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  • शुक्र प्रदोष व्रत

    शुक्र प्रदोष व्रत आज


    हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे शुभ दिन माना जाता है। माघ महीने के कृष्ण पक्ष का पहला प्रदोष व्रत विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह नए साल की शुरुआत और मकर संक्रांति के ठीक बाद आता है। 

    प्रदोष व्रत तिथि और समय

    वैदिक पंचांग के अनुसार, माघ महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 15 जनवरी को रात 8 बजकर 16 मिनट पर शुरू होगी। इस तिथि का समापन 16 जनवरी को रात 10 बजकर 21 मिनट पर होगा। ऐसे में पंचांग को देखते हुए माघ महीने का पहला प्रदोष व्रत दिन शुक्रवार 16 जनवरी को रखा जाएगा।

    प्रदोष व्रत की पूजा विधि

    • सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
    • दिन भर सात्विक रहें और शिव मंत्रों का मन ही मन जाप करें।
    • शाम को सूर्यास्त से करीब 45 मिनट पहले दोबारा स्नान करें।
    • इसके बाद भगवान शिव का गंगाजल, दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक करें।
    • उन्हें बिल्व पत्र, धतूरा, आक के फूल और भस्म अर्पित करें।
    • प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें और अंत में आरती करें।
    • पूजा में हुई सभी गलती के लिए माफी मांगे।

    धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व

    भगवान शिव की विशेष कृपा

    प्रदोष काल में शिव की आराधना करने से विशेष फल प्राप्त होता है। शास्त्रो में जिक्र है कि प्रदोष काल में भगवान शिव भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

    पापों का नाश और पुण्य की प्राप्ति

    प्रदोष व्रत करने से जाने-अनजाने किए गए पापों का नाश होता है। जीवन में पुण्य और शांति की प्राप्ति होती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रदोष व्रत पूजा नियमानुसार करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    प्रदोष व्रत को कष्टों से मुक्ति दिलाने वाला भी माना जाता है

    पुराणों के अनुसार, समुद्र मंथन के समय भगवान शिव ने विष का पान किया था। माना जाता है कि उन्होंने प्रदोष काल में ही विषपान किया था, इसीलिए इस समय शिव पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन व्रत करने से मनुष्य के जीवन से रोग, शोक तथा भय का सर्वनाश होता है। इस व्रत को आर्थिक संकट और परिवारिक कलह से मुक्ति दिलाने वाला भी माना गया है।

    प्रदोष व्रत पूजा से धन, स्वास्थ्य और सफलता से जुड़ी इच्छाएं पूरी होती हैं

    इस व्रत को मनोकामना पूर्ति का व्रत भी कहा जाता है। श्रद्धा और नियमपूर्वक प्रदोष व्रत करने से विवाह और संतान से जुड़ी परेशानियां दूर होती है। प्रदोष व्रत पूजा से धन, स्वास्थ्य और सफलता से जुड़ी इच्छाएं पूरी होती हैं।

    शिव–पार्वती की साथ में आराधना करना अधिक फलदायी होती है

    धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत में भगवान शिव के साथ माता पार्वती की पूजा करने का भी विधान है। जिससे दांपत्य जीवन में जीवनसाथी के साथ रिश्तों में गहराई आती है। परिवार में सुख, शांति और सौहार्द बना रहता है।

    शुक्र प्रदोष व्रत का उपाय

    • शिवलिंग पर जलाभिषेक करें।
    • शिवलिंग पर 108 अक्षत अर्पित करें।
    • शिव-शक्ति पर इत्र अर्पित करें और सफेद मिठाई का भोग लगाएं।
    • प्रदोष काल में एक मुखी घी का दीपक जलाकर शिव स्तोत्र’ का पाठ करें।
    • शाम को किसी जरूरतमंद को चावल, दूध या दही का दान करना अत्यंत शुभ होता है।
    • शिवजी को चंदन, भस्म, बेलपत्र, धतूरा और मदार के फूल अर्पित करें।
    • शिवलिंग पर गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अभिषेक करें।
    • “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें।

  • तिल द्वादशी

    तिल द्वादशी आज


    माघ मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को तिल द्वादशी कहा जाता है। इसे कूर्म द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और तिल के दान का विशेष महत्व है। वर्ष 2026 में यह व्रत मकर संक्रांति के अगले दिन मनाया जाएगा। तिल द्वादशी न केवल आध्यात्मिक शुद्धि का मार्ग है, बल्कि यह दरिद्रता दूर करने और जीवन में सुख-समृद्धि लाने वाला एक अमोघ अवसर भी है।

    तिल द्वादशी 2026: तिथि और मुहूर्त

    वर्ष 2026 में तिल या कूर्म द्वादशी 15 जनवरी, गुरुवार को मनाई जाएगी।
    माघ कृष्ण द्वादशी तिथि आरंभ: 14 जनवरी 2026 को शाम 05:52 बजे से।
    द्वादशी तिथि समाप्त: 15 जनवरी 2026 को रात 08:16 बजे तक।
    उदयातिथि के अनुसार तिल द्वादशी और कूर्म द्वादशी व्रत 15 जनवरी को रखा जाएगा।

    क्यों किया जाता है यह व्रत? जानें महत्व

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के पसीने से हुई है, इसलिए यह उन्हें अत्यंत प्रिय है। महाभारत में उल्लेख है कि इस दिन तिल दान करने वाला व्यक्ति कभी नरक के दर्शन नहीं करता। पद्म पुराण के अनुसार, इस दिन तिल के प्रयोग और दान से जाने-अनजाने में हुए सभी पापों का नाश होता है। तिल द्वादशी पर तिल दान करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को करता है, वह जन्म-जन्मांतर तक रोगों, जैसे कुष्ठ, अंधापन आदि से मुक्त रहता है। 

    रोग और कष्टों से मिलती है मुक्ति

    धर्म शास्त्रों में उल्लेखित है कि तिल द्वादशी का व्रत करने से व्यक्ति को कई जन्मों तक भयानक रोगों जैसे अंधापन, बहरापन, कोढ़ आदि से मुक्ति मिलती है। यह व्रत स्वास्थ्य, लंबी आयु और सदा निरोगी रहने का वरदान देता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। व्रत रखने वाले लोग तिल से बने व्यंजन जैसे तिल के लड्डू, तिल की चिक्की आदि बनाते और दान करते हैं। तिल दान करने से अश्वमेध यज्ञ के बराबर का फल मिलता है।

