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  • Bhrigu Bindu, or Destiny Point

    The Bhrigu Bindu, or Destiny Point, is a significant point in Vedic astrology located between the Moon and Rahu, representing a focal point where karma manifests and life lessons unfold. Its position in each of the 12 houses highlights a specific area of life where one’s destiny will be shaped and challenged, guiding the individual toward growth and balance

    Here is a general interpretation of the Bhrigu Bindu in each house:

    • First House: In this house, the Bhrigu Bindu indicates a focus on self and identity, with challenges and lessons centered around one’s personality and self-awareness. 
    • Second House: Destiny is linked to family and wealth, with the position shaping finances, personal values, and the ability to acquire wealth. 
    • Third House: The Bhrigu Bindu here signifies the importance of communication, courage, siblings, and networking, with opportunities in commerce, writing, and media. 
    • Fourth House: This placement points to a focus on home, mother, property, and security. It suggests a deep connection to family and a desire to protect one’s community or homeland. 
    • Fifth House: Lessons and luck are found in creativity, children, education, and intellect. This house highlights the role of children, creative pursuits, and learning. 
    • Sixth House: The Bhrigu Bindu here indicates challenges and effort in daily work, service, and health. Success often comes through hard work, job-related activities, and overcoming obstacles. 
    • Seventh House: Destiny unfolds through relationships and partnerships. The position highlights transformation in marriage, business ventures, and dealings with others. 
    • Eighth House: This house points to transformation, intimacy, and shared resources. It may involve inheritance and dealing with family matters through in-laws. 
    • Ninth House: Spiritual growth and wisdom are emphasized, with destiny linked to higher learning, long-distance travel, and religious pursuits. 
    • Tenth House: The public life, career, and reputation are the focal points of destiny. This placement suggests changes in professional life and public standing. 
    • Eleventh House: Destiny involves friendships, aspirations, and fulfillment of desires. This area of life, including connections with elder siblings and friends, is a key focus. 
    • Twelfth House: This house points to spiritual enlightenment, isolation, and foreign connections. Destiny may involve a journey toward spiritual understanding or complete spiritual isolation
  • दुर्गा सप्तशती के पाठों का महत्व

    💐दुर्गा सप्तशती के पाठों का महत्व💐
    ==================

    1. मार्कण्डेय पुराण में वर्णित चमत्कारिक देवी महात्म्य में माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन।
    2. इसे स्वयं ब्रह्मा जी ने मनुष्यों की रक्षा के लिए बेहद गुप्त और परम उपयोगी मनुष्य का कल्याण कारी देवी कवच बताया गया है। स्वयं ब्रह्मदेव ने कहा है, कि जो मनुष्य दुर्गा सप्तशती का पाठ करेगा, वह परम सुख भोगेगा।
    3. इस दुर्गा सप्तशती को शत चंडी, नवचंडी अथवा चंडीपाठ भी कहा गया है।
    4. ये एक जागृत तंत्र विज्ञान है, दुर्गा सप्तशती पाठ के श्लोको का असर निश्चित रूप से होता है। और तीव्र गति से इसका प्रभाव पड़ता है। इसमें ब्रह्माण्ड की तीव्र शक्तिओ का ज्ञान छुपा है।

    5.यदि मनुष्य सही तरीके से और सही विधि से पढ़ लेता है तो मनुष्य के जीवन की समस्त परेशानियों का अंत सुनिश्चित है।

    दुर्गा सप्तशती पाठ का फल…💐

    👉दुर्गा सप्तशती अध्याय – 1

    किसी भी प्रकार की चिंता है,किसी भी प्रकार का मानसिक विकार यानी की मानसिक कष्ट है। तो दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय के पाठ से इन सभी मानसिक विचारों और दुष्चिंताओं से मुक्ति मीलती है।
    इंसान की चेतना जागृत होती है और विचारों को सही दिशा मीलती है। किसी भी प्रकार के नेगेटिव विचार आप पर हावी नहीं होते हैं। अतः दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय से आपको हर प्रकार की मानसिक चिंताओं से मुक्ति मीलती है।

