोग, पीड़ा और तप की शक्ति
      मां छिन्नमस्ता — अहंकार का बलिदान
      मां धूमावती — अकेलेपन और अवसाद का सत्य
      मां बगलामुखी — नकारात्मक शक्तियों का स्तंभन
      मां मातंगी — चेतना और वाणी की शुद्धि
      मां कमला — धन और धर्म का संतुलन
      मां षोडशी — प्रेम, आकर्षण और जीवन ऊर्जा
      मां भुवनेश्वरी — प्रकृति और

    पंचतत्त्व की रक्षक
    आज जब हृदय रोग, कैंसर, डिप्रेशन, एंग्ज़ायटी बढ़ रहे हैं —
    क्योंकि हमने प्रकृति, चेतना और साधना तीनों से दूरी बना ली।

    1. सोशल मीडिया के नए “भगवान”
      आज “जो ट्रेंड करे वही सत्य” बन गया है।
      ज्ञान की जगह व्यूज़,
      साधना की जगह सेल्फी,
      और मंत्र की जगह म्यूज़िक।
      दस महाविद्याएँ शोर नहीं करतीं —
      वे अंदर परिवर्तन करती हैं.
    2. जब प्रलय आती है, तब महाविद्या स्मरण होती हैं
      इतिहास गवाह है —
      जब समाज टूटता है, महामारी आती है, युद्ध, रोग, पर्यावरण असंतुलन बढ़ता है —
      तब काली, तारा, भैरवी का स्मरण होता है।
      आज संकेत वही हैं…
      पर हम अब भी भूल में हैं।
      दस महाविद्याएँ आज भी जाग्रत हैं…

    🔱
    🙏जय माता दी🚩