    पूजा विधि

    इस दिन तिल का छह तरीकों यानी षटतिला से उपयोग करना श्रेष्ठ माना जाता है: स्नान, उबटन, तर्पण, आहुति/हवन, भोजन और दान।

    स्नान: सुबह जल्दी उठकर पानी में गंगाजल और तिल मिलाकर स्नान करें।

    संकल्प: स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।

    पूजन: भगवान विष्णु के माधव रूप की मूर्ति को पंचामृत से अभिषेक कराएं। उन्हें पीले फूल, तुलसी दल, धूप और दीप अर्पित करें।

    मंत्र जाप: पूजा के दौरान ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का निरंतर जाप करें।

    भोग: भगवान को तिल से बने पकवान या तिल और गुड़ के लड्डू का भोग लगाएं।

    दान: पूजा के बाद किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को तिल, कंबल, अनाज या स्वर्ण का दान करना बहुत फलदायी होता है।

    तिल द्वादशी की कथा

    एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मणी भगवान विष्णु की परम भक्त थी और बहुत कठिन व्रत करती थी। उसने दान तो बहुत किया लेकिन कभी अन्न का दान नहीं किया। जब वह वैकुंठ गई, तो उसे वहां रहने के लिए कुटिया तो मिली लेकिन वह खाली थी। तब भगवान ने उसे बताया कि अन्न दान न करने के कारण ऐसा हुआ। तब उस ब्राह्मणी ने देव कन्याओं के कहने पर तिल द्वादशी का व्रत किया और तिल का दान किया, जिससे उसकी कुटिया धन-धान्य से भर गई।

  • षटतिला एकादशी व्रत

    🌷 षटतिला एकादशी व्रत 🌷
    14 जनवरी 2026,बुधवार

    माध् मास के कृष्ण पक्ष { गुजरात एवं महाराष्ट्र के अनुसार पौष मास के कृष्ण पक्ष } की एकादशी को ‘ षटतिला एकादशी’ कहते हैं जो इस बार 14 जनवरी 2026,बुधवार के दिन है🙏

    👉 एकादशी तिथि प्रारम्भ👇

    कल 13 जनवरी 2026, मंगलवार दोपहर 03:17 मिनट से

    👉 एकादशी तिथि समाप्त👇

    14 जनवरी 2026, बुधवार शाम 05:57 मिनट पे

    👉 पारण का समय👇

    15 जनवरी 2026, गुरुवार प्रातः 07:15 से 09:21 तक

    { विशेष : एकादशी का व्रत सूर्य उदय तिथी बुधवार के दिन ही रखें…..🙏 मंगलवार शाम को एवं परसों बुधवार व्रत के दिन खाने में चावल या चावल से बनी हुई चीज वस्तुओं का प्रयोग बिल्कुल भी ना करें 🙏अगर आपने व्रत नहीं रखा है तो भी 🙏

    षटतिला” का अर्थ है
    षट” यानी 6 {छह}
    “तिला” यानी तिल

    कुल मिलाकर 6 प्रकार से तिल के प्रयोग को “षटतिला एकादशी” कहते हैं🙏

    👉 एकादशी व्रत पूजा विधि 👇

    👉”षट्तिला एकादशी” के दिन मनुष्य को भगवान विष्णु के निमित्त व्रत रखना चाहिए। व्रत करने वालों को गंध, पुष्प, धूप दीप, ताम्बूल सहित विष्णु भगवान का षोड्षोपचार से पूजन करना चाहिए। उड़द और तिल मिश्रित खिचड़ी बनाकर भगवान को भोग लगाना चाहिए। रात्रि के समय तिल से 108 बार ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय स्वाहा’ इस मंत्र से हवन करना चाहिए।

    { तिल की उत्पत्ति प्रभु श्री हरि विष्णु के शरीर से हुई है इसीलिए तिल को धार्मिक कार्यों में पवित्र माना जाता है}

    षटतिला एकादशी का व्रत रखने वालों को उस दिन तिल (Sesame) का प्रयोग करना होता है. इस व्रत में तिल का प्रयोग करने से सुख और सौभाग्य बढ़ता है. माघ मास में सर्दी होती है, तिल की तासीर गरम होती है और यह स्वास्थ्यवर्धक भी होता है. इस व्रत में तिल का प्रयोग करने से सेहत भी अच्छी रहती है🙏

    षटतिला एकादशी के दिन तिल का प्रयोग 6 प्रकार से करते हैं. तिल के प्रयोग के बिना षटतिला एकादशी व्रत पूरा नहीं होता है, इसलिए आप भी यदि व्रत रखते हैं, तो इस👇 प्रकार से तिल का प्रयोग करें🙏

    👉 आइए जानते हैं कि “षटतिला एकादशी” व्रत में तिल का छह {6} प्रकार से प्रयोग कैसे करना है

    1. यदि आप षटतिला एकादशी का व्रत रखते हैं, तो उस दिन प्रात:काल में स्नान करने से पूर्व तिल का उबटन शरीर पर लगाएं . उसके बाद ही स्नान करें🙏

    2 . स्नान करने के लिए तिल मिले हुए पानी का प्रयोग करें. इसके लिए आप बाल्टी में पानी भर लें और उसमें तिल मिला दें. फिर स्नान करें.🙏

    3 .षटतिला एकादशी का व्रत रहने वाले व्यक्ति को तिल मिश्रीत जल पीना एवं शरीर में तिल के तेल से मालिश करना चाहिए. ऐसा धार्मिक विधान है. ऐसा करना सेहत के लिए लाभदायक होता है🙏

    4. षटतिला एकादशी व्रत के पूजा के समय भगवान विष्णु को तिल से बने खाद्य पदार्थों का भोग लगाएं . ऐसा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और मनोकामनाओं को पूरा करते हैं. इस दिन व्रत रहने वालों को भी तिल से बने खाद्य पदार्थों को फलाहार में शामिल करना चाहिए 🙏

    5 . भगवान विष्णु की पूजा करते समय तिल से हवन करना चाहिए . इसके लिए आप तिल में गाय का घी मिलाकर हवन कर सकते हैं🙏