    👉दुर्गा सप्तशती अध्याय – 2

    दुर्गा सप्तशती के दूसरे अध्याय के पाठ से मुकदमे में विजय मीलती है। किसी भी प्रकार का आपका झगड़ा हो, वाद विवाद हो, उसमें शांति आती है,और आपके मान, सम्मान की रक्षा होती है।
    दूसरा पाठ विजय के लिए होता है। लेकिन आपका उद्देश्य आपकी मंशा सही होनी चाहिए तभी ये पाठ फल देता है। अगर आप झूठ की बुनियाद मैं कभी इस अध्याय का पाठ करते हैं और चाहते हैं कि माँ आपकी सहायता करें,तो ये आपकी बहुत बड़ी भूल है।

    👉दुर्गा सप्तशती अध्याय – 3

    तीसरे अध्याय का पाठ शत्रुओं से छुटकारा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। दोस्तों शत्रुओं का भय व्यक्ति के जीवन में बहुत पीड़ा का कारण होता है क्योंकि भय ग्रस्त व्यक्ति चाहे वो कितनी भी सुख सुविधा में रह रहा हो कभी भी सुखी नहीं रह सकताहै अतः इस अध्याय के पाठ करने से आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार के भय नष्ट हो जाते हैं। अगर आपके गुप्त शत्रु हैं जिनका पता नहीं चलता और जो सबसे ज्यादा हानि पहुंचा सकते हैं तो ऐसे शत्रुओं से छुटकारा पाने के लिए तीसरे अध्याय का पाठ करना सर्वोत्तम होता है।

    👉दुर्गा सप्तशती अध्याय – 4

    दुर्गा सप्तशती का चौथा अध्याय माँ की भक्ति प्राप्त करने के लिए उनकी शक्ति उनकी ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए और उनके दर्शनों के लिए सर्वोत्तम है।
    वैसे तो इस ग्रंथ के हर अध्याय के हर शब्द में माँ की ऊर्जा निहित है। फिर भी माँ की निष्काम भक्ति महसूस करने के लिए और दर्शनों के लिए यह अध्याय सर्वश्रेष्ठ जान पड़ता है।

    👉दुर्गा सप्तशती अध्याय – 5

    पांचवे अध्याय के प्रभाव से हर प्रकार के भय का नाश होता है। चाहे वो भूत प्रेत की बाधा हो,या बुरे स्वप्न परेशान करते हो। या व्यक्ति हर जगह से परेशान हो,तो पांचवें अध्याय के पाठ से इन सभी चीजों से मुक्ति मीलती है।

    👉दुर्गा सप्तशती अध्याय – 6

    इस अध्याय का पाठ किसी भी प्रकार की तंत्र बाधा हटाने के लिए किया जाता है।इसके अलावा आपको लगता है कि आपके ऊपर जादू ,टोना किया गया हो,आपके परिवार को बांध दिया हो,या राहु और केतु से आप पीड़ित हो तो छठवें अध्याय का पाठ इन सभी कष्टों से आपको मुक्ति दिलाता है।

    👉दुर्गा सप्तशती अध्याय – 7

    किसी भी विशेष कामना की पूर्ति के लिए सातवाँ अध्याय सर्वोत्तम है। अगर सच्चे और निर्मल दिल से माँ की पूजा की जाती है और सातवें अध्याय का पाठ किया जाता है तो व्यक्ति की कामना पूर्ति अवश्य होती हैं।

    👉दुर्गा सप्तशती अध्याय – 8

    अगर आपका कोई प्रिय आपसे बिछड़ गया हैं, कोई गुमशुदा है और आप उसे ढूँढकर थक चूके हैं तो आठवें अध्याय का पाठ चमत्कारिक फल प्रदान करता है।

    बिछड़े हुए लोगों से मिलने के लिए। इसके अलावा वशीकरण के लिए भी इस अध्याय का पाठ किया जाता है,लेकिन वशीकरण सही व्यक्ति के लिए किया जा रहा है,
    सही मंशा के साथ किया जा रहा हो, इसका ध्यान रखना बहुत आवश्यक है,नहीं तो फायदे की जगह नुकसान हो सकता है। इसके अलावा धन लाभ के लिए धन प्राप्ति के लिए भी आठवें अध्याय का पाठ बेहद शुभ माना जाता है।

    👉दुर्गा सप्तशती अध्याय – 9

    नौवा अध्याय का पाठ संतान के लिए किया जाता है। पुत्र प्राप्ति के लिए या संतान से संबंधित किसी भी परेशानी के निवारण के लिए दुर्गा सप्तशती के नवम अध्याय का पाठ किया जाता है। इसके अलावा संतान की उन्नति प्रगति के लिए तथा किसी भी प्रकार की खोई हुई अमूल्य वस्तु की प्राप्ति के लिए भी नौवें अध्याय का पाठ करना उत्तम होता है। यह आपकी हर मनोकामना पूर्ण करने में सहायक है।

    👉दुर्गा सप्तशती अध्याय – 10

    अगर संतान गलत रास्ते पर जा रही है तो ऐसी भटकी हुई संतान को सही रास्ते पर लाने के लिए दसवां अध्याय सर्वश्रेष्ठ है। अच्छे और योग्य पुत्र की कामना के साथ अगर दसवें अध्याय का पाठ किया जाए, तो योग्य संतान की प्राप्ति होती हैं और प्राप्त संतान सही रास्ते पर चलती है।

    👉दुर्गा सप्तशती अध्याय – 11

    अगर आपके व्यापार में हानि हो रही है,पैसों का जाना रुक नहीं रहा है,किसी भी प्रकार से धन की हानि आपको हो रही हो,तो इस अध्याय का पाठ करना चाहिए। इसके प्रभाव से आपके अनावश्यक खर्चे बंद हो जाते है। और घर में सुख शांति का वास रहता है।

    👉दुर्गा सप्तशती अध्याय – 12

    इस अध्याय का पाठ करने से व्यक्ति को मान सम्मान की प्राप्ति होती है। इसके अलावा जिस व्यक्ति पर गलत दोषारोपण कर दिया जाता है,जिससे उसके सम्मान की हानि होती है तो ऐसी स्थिती से बचने के लिए दुर्गा सप्तशती के 12 वें अध्याय का पाठ करना चाहिए।

    रोगों से मुक्ति के लिए भी 12 वें अध्याय का पाठ करना असीम लाभकारी है। कोई भी ऐसा रोग जिससे आप बहुत सालो से दुखी है और डॉक्टर की दवाइयों का कोई असर नहीं हो रहा है। तो 12 वे अध्याय का पाठ आपको अवश्य करना चाहिए।

    👉दुर्गा सप्तशती अध्याय – 13

    तेहरवे अध्याय का पाठ माँ भगवती की भक्ति प्रदान करता है। किसी भी साधना के बाद माँ की पूर्ण भक्ति के लिए इस अध्याय का पाठ अति महत्वपूर्ण है।

    किसी विशेष मनोकामनाओ को पूर्ण करने के लिए,किसी भी इच्छित वस्तु की प्राप्ति के लिए,इस अध्याय का पाठ अत्यंत प्रभावी माना गया है।

  • पितृदोष निवारण पितृशांति के उपाय :-🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

    पितृदोष निवारण पितृशांति के उपाय :-
    🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

    पितृदोष और पितृशांति के लिये
    🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
    श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करना सबसे उत्तम रहता है तथा पितृदोष और पितृशांति के लिए श्री कृष्ण चरित्र कथा श्रीमद्भागवत महापुराण का पाठ विद्वान ब्राह्मणों से करवाना चाहिए |और साथ ही पितृपूजा भी करवानी चाहिए |
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    पितृदोष और पितृशांति के लिये सबसे पहले श्री कृष्ण
    की पूजा करनी चाहिए और
    भगवद्गीता के 12 वें और 13वें अध्याय का पाठ,
    संकल्प के साथ करना चाहिए और इस पाठ को पितरों को समर्पित करना चाहिए |
    इसी तरह ग्रहशांति या सभी ग्रहों की शांति की लिए
    निचे लिखे इस मंत्र की 1008 आहुतियाँ देनी चाहिए :-
    “ओम् नमो भगवते वासुदेवाय”
    तथा :-
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    इसके अतिरिक्त आप गजेंद्र मोक्ष का पाठ करें ।

  • वास्‍तु और बच्‍चों की पढ़ाई(Vastu tips for Education

    वास्‍तु और बच्‍चों की पढ़ाई(Vastu tips for Education)