    6. षटतिला एकादशी के दिन तिल का दान करना उत्तम माना जाता है .तिल का दान करने से व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है. उसे स्वर्ग में स्थान मिलता है🙏

    👉 माघ माह में तिल 👇

    माघ माह में ‘संकष्टी चतुर्थी, ‘ ‘लोहड़ी”, ‘मकरसंक्रान्ति’ षटतिला एकादशी इन सभी त्यौहारों पर तिल का सर्वाधिक महत्व है। इसके पीछे हैं तिल के विशेष गुण जिनकी बजह से माघ माह में तिल को इतना महत्व दिया जाता है।

    1 .तिल का सेवन हमारे शरीर के लिए बहुत लाभदायक होता है। सर्दियों में तिल व उसके तेल दोनों का ही सेवन करना चाहिए। काले तिल व सफेद तिल दोनों का ही उपयोग औषधीय रूप में भी किया जाता है। तिल का तेल एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है। वाइरस, एजिंग और बैक्टीरिया से शरीर की रक्षा करता है।

    2. ठंड में तिल गुड़ दोनो समान मात्रा में लेकर मिला लें। उसके लड्डू बना लें। प्रतिदिन 2 बार 1-1 लड्डू दूध के साथ खाने से मानसिक दुर्बलता एवं तनाव दूर होते है। शक्ति मिलती है।

    3. कठिन शारीरिक श्रम करने पर सांस फूलना जल्दी बुढ़ापा आना बन्द हो जाता है। इससे चुस्ती व स्फूर्ती बनी रहती है।

    4. तिल व तिल के तेल के सेवन से व सिर में इसकी मालिश करने से न केवल बाल घने और चमकदार होते हैं बल्कि बालों का गिरना भी कम हो जाता है।

    5. प्रतिदिन दो चम्मच काले तिल को चबाकर खाइए और उसके बाद ठंडा पानी पीजिए। इसका नियमित सेवन करने से पुराना बवासीर भी ठीक हो जाता है।

    6 .ठंड में तिल और गुड़ सर्द हवा से बचाता है। जिससे सर्दी, खाँसी जैसे रोग भी दूर रहते हैं

    7. तिल का उपयोग चेहरे पर निखार के लिए भी किया जाता है। तिल को दूध में भिगोकर उसका पेस्ट चेहरे पर लगाने से चेहरे पर प्राकृतिक चमक आती है, और रंग भी निखरता है। इसके अलावा तिल के तेल की मालिश करने से भी त्वचा क्रांतिमय हो जाती है

    ৪. शरीर के किसी भी अंग की त्वचा के जल जाने पर, तिल को पीसकर घी और कपूर के साथ लगाने पर आराम मिलता है, और घाव भी जल्दी ठीक हो जाता है

    9. सूखी खाँसी होने पर तिल को मिश्री व पानी के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है। इसके अलावा तिल के तेल को लहसुन के साथ गर्म करके, गुनगुने रूप में कान में डालने पर कान के दर्द में आराम मिलता है

    🙏 ओम नमो नारायणाय 🙏

  • Healing codes for Addiction

    Healing codes for Addiction

    •84 72 723 for addiction

    •55 65 569 for those who experience anger management issues, and for those who are
    around them (this can be given to someone who is yelling at everybody–just think it)

    •456 923 8484 79256 to assist with the breaking of bad habits

    •78 19 335 for eating disorder

    •25 65 993 for morbid obesity and all its sequelae

    •25 36 397 for the disease of alcohol and its abuses

    •99 61 553 to heal all dependence on smoking–tobacco and non-tobacco options

    •91 582 7139 for addiction to pain medications

    •91 278 596 for obsessive thoughts about managing pain

    •92 367 9342 to close pain gate receptors linked to complex regional pain syndrome

  • श्री ललिता चालीसा

    श्री ललिता चालीसा

    ललिता चालीसा एक भक्ति गीत है जो ललिता माता पर आधारित है। ललिता चालीसा एक लोकप्रिय प्रार्थना है जो 40 छन्दों से बनी है। ललिता माता के भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए इस चालीसा का पाठ करते हैं।