    प्रत्येक अभिवावक की आकांक्षा होती है कि वह अपनी सन्तान को हर सम्भव साधन जुटाकर बेहतर से बेहतर शिक्षा उपलब्ध करा सके जिससे उसके व्यकितत्व में व्यापकता आये और वह स्वंय जीवनरूपी नैय्या का खेवनहार बनें। सारी सुविधायें होने के बावजूद भी जब बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लगता है एंव जो कुछ पढ़ते है, वह शीघ्र ही भूल जाते हैं या फिर अधिक परिश्रम करने के बावजूद भी परीक्षाफल सामान्य ही रहता है। ऐसी सिथतियों में वास्तु का सहयोग लेने से आश्चर्यचकित परिणाम सामने आते है। अध्ययन कक्ष में इस प्रकार की व्यवस्था होनी चाहिए कि बच्चों का पढ़ाई के प्रति रूझान बढ़े एंव मन एकाग्र होकर अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हो सके।
    1- घर में अध्ययन कक्ष ईशान कोण अथवा पूर्व या उत्तर दिशा में बनवाना चाहिए। अध्ययन कक्ष शौचालय के निकट कदापि न बनवायें।
    2- पढ़ने की टेबल पूर्व या उत्तर दिशा में रखें तथा पढ़ते समय मुख उत्तर या पूर्व की दिशा में ही होना चाहिए। इन दिशाओं की ओर मुख करने से सकारात्मक उर्जा मिलती है जिससे स्मरण शकित बढ़ती है एंव बुद्धि का विकास होता है।
    3- पढ़ने वाली टेबल को दीवार से सटा कर न रखें। पढ़ते वक्त रीढ़ को हमेशा सीधा रखें। लेटकर या झुककर नहीं पढ़ना चाहिए। पढ़ने की सामग्री आखों से लगभग एक फीट की दूरी पर रखनी चाहिए।
    4- अध्ययन कक्ष में हल्के रंगों का प्रयोग करें। जैसे- हल्का पीला, गुलाबी, आसमानी, हल्का हरा आदि।
    5- राति्र को आधिक देर तक नहीं पढ़ना चाहिए क्योंकि इससे तनाव, चिड़चिड़ापन, क्रोध,दृषिट दोष, पेट रोग आदि समस्यायें होने की प्रबल आशंका रहती है। ब्रहममुहूर्त या प्रात:काल में 4 घन्टे अध्ययन करना राति्र के 10 घन्टे के बराबर होता है। क्योंकि प्रात:काल में स्वच्छ एंव सकारात्मक ऊर्जा संचरण होती है जिससे मन व तन दोनों स्वस्थ्य रहते हैं।
    6- अध्ययन कक्ष में किताबों की अलमारी को पूर्व या उत्तर दिशा में बनायें तथा उसकी सप्ताह में एक बार साफ-सफार्इ अवश्य करनी चाहिए। अलमारी में गणेश जी की फोटो लगाकर नित्य पूजा करनी चाहिए।
    7-बीएड, प्रशासनिक सेवा, रेलवे, आदि की तैयारी करने वाले छात्रो का अध्ययन कक्ष पूर्व दिशा में होना चाहिए। क्योंकि सूर्य सरकार एंव उच्च पद का कारक तथा पूर्व दिशा का स्वामी है।
    8- बीटेक, डाक्टरी, पत्रकारिता, ला, एमसीए, बीसीए आदि की शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रो का अध्ययन कक्ष दक्षिण दिशा में होना चाहिए तथा पढ़ने वाली मेज आग्नेय कोण में रखनी चाहिए। क्योंकि मंगल अगिन कारक ग्रह है एंव दक्षिण दिशा का स्वामी है।
    9- एमबीए, एकाउन्ट, संगीत, गायन, और बैंक की आदि की तैयारी करने वाले छात्रों का अध्ययन कक्ष उत्तर दिशा में होना चाहिए क्योंकि बुध वाणी एंव गणित का संकेतक है एंव उत्तर दिशा का प्रतिनिधित्व करता है।
    10- रिसर्च तथा गंभीर विषयों का अध्ययन करने वाले छात्रों का अध्ययन कक्ष पशिचम दिशा में होना चाहिए क्योंकि शनि एक खोजी एंव गंभीर ग्रह है तथा पशिचम दिशा का स्वामी है। यदि उपरोक्त छोटी-2 सावधानियां रखी जायें तो निशिचत तौर पर आप कैरियर में सफलता के सोपान रच सकते हैं।

  • SARAL UPAY 》》》

    SARAL UPAY 》》》→
    ◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

    1. प्रति दिन अगर रोटी सेंकने से पहले तवे पर दूध
      के छींटे मारें, तो घर में
      बीमारी का प्रकोप कम होगा।————–
      2.प्रत्येक गुरुवार को तुलसी के पौधें को थोडा -सा दूध
      चढाने से घर में लक्ष्मी का स्थायी वास
      होता है।———————————
    2. प्रति दिन संवेरे पानी में थोडा-सा नमक मिला कर घर
      में पोंछा करें, मानसिक शांति मिलेगी।——–
    3. प्रतिदिन सवेरे थोडा-सा दूध और पानी मिला कर
      मुख्य द्वार के दोनों ओर डाले, सुख-शांति मिलेगी।———————————
    4. मुख्य द्वार के परदे के नीचे कुछ घुंघरु बांध दे,
      इसके संगीत से घर में प्रसन्नता का वातावरण बनेगा।———————————-
    5. प्रति दिन शाम को पीपल के पेड़ को थोडा-सा दूध-
      पानी मिलाकर चढाएं, दीपक जलाएं
      तथा मनोकामना के साथ पांच परिक्रमा करें। शीघ्र
      मनोकामना पूर्ण होगी।———————
    6. प्रति दिन सवेरे पहली रोटी गाय को,
      दूसरी रोटी कुत्ते को एवं
      तीसरी रोटी छत पर
      पक्षियों को डालें।
      इससे पितृदोष से मुक्ति मिलती है तथा पितृदोष के
      कारण प्राप्त कष्ट समाप्त होते हैं ।————-
    7. किसी भी दिन शुभ-घड़ियों में पांच
      किलो साबूत नमक एक थैली में लाकर अपने घर में
      ऐसी जगह रखें जहां पानी ना लगे।
      यदि अपने आप पानी लग जाए तो इसे काम में ना ले,
      फेंक दे तथा नया नमक लाकर रख दें।
      यह घर के नकारात्मक प्रभाव को कम करता है एवं सकारात्मक
      प्रभाव को बढाता है ।।——————-

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  • कैसे लाये positivity

    कैसे लाये positivity
    =^=^=^=^=^=^=

    👉👉अपने bedroom मे कभी खाना ना खाये ।
    👉👉👉अपने bedroom मे जूते चप्पल ना रखे ।
    👉👉👉नकारात्मक सोच आये मन मे तो मोर पंख कॊ तकिये के नीचे रख कर सोये ।
    👉👉👉प्रात काल नंगे पाँव हरी घास पर खड़े होकर अपने इष्ट कॊ याद करे या मंत्र जपें।
    👉👉👉घर के किसी भी कोने मे मकडी के जाले ना लगने दे ।
    👉👉👉घर मे धुनी या धूप जलाने से भी नकारात्मक ऊर्जा बाहर जाती है ।
    👉👉👉घर के उतर पूर्व कोने मे कचरा ना रखे ।
    👉👉👉सकारात्मक ऊर्जा के लिये मुख्य द्वार पर तुलसी का पौधा लगाये
    👉👉👉दो बाँसुरी कॊ living room मे या main gate पर क्रॉस मे लगाये और लाल धागे से बाँधे । मुँह नीचे होना चहिये ।
    👉👉👉शांति के लिये धनिया उगाये और इस्तेमाल करे ।
    👉👉👉मिर्च का पौधा कभी भूल कर भी नही लगाये ।
    👉👉👉नीम्बू का पौधा से रिश्तों मे खटास आ जाती है ।

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    Astro Shalini Malhotra

  • 9 ग्रहों के 9 भोजन

    9 ग्रहों के 9 भोजन, उचित समय पर खाएं और बुरे प्रभाव से बचें –
    आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आप ग्रह-नक्षत्रों के अशुभ फल को कुछ खाकर शुभ फल में बदल सकते हैं। कहते हैं कि अन्न ही जहर है और अन्न ही अमृत है। अत: ‍उचित तिथि और समय पर निम्निलिखित भोज्य पदार्थ खाकर आप सभी ग्रहों के अच्छे फल प्राप्त कर सकते हैं।

    1. सूर्य ग्रह :– सूर्य की अनुकूलता प्राप्त करने के लिए जातक को अपने आहार में गेहूं, आम, गुड़ आदि का उपयोग करना चाहिए।

    2. चन्द्र ग्रह :– चन्द्रमा मन का कारक है अत: चन्द्रमा की अनुकूलता के लिए गन्ना, शकर, दूध और दूध से बने पदार्थ, आइसक्रीम और मिठाइयों को अपने आहार में शामिल करना चाहिए।