    ॥ चौपाई ॥

    जयति जयति जय ललिते माता।तव गुण महिमा है विख्याता॥

    तू सुन्दरी, त्रिपुरेश्वरी देवी।सुर नर मुनि तेरे पद सेवी॥

    तू कल्याणी कष्ट निवारिणी।तू सुख दायिनी, विपदा हारिणी॥

    मोह विनाशिनी दैत्य नाशिनी।भक्त भाविनी ज्योति प्रकाशिनी॥

    आदि शक्ति श्री विद्या रूपा।चक्र स्वामिनी देह अनूपा॥

    हृदय निवासिनी-भक्त तारिणी।नाना कष्ट विपति दल हारिणी॥

    दश विद्या है रुप तुम्हारा।श्री चन्द्रेश्वरी नैमिष प्यारा॥

    धूमा, बगला, भैरवी, तारा।भुवनेश्वरी, कमला, विस्तारा॥

    षोडशी, छिन्न्मस्ता, मातंगी।ललितेशक्ति तुम्हारी संगी॥

    ललिते तुम हो ज्योतित भाला।भक्त जनों का काम संभाला॥

    भारी संकट जब-जब आये।उनसे तुमने भक्त बचाए॥

    जिसने कृपा तुम्हारी पायी।उसकी सब विधि से बन आयी॥

    संकट दूर करो माँ भारी।भक्त जनों को आस तुम्हारी॥

    त्रिपुरेश्वरी, शैलजा, भवानी।जय जय जय शिव की महारानी॥

    योग सिद्दि पावें सब योगी।भोगें भोग महा सुख भोगी॥

    कृपा तुम्हारी पाके माता।जीवन सुखमय है बन जाता॥

    दुखियों को तुमने अपनाया।महा मूढ़ जो शरण न आया॥

    तुमने जिसकी ओर निहारा।मिली उसे सम्पत्ति, सुख सारा॥

    आदि शक्ति जय त्रिपुर प्यारी।महाशक्ति जय जय, भय हारी॥

    कुल योगिनी, कुण्डलिनी रूपा।लीला ललिते करें अनूपा॥

    महा-महेश्वरी, महा शक्ति दे।त्रिपुर-सुन्दरी सदा भक्ति दे॥

    महा महा-नन्दे कल्याणी।मूकों को देती हो वाणी॥

    इच्छा-ज्ञान-क्रिया का भागी।होता तब सेवा अनुरागी॥

    जो ललिते तेरा गुण गावे।उसे न कोई कष्ट सतावे॥

    सर्व मंगले ज्वाला-मालिनी।तुम हो सर्व शक्ति संचालिनी॥

    आया माँ जो शरण तुम्हारी।विपदा हरी उसी की सारी॥

    नामा कर्षिणी, चिन्ता कर्षिणी।सर्व मोहिनी सब सुख-वर्षिणी॥

    महिमा तव सब जग विख्याता।तुम हो दयामयी जग माता॥

    सब सौभाग्य दायिनी ललिता।तुम हो सुखदा करुणा कलिता॥

    आनन्द, सुख, सम्पत्ति देती हो।कष्ट भयानक हर लेती हो॥

    मन से जो जन तुमको ध्यावे।वह तुरन्त मन वांछित पावे॥

    लक्ष्मी, दुर्गा तुम हो काली।तुम्हीं शारदा चक्र-कपाली॥

    मूलाधार, निवासिनी जय जय।सहस्रार गामिनी माँ जय जय॥

    छः चक्रों को भेदने वाली।करती हो सबकी रखवाली॥

    योगी, भोगी, क्रोधी, कामी।सब हैं सेवक सब अनुगामी॥

    सबको पार लगाती हो माँ।सब पर दया दिखाती हो माँ॥

    हेमावती, उमा, ब्रह्माणी।भण्डासुर कि हृदय विदारिणी॥

    सर्व विपति हर, सर्वाधारे।तुमने कुटिल कुपंथी तारे॥

    चन्द्र- धारिणी, नैमिश्वासिनी।कृपा करो ललिते अधनाशिनी॥

    भक्त जनों को दरस दिखाओ।संशय भय सब शीघ्र मिटाओ॥

    जो कोई पढ़े ललिता चालीसा।होवे सुख आनन्द अधीसा॥

    जिस पर कोई संकट आवे।पाठ करे संकट मिट जावे॥

    ध्यान लगा पढ़े इक्कीस बारा।पूर्ण मनोरथ होवे सारा॥

    पुत्र-हीन संतति सुख पावे।निर्धन धनी बने गुण गावे॥

    इस विधि पाठ करे जो कोई।दुःख बन्धन छूटे सुख होई॥

    जितेन्द्र चन्द्र भारतीय बतावें।पढ़ें चालीसा तो सुख पावें॥

    सबसे लघु उपाय यह जानो।सिद्ध होय मन में जो ठानो॥

    ललिता करे हृदय में बासा।सिद्दि देत ललिता चालीसा॥

    ॥ दोहा ॥

    ललिते माँ अब कृपा करो,सिद्ध करो सब काम।

    श्रद्धा से सिर नाय करे,करते तुम्हें प्रणाम॥

  • श्री राधा रानी चरणारविन्द 

    श्री राधा रानी चरणारविन्द (राधा रानी जी का दायाँचरण )

    राधारानी जी के दायाँचरण “आठ मंगल चिन्हों” से अलंकृत है,‘शंख’, ‘गिरी’, ‘रथ’, ‘मीन’, ‘शक्ति-अस्त्र’, ‘गदा’, ‘यज्ञकुण्ड’, ‘रत्न-कुंडल’.पादांगुष्ठ के मूल पर एक ‘शंख’ है. दूसरी एवं माध्यम अँगुली के नीचे एक ‘गिरी’ है. गिरी के नीचे मध्य में एडी की ओर एक ‘रथ’ है और एड़ी पर एक ‘मीन’ है, रथ के समीप पावं के भीतरी किनारे पर एक ‘शक्ति अस्त्र’ है. रथ के दूसरी ओर पावं के बाहरी किनारे के निकट एक ‘गदा’ है. कनिष्ठा के नीचे एक ‘यज्ञकुण्ड’ है.और उसके नीचे एक ‘रत्न कुंडल’ है.

    १. शंख – शंख विजय का प्रतीक है यह बताता है कि राधा-गोविंद के चरणकमलो की शरण ग्रहण करने वाले व्यक्ति सदैव दुख से बचे रहते है और अभय दान प्राप्त करते है.२. गिरी  – यह बताता है यधपि गिरी-गोवर्धन की गिरिवर के रूप में व्रज में सर्वत्र पूजा होती है, तथापि गिरी-गोवर्धन विशेषकर राधिका की  चरण सेवा करते है.

    ३. रथ – यह चिन्ह बताता है, कि मन रूपी रथ को राधा के चरणकमलों में लगाकर सुगमता पूर्वक नियंत्रित किया जा  सकता है.४. मीन – जिस प्रकार मछली जल के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार भक्तगण क्षण भर भी राधा-श्यामसुन्दर के चरणाम्बुजों के बिना नहीं रह सकते.५. शक्ति  – यह एक भाले का घोतक है, जो व्यक्ति राधा जी कि शरण ग्रहण करता है उनके लिए श्री राधा के चरण प्रकट होकर सांसारिक जीवन के सभी अप्रिय बंधनों को काट डालते है.६.गदा – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा के चरण पापमय काम रूपी हाथी को प्रताड़ित कर सकते है.७. होम कुण्ड –  यह घोषित करता है कि राधा के चरणों का ध्यान करने वाले व्यक्ति के पाप इस प्रकार भस्म हो जाते है मानो वे यज्ञ वेदी में विघमान हो.८. कुंडल – श्री कृष्ण के कर्ण सदा राधा जी के मंजुल नूपुरो कि ध्वनि और उनकी  वीणा के मादक रागों का श्रवण करते है.

    राधा रानी जी का बायाँ चरण   

    राधा रानी जी का बायाँ चरण “ग्यारह शुभ चिन्हों” से सज्जित है. जौ, चक्र, छत्र, कंकण, ऊर्ध्वरेखा, कमल, ध्वज,  सुमन, पुष्पलता, अर्धचंद्र, अंकुश. पादांगुष्ठ के मूल पर “एक जौ” का दाना है उसके नीचे एक “चक्र” है, उसके नीचे एक “छत्र” है, और उसके नीचे एक “कंकण” है. एक “ऊर्ध्वरेखा” पावं के मध्य में प्रारंभ होती है, मध्यमा के नीचे एक “कमल” है, और उसके नीचे एक “ध्वज” है. ध्वज के नीचे एक “सुमन” है, और उसके नीचे “पुष्पलता” है, एड़ी पर एक चारु “अर्धचंद्र” है. कनिष्ठा के नीचे एक “अंकुश” अंकित है.