    3. मंगल ग्रह :– आपकी कुंडली में यदि मंगल अशुभ है तो अपने आहार में गुड़, मसूर की दाल, अनार, जौ और शहद का उपयोग कर सकते हैं।

    4. बुध ग्रह :– बुध ग्रह हमारे व्यापार और उद्योग को संचालित करता है। यदि यह कुंडली के नीच भाव में बैठकर अशुभ फल दे रहा है तो मटर, जुवार, कुलपी, हरी दालें, मूंग, हरी सब्जियां आहार में लेनी चाहिए।

    5. गुरु ग्रह :– यदि गुरु या बृहस्पति ग्रह आपकी कुंडली में अशुभ फल दे रहा है तो चना, चना दाल, बेसन, मक्का, केला, हल्दी, सेंधा नमक, पीली दालें और फलों को अपने भोजन में शामिल करें।

    6. शुक्र ग्रह :– शुक्र ग्रह जब नीच का होकर अशुभ फल देने लगे तो त्रिफला, दाल चीनी, कमलगट्टा, मिश्री, मूली और सफेद शलजम का प्रयोग करना चाहिए।

    7. शनि ग्रह :– शनि ग्रह का अशुभ फल जातक को पीड़ा देता है। इसकी अनुकुलता के लिए भोजन में तिल, उड़द, कालीमिर्च, मूंगफली का तेल, अचार, लौंग, तेजपत्ता तथा काले नमक का उपयोग करना चाहिए।

    8. और 9. वां छाया ग्रह राहु और केतु :– राहु और केतु की पीड़ा से बचने के लिए उड़द, तिल और सरसों का प्रयोग लाभदायक रहता है।

    अन्य उपाय :– रविवार को चना, सोमवार को खीर अथवा दूध, मंगलवार को चूरमा तथा हलवा, बुधवार को हरी सब्जी, गुरुवार को चने की दाल अथवा बेसन का प्रयोग, शुक्रवार को मीठा दही और शनिवार को उड़द का सेवन करने से सभी ग्रह प्रसन्न रहते हैं।

  • पितृपक्ष २०२५

    पितृपक्ष २०२५: पितृ पक्ष में इन चीजों का दान चढ़ाएगा सफलता की सीढ़ी, हर कष्ट दूर करेंगे पूर्वज
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    हिंदू मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए कुछ वस्तुओं का दान करना चाहिए. इससे पूर्वज प्रसन्न तो रहते ही हैं साथ ही उनका आशीर्वाद बना रहता है.

    भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से पितृपक्ष यानी कि ७ सितंबर से शुरू होने वाले हैं. इस दौरान परिजन अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं, जिससे कि उनका आशीर्वाद वंशजों पर बना रहे. पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और वे प्रसन्न होकर परिवारजनों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. वहीं, इस माह में दान पुण्य करने से भी दोगुना फल मिलता है. कुंडली में पितृदोष को दूर करने के लिए किए गए उपाय हर परेशानी दूर करते हैं. जानें वस्तुओं का दान कितना शुभ माना गया है.

    पितृपक्ष में करें इन चीजों का दान
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    ⚜️१. गौ दान
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    हिंदू मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष के दौरान गौ दान करना शुभ माना जाता है. गौ दान करने से सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है. दरआल गौ दान करने से पितृ को श्रीहरी के चरणों में स्थान मिलता है, सही वजह है कि इससे पितृ प्रसन्न रहते हैं.

    ⚜️२. गाय का घी
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    पितृपक्ष के दौरान गाय का घी दान करना शुभ माना गया है. इससे घर में सुख और शांति बनी रहती है. इतना ही नहीं जिनकी कुंडली में पितृदोष है तो उन्हें गाय का घी दान करने से लाभ मिलता है.

    ⚜️३. गुड़ का दान
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    पितृपक्ष के दौरान गुड़ का दान भी करना चाहिए. ऐसा करने से पारिवारिक जीवन सुखमय बना रहता है. गुड़ के दान से पूवर्ज प्रसन्न रहते हैं साथ ही उनका आशीर्वाद बना रहता है.