    1. जौ का दाना – जौ का दाना व्यक्त करता है कि भक्तजन राधा कृष्ण के पदारविन्दो कि सेवा कर समस्त भोगो ऐश्वर्य प्राप्त करते है. एक बार उनका पदाश्रय प्राप्त कर लेने पर भक्त की  अनेकानेक जन्म मरण कि यात्रा घट कर, जौ के दानो के समान बहुत छोटी हो जाती है.2. चक्र – यह चिन्ह सूचित करता है कि राधा कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, और मात्सर्य, रूपी छै शत्रुओ का  नाश करता है. ये तेजस तत्व का प्रतीक है जिसके द्वारा राधा गोविंद भक्तो के अंतःकरण से पाप तिमिर को छिन्न-भिन्न कर देते है.3. छत्र – छत्र यह सिद्ध करता है कि उनके चरणों कि शरण ग्रहण करने वाले भक्त भौतिक कष्टों कि अविराम वर्षा से बचे रहते है.4. कंकण  – राधा के चरण सर्वदा कृष्ण के हाथो में रहते है (जब वे मान करती है तो कृष्ण चरण दबाते है) जिस प्रकार कंकण सदा हाथ में रहता है.5. उर्ध्व रेखा – जो भक्त इस प्रकार राधा श्याम के पद कमलों से लिपटे रहते है, मानो वे उनकी जीवन रेखा हो वे दिव्य धाम को जाएँगे. 6. कमल – सरस सरसिज राधा गोविंद के चरणविंदो का ध्यान करने वाले मधुकर सद्रश भक्तो के मन में प्रेम हेतु लोभ उत्पन्न करता है.7. ध्वज – ध्वज उन भक्तो कि भय से बचाता और सुरक्षा करता है जो उनके चरण सरसिज का ध्यान करते है विजय का प्रतीक है.8. पुष्प – पुष्प दिखाता है कि राधा जी के चरणों कि दिव्य कीर्ति सर्वत्र एक सुमन सौरभ कि भांति फैलती है9. पुष्पलता  – यह चिन्ह बताता है कि किस प्रकार भक्तो की इच्छा लता तब तक बढती रहती है, जब तक वह श्रीमती राधा के चरणों की शरण ग्रहण नहीं कर लेती.10. अर्धचंद्र – यह बताता है कि जिस प्रकार शिव जी जैसे देवताओं ने राधा गोविंद के चरणारविन्दों के तलवो से अपने शीश को शोभित किया है, इसी प्रकार जो भक्त इस प्रकार राधा और कृष्ण के पदाम्बुजो द्वारा अपने शीश को सुसज्जित करते है वे शिव जी के समान महान भक्त बन जाते है.11. अंकुश – अंकुश इस बात का घोतक है कि राधा गोविद के चरणों का ध्यान भक्तो के मन रूपी गज को वश में करता है उसे सही मार्ग दिखाता है.इस प्रकार राधारानी के चरण सरसिज के “उन्नीस मंगल चिन्हों” का नित्य स्मरण किया जाता है.

  • YOUR BIRTH DATE AND YOUR LUCKY NUMBER

    YOUR BIRTH DATE AND YOUR LUCKY NUMBER

    1, 10, 19 & 28: This number is full of Sun’s energy. 1 is the magical number for you. Write on yellow paper with red color and always keep it with you. You never lose your energy.

    2, 11, 20 & 29: It has softness of Moon. 22 is the magical number for you. Write on white paper with yellow color and always keep it with you. You remain emotionally stable.

    3, 12, 21 & 30: It relates with intelligence of Jupiter. 333 is the magical number for you. Write on yellow paper with yellow color and always keep it with you. You never lose your speech and energy.

    4, 13, 22 & 31: It is the mystery number of Rahu. 13 is the magical number for you. Write on sky blue paper with blue color and always keep it with you. You won’t face ups-downs in life.

    5, 14 & 23: It denotes the intelligence of Mercury. 505 is the magical number for you. Write on green paper with green color and always keep it with you. You won’t divagate and your memory remains good.

    6, 15 & 24: It relates with Venus and love. 24 is the magical number for you. Write on white paper with pink color and always keep it with you. It strengthens your relations and increase attraction.

    7, 16 & 25: It relates with Ketu. 77 is the magical number for you. Write on white paper with gold color and always keep it with you. It protects you from ups-downs and serious diseases.

    8, 17 & 26: It relates with Saturn. 62 is the magical number for you. Write on blue paper with blue color and always keep it with you. It reduces struggle in your life.

    9, 18 & 27: It is the strongest number of Mars. 99 is the magical number for you. Write on white paper with red color and always keep it with you. It increases your energy and protects you from an accident

  • अंगारक विनायक चतुर्थी व्रत आज

    अंगारक विनायक चतुर्थी व्रत आज


    जब किसी महीने की चतुर्थी तिथि का संयोग मंगलवार को होता है तो इसे अंगारक चतुर्थी कहते हैं। साल में 2 या 3 बार ही अंगारक चतुर्थी का संयोग बनता है, इसलिए इसे बहुत ही शुभ मानते हैं। साल 2025 की अंतिम अंगारक चतुर्थी का संयोग इस बार 23 दिसंबर, मंगलवार को बन रहा है। इस दिन भगवान श्रीगणेश के साथ-साथ मंगलदेव की पूजा करना भी शुभ रहेगा।

    अंगारक चतुर्थी शुभ मुहूर्त

    सुबह 09:47 से 11:06 तक
    सुबह 11:06 से दोपहर 12:25 तक
    दोपहर 12:04 से 12:47 तक (अभिजीत मुहूर्त)
    दोपहर 12:25 से 01:45 तक
    दोपहर 03:04 से 04:23 तक

    अंगारक चतुर्थी व्रत-पूजा विधि

    • सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद हाथ में जल-चावल लेकर व्रत-पूजा का संकल्प लें। दिन भर व्रत के नियम का पालन करें।
    •  शुभ मुहूर्त से पहले पूजा की पूरी तैयारी कर लें। पूजन सामग्री को एक स्थान पर एकत्रित करके रख लें। पूजन स्थान को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
    • शुभ मुहूर्त शुरू होने पर पूजा स्थान पर लकड़ी का पटिया रखकर इसके ऊपर भगवान श्रीगणेश का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें। पास में ही दीपक भी जलाएं।
      भगवान की प्रतिमा पर कुमकुम से तिलक करें, फूलों की माला पहनाएं। एक-एक करके दूर्वा, अबीर, गुलाल, चावल रोली, हल्दी, फल, फूल आदि चीजें चढ़ाएं।
    • पूजा करते समय ऊं गं गणेशाय नम: मंत्र का जाप भी करें। श्रीगणेश को लड्डू का भोग लगाएं और आरती करें। समय हो तो कुछ देर मंत्र जाप भी करें।
    • रात को चंद्रमा उदय होने पर पहले जल से अर्ध्य दें और फूल, चावल आदि चीजें चढ़ाकर पूजा करें। घर के बुजुर्गों के पैर छुएं। इसके बाद स्वयं भोजन करें।
    • चतुर्थी तिथि का व्रत महिलाओं के साथ पुरुष भी कर सकते हैं। इस व्रत को करने से जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। दुखों से छुटकारा मिलता है।

    अंगारक चतुर्थी क्या है?

    संकष्टि चतुर्थी के इस विशेष दिन का नाम ‘अंगारक’ मंगल ग्रह से जुड़ा होने के कारण पड़ा है। ‘अंगारक’ का अर्थ होता है जलते हुए कोयले जैसा लाल, जो ऊर्जा, शक्ति और उत्साह का प्रतीक है। इस दिन, चतुर्थी तिथि मंगलवार को पड़ती है, इसलिए इसे अंगारक चतुर्थी कहा जाता है। इस अवसर पर लोग भगवान गणेश की पूजा के साथ-साथ मंगलदेव की भी पूजा करते हैं, जिससे जीवन में मंगल ग्रह की अनुकूलता बनी रहती है।

    किसे करना चाहिए यह व्रत?

    विशेष रूप से उन लोगों के लिए यह व्रत लाभकारी है जिनकी कुंडली में मंगल दोष या मांगलिक दोष है। इस व्रत और पूजा से उनकी जीवन में चल रही समस्याओं का समाधान संभव होता है।

  • धनतेरस की कहानी क्या है🌹

    . 🌹धनतेरस की कहानी क्या है🌹
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    ⭕दिवाली के पांच दिनों के उत्सव में धनतेरस का त्योहार पहले दिन आता है। कार्तिक माह के कृष्‍ण पक्ष की त्रयोदशी यानि तेरस के दिन यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, यमराज और माता लक्ष्मी की पूजा होती है। धनतेरस से जुड़ी हुई कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन इनमें से मुख्य रूप से 4 कथाओं का उल्लेख प्रमुखता से मिलता है।

    🪔1. धनतेरस से जुड़ी भगवान धन्वंतरि की कथा:-
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    धनतेरस की यह कथा सबसे प्रमुख है। शास्त्रों में वर्णित कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। मान्यता है कि भगवान धन्वंतरि विष्णु के अंशावतार हैं। संसार में चिकित्सा विज्ञान के विस्तार और प्रसार के लिए ही भगवान विष्णु ने धन्वंतरि का अवतार लिया था। भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने के उपलक्ष्य में ही धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

    🪔2. राजा बलि और वामन अवतार की कथा:-
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    एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन रूप में राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगकर तीनों लोकों को वापस देवताओं को दिलाया था। इस कथा का संबंध भी धन-संपत्ति की पुनः प्राप्ति से है, इसलिए इसे धनतेरस से जोड़कर देखा जाता है।

    धनतेरस से जुड़ी कथा है कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन देवताओं के कार्य में बाधा डालने के कारण भगवान विष्णु ने असुरों के गुरु शुक्राचार्य की एक आंख फोड़ दी थी। कथा के अनुसार, देवताओं को राजा बलि के भय से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंच गए। शुक्राचार्य ने वामन रूप में भी भगवान विष्णु को पहचान लिया और राजा बलि से आग्रह किया कि वामन कुछ भी मांगे उन्हें इंकार कर देना। वामन साक्षात भगवान विष्णु हैं जो देवताओं की सहायता के लिए तुमसे सब कुछ छीनने आए हैं।

    बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं मानी। वामन भगवान द्वारा मांगी गई तीन पग भूमि, दान करने के लिए कमंडल से जल लेकर संकल्प लेने लगे। बलि को दान करने से रोकने के लिए शुक्राचार्य राजा बलि के कमंडल में लघु रूप धारण करके प्रवेश कर गए। इससे कमंडल से जल निकलने का मार्ग बंद हो गया।

    वामन भगवान शुक्रचार्य की चाल को समझ गए। भगवान वामन ने अपने हाथ में रखे हुए कुशा को कमण्डल में ऐसे रखा कि शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई। शुक्राचार्य छटपटाकर कमण्डल से निकल आए। इसके बाद बलि ने तीन पग भूमि दान करने का संकल्प ले लिया। तब भगवान वामन ने अपने एक पैर से संपूर्ण पृथ्वी को नाप लिया और दूसरे पग से अंतरिक्ष को। तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं होने पर बलि ने अपना सिर वामन भगवान के चरणों में रख दिया। बलि दान में अपना सब कुछ गंवा बैठा। इस तरह बलि के भय से देवताओं को मुक्ति मिली और बलि ने जो धन-संपत्ति देवताओं से छीन ली थी उससे कई गुना धन-संपत्ति देवताओं को मिल गई। इस उपलक्ष्य में भी धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

    🪔3. यमराज और राजकुमार की कथा (यम दीपदान से संबंधित):-
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    एक और प्रचलित कथा राजा हेम के पुत्र से जुड़ी है, जिसकी कुंडली में विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से मृत्यु का योग था। उसकी पत्नी ने चौथे दिन घर के द्वार पर सोने-चांदी के आभूषण और सिक्कों का ढेर लगाकर, पूरी रात दीपक जलाए रखे।

    जब यमदूत सर्प के रूप में आए, तो दीपकों के तेज और आभूषणों की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं और वे राजकुमार के पास नहीं पहुँच पाए। यमराज ने वापस जाकर बताया कि वे उस घर में प्रवेश नहीं कर पाए। इस घटना के कारण अकाल मृत्यु का भय टला। इसीलिए धनतेरस पर यमराज के लिए दीपदान किया जाता है।

    🪔4. माता लक्ष्मी जी और किसान की कथा:-
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    उत्तरी भारत में कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन धनतेरस का पर्व पूरी श्रद्धा व विश्वास के साथ मनाया जाता है। धनवंतरी के अलावा इस दिन, देवी लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की भी पूजा करने की मान्यता है। कहा जाता है कि एक समय भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे तब लक्ष्मी जी ने भी उनसे साथ चलने का आग्रह किया।

    तब विष्णु जी ने कहा कि यदि मैं जो बात कहूं तुम अगर वैसा ही मानो तो फिर चलो। तब लक्ष्मी जी उनकी बात मान गईं और भगवान विष्णु के साथ भूमंडल पर आ गईं। कुछ देर बाद एक जगह पर पहुंचकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से कहा कि जब तक मैं न आऊं तुम यहां ठहरो। मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर मत आना। विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी के मन में कौतूहल जागा कि आखिर दक्षिण दिशा में ऐसा क्या रहस्य है जो मुझे मना किया गया है और भगवान स्वयं चले गए।

    लक्ष्मी जी से रहा न गया और जैसे ही भगवान आगे बढ़े लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं। कुछ ही आगे जाने पर उन्हें सरसों का एक खेत दिखाई दिया जिसमें खूब फूल लगे थे। सरसों की शोभा देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गईं और फूल तोड़कर अपना श्रृंगार करने के बाद आगे बढ़ीं। आगे जाने पर एक गन्ने के खेत से लक्ष्मी जी गन्ने तोड़कर रस चूसने लगीं।

    उसी क्षण विष्णु जी आए और यह देख लक्ष्मी जी पर नाराज होकर उन्हें शाप दे दिया कि मैंने तुम्हें इधर आने को मना किया था, पर तुम न मानी और किसान की चोरी का अपराध कर बैठी। अब तुम इस अपराध के जुर्म में इस किसान की 12 वर्ष तक सेवा करो। ऐसा कहकर भगवान उन्हें छोड़कर क्षीरसागर चले गए। तब लक्ष्मी जी उस गरीब किसान के घर रहने लगीं।

    एक दिन लक्ष्मीजी ने उस किसान की पत्नी से कहा कि तुम स्नान कर पहले मेरी बनाई गई इस देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना, तब तुम जो मांगोगी मिलेगा। किसान की पत्नी ने ऐसा ही किया। पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया। लक्ष्मी ने किसान को धन-धान्य से पूर्ण कर दिया। किसान के 12 वर्ष बड़े आनंद से कट गए। फिर 12 वर्ष के बाद लक्ष्मीजी जाने के लिए तैयार हुईं।

    विष्णुजी लक्ष्मीजी को लेने आए तो किसान ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया। तब भगवान ने किसान से कहा कि इन्हें कौन जाने देता है ,यह तो चंचला हैं, कहीं नहीं ठहरतीं। इनको बड़े-बड़े नहीं रोक सके। इनको मेरा शाप था इसलिए 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं। तुम्हारी 12 वर्ष सेवा का समय पूरा हो चुका है। किसान हठपूर्वक बोला कि नहीं अब मैं लक्ष्मीजी को नहीं जाने दूंगा।*🚩#ऊँ_श्रीमहालक्ष्मी_नम:🚩* 🙏🏻🙏🏻🙏🏻

  • देवी कवच का पाठ

    देवी कवच का पाठ करने के लिए, सबसे पहले स्नान कर साफ कपड़े पहनें और देवी की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाएं। इसके बाद, मां दुर्गा का ध्यान करते हुए, संकल्प लें और कवच का पाठ शुरू करें। पाठ के दौरान मन को एकाग्र रखें और शुद्ध, सात्विक भोजन ग्रहण करें। 

    पाठ करने की विधि

    1. स्नान करें: स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें। 
    2. दीपक जलाएं: देवी की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाएं। 
    3. ध्यान करें: मां दुर्गा का ध्यान करें और मन से नकारात्मक विचारों को दूर करें। 
    4. संकल्प लें: पाठ शुरू करने से पहले संकल्प लें। 
    5. पाठ शुरू करें: देवी कवच का पाठ शुरू करें। यदि आप संस्कृत में पाठ नहीं कर पा रहे हैं, तो शुद्ध हिंदी में पाठ करें, लेकिन गलत उच्चारण से बचें। 
    6. जल का पात्र रखें: पाठ के दौरान एक जल का पात्र अपने सामने रखें। 
    7. जल का प्रयोग करें: पाठ पूरा होने के बाद, उस जल को अपने ऊपर या घर में छिड़क सकते हैं। 

    ध्यान रखने योग्य बातें

    • सात्विक रहें: प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और अन्य तामसिक भोजन से बचें। 
    • ब्रह्मचर्य का पालन करें: पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। 
    • शुद्ध मन रखें: मन में कोई छल-कपट या लोभ-लालच न रखें। 
    • वातावरण शुद्ध रखें: आसपास के वातावरण को स्वच्छ और सुगंधित रखें। 
    • शुद्ध उच्चारण: उच्चारण पर ध्यान दें, लेकिन यदि उच्चारण में गलती हो तो भी मन की शुद्धता और भाव अधिक महत्वपूर्ण हैं, Quora। 

    लाभ

    • मन और आसपास की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
    • प्रेत बाधा जैसी समस्याओं से मुक्ति मिलती है।
    • संकटों, शत्रुओं और रोगों से बचाव होता है।
    • न्यायालय से जुड़े मामलों में विजय मिलती है।

    ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रम्हा ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम, दिग्बंधदेवतास्तत्वम, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन विनियोगः ।।

    ॐ श्री चण्डिका देवी को नमस्कार है।

    ।। मार्कण्डेय उवाच ।।
    ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणांम|
    यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह || 1 ||

    मार्कण्डेय जी ने कहा:  पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा सभी मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट न किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये. || 1 ||

    ।। ब्रम्होवाच ।।
    अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम |
    देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने || 2 ||

    ब्रह्मा जी बोले:  ब्रह्मन्! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है, जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उद्धार करने वाला है| महामुने! उसे श्रवण करो || 2 ||

    प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रम्ह्चारणी |
    तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्मांडेति चतुर्थकम || 3 ||

    देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं| उनके पृथक-पृथक (अलग-अलग) नाम बतलाये जाते हैं. प्रथम नाम शैलपुत्री है, दूसरी मूर्ति का नाम ब्रह्मचारिणी है, तीसरा स्वरुप चंद्रघंटा के नाम से प्रसिद्ध है, चौथी मूर्ति को कूष्मांडा कहते हैं || 3 ||

    पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च |
    सप्तमम् कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् || 4 ||

    पांचवी दुर्गा का नाम स्कंदमाता है, देवी के छठे रूप को कात्यायनी कहते हैं, सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरुप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है || 4 ||

    नवमम् सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः |
    उक्तान्येतानि नामानि ब्रम्हणैव महात्मना || 5 ||

    नवीं दुर्गा का नाम सिद्धिदात्री है| ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं || 5 ||

    अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे |
    विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः || 6 ||

    न तेषां जायते किँचिदशुभं रणसंकटे |
    नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि || 7||

    जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रु से घिर गया हो, विषम संकट में फँस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती की शरण में प्राप्त हुए हों, उनका कभी अमंगल नहीं होता| युद्ध के समय में संकट में पड़ने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखाई देती| उन्हें शोक दुःख और भय की प्राप्ति नहीं होती || 6-7 ||

    यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते |
    ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः || 8 ||

    जिन्होंने भक्ति पूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है| देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिंतन करते हैं, उनकी तुम निस्संदेह रक्षा करती हो || 8 ||
    प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना |
    ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुणासना || 9 ||

    चामुण्डा देवी प्रेत पर आरूढ़ होती हैं, वाराही भैंसे पर सवारी करती हैं, ऐन्द्री का वाहन ऐरावत (हाथी) है, वैष्णोदेवी गरुड़ पर ही आसन जमाती हैं || 9 ||

    माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना |
    लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया || 10 ||

    माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ़ होती हैं, कौमारी का वाहन मयूर है| भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी देवी कमल के आसन पर विराजमान हैं और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं || 10

    स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी ।। 27 ।।

    कंठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कंठ की नली में नलकूबरी रक्षा करें| दोनों कधों में खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करें || 27 ||

    हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चांगुलीषु च ।।
    नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ।। 28 ।।

    दोनों हाथों में दंडिनी और अँगुलियों में अम्बिका रक्षा करें| शूलेश्वरी नखों की रक्षा करें| कुलेश्वरी कुक्षि (पेट) में रहकर रक्षा करें || 28 ||

    स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी ।
    हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ।। 29 ।।

    महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनासिनी देवी मन की रक्षा करें| ललिता देवी ह्रदय में और शूलधारिणी उदार में रहकर रक्षा करें || 29 ||

    नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्र्वरी तथा ।
    पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ।।30 ।।

    नाभि में कामिनी और गुह्यभाग की गुह्येश्वरी रक्षा करें| पूतना और कामिका लिंग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करें || 30 ||

    कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी ।
    जंघे महाबला रक्षेद् सर्वकामप्रदायिनी ।।31।।

    यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ।। 46 ।।

    दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः ।
    जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ।। 47 ।।

    देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है| जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है, उसे दैवी कला प्राप्त होती है तथा वह तीनों लोकों में कहीं भी पराजित नहीं होता| इतना ही नहीं, वह अमृत्यु से रहित हो सौ से भी अधिक वर्षों तक जीवित रहता है  || 46-47 ||

    नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ।
    स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम् ।। 48 ।।

    मकरी, चेचक और कोढ़ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियां नष्ट हो जाती हैं| कनेर, भांग, अफीम, धतूरे आदि का स्थावर विष, सांप और बिच्छू आदि के काटने से चढ़ा हुआ जंगम विष तथा अहिफेन और तेल के संयोग आदि से बनने वाला कृत्रिम विष! ये सभी प्रकार के विष दूर हो जाते हैं, उनका कोई भी असर नहीं होता || 48 ||

    अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ।
    भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः ।। 49 ।।

    इस पृथ्वी पर मारण, मोहन, आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकार के जितने मंत्र-यंत्र होते हैं, वे सब इस कवच को हृदय में धारण कर लेने पर उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं| ये ही नहीं, पृथ्वी पर विचारने वाले ग्राम देवता, आकाशचारी देवविशेष, जल के सम्बन्ध से प्रकट होने वाले गण, उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाले निम्नकोटि के देवता || 49 ||

    सहजा कुलज माला डाकिनी शाकिनी तथा ।
    अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्र्च महाबलाः ।। 50 ।।

    अपने जन्म के साथ प्रकट होने वाले देवता, कुलदेवता, माला (कंठमाला आदि), डाकिनी, शाकिनी, अंतरिक्ष में विचारने वाली भयानक डाकिनियाँ || 50 ||

    ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
    ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ।। 51 ।।

    ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी || 51 ||

    नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ।
    मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ।।52 ।।

    ह्रदय में कवच धारण किये रहने पर उस मनुष्य को देखते ही भाग जाते हैं| कवचधारी पुरुष को राजा से सम्मान-वृद्धि प्राप्त होती है| यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला और उत्तम है || 52 ||

    यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले
    जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ।। 53 ।।

    यावद्-भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।
    तावत्तिष्टति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी ।। 54 ।।

    कवच का पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है| जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डी का पाठ करता है, उसकी जब तक वन, पर्वत और काननों (जंगलों) सहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तब तक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परंपरा बनी रहती है || 53-54 ||

    देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ।
    प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः ।। 55 ।।

    फिर देह का अंत होने पर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से उस नित्य परमपद को प्राप्त होता है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है || 55 ||

    लभते परमं रुपं शिवेन सह मोदते ।। ॐ ।। 56 ।।

    वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और कल्याणमय शिव के आनंद का भागी होता है || 56 ||

    ।। इति श्रीवाराहपुराणे हरिहरब्रह्मविरचितं दे व्याः कवचम् संपूर्णम् ।।