    ⚜️४. चावल और तिल का दान
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    पितृ दोष की समाप्ति के लिए पितृपक्ष के दौरान चावल, तिल और गेहूं का दान जरूर करें. इससे पितृदोष दूर करने में मदद तो मिलती ही है साथ ही पूर्वजों का भी आशीर्वाद बना रहता है.

    ⚜️५. स्वर्ण दान
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    हिंदू धर्म मान्यता है कि भाद्रपद के दौरान पितृपक्ष में स्वर्ण दान जरूर करना चाहिए. शास्त्रों में भी लिखा गया है कि स्वेच्छा अनुसार जितना बन सके उतना स्वर्ण दान करना चाहिए. इससे परिवार के सदस्यों की समस्या दूर तो होती ही है साथ ही परिजनों में खुशियां बनी रहती है
    #हरिऊँ
    🙏🏻🙏🏻🙏🏻

  • चन्द्र ग्रहण और जीवन पर प्रभाव

    🌑✨ चन्द्र ग्रहण और जीवन पर प्रभाव ✨🌑

    (वास्तु – वैदिक ज्योतिष – लाल किताब दृष्टिकोण से)
    🌸 गर्भवती महिलाओं को क्यों रखनी चाहिए सावधानी?

    🔹 शास्त्रों में कहा गया है कि ग्रहण काल में नकारात्मक किरणें (राहु-केतु की छाया) वातावरण में फैलती हैं, जो अजन्मे शिशु के मानसिक और शारीरिक विकास को प्रभावित कर सकती हैं।
    🔹 गरुड़ पुराण और स्कंद पुराण में उल्लेख है कि गर्भवती स्त्रियों को ग्रहण के समय विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

    📜 शास्त्रीय प्रमाण

    “ग्रहणे गर्भिणी नारीं निषिद्धं बहु कर्मसु।
    अशुभं जायते बालं दोषयुक्तं न संशयः॥”
    — (गरुड़ पुराण, अध्याय 1)
    👉 अर्थ: ग्रहण के समय गर्भवती स्त्री यदि सावधानी न रखे तो शिशु पर दोष या अशुभ प्रभाव पड़ सकता है।

    🌙 चन्द्रमा अशुभ या नीच होने के लक्षण

    मन में अस्थिरता, बेचैनी।

    माँ के साथ मतभेद।

    नींद की कमी।

    काम में एकाग्रता का अभाव।

    बार-बार असफलता और मानसिक भ्रम।

    🏢 करियर और व्यापार पर प्रभाव

    निर्णय क्षमता कमज़ोर।

    पार्टनरशिप और नौकरी में अस्थिरता।

    काम में उत्साह की कमी।

    सहकर्मियों से टकराव।
    🌐वास्तु दृष्टि से चन्द्र दोष

    उत्तर (कुबेर + जल) और उत्तर-पश्चिम (वरुण + वायु) के दोष से चन्द्र प्रभावित होता है।

    दोष के लक्षण:

    उत्तर दिशा में टॉयलेट, कूड़ा, अंधेरा।
    उत्तर-पश्चिम में नीला-काला रंग या टूटा सामान।
    उपाय:
    उत्तर दिशा में पानी से भरा काँच का बर्तन रखें।

    उत्तर-पश्चिम में चाँदी का शंख या सफेद फूल रखें।

    इन दिशाओं में हल्के नीले/सफेद रंग का प्रयोग करें।
    📕 लाल किताब उपाय

    सोमवार को दूध, चावल, मिश्री का दान।

    माता का सम्मान और आशीर्वाद।

    चाँदी की अंगूठी छोटी उंगली में धारण।

    प्रतिदिन चन्द्रमा को दूध/पानी से अर्घ्य।
    🌟 ग्रहण और चन्द्र दोष निवारण के आवश्यक उपाय

    1. ॐ सोमाय नमः का 108 बार जाप।
    2. सफेद वस्त्र धारण करें।
    3. सोमवार उपवास।
    4. रात को चाँदनी में ध्यान।
    5. ऑफिस/घर के उत्तर दिशा में हमेशा उजाला रखें।
      🔮 चन्द्र ग्रहण केवल आकाशीय घटना नहीं, बल्कि यह मन, स्वास्थ्य और कर्मक्षेत्र की ऊर्जा को प्रभावित करता है।
      गर्भवती महिलाओं के लिए यह और भी संवेदनशील समय है, क्योंकि शास्त्रों में कहा गया है – ग्रहण काल में माँ और गर्भस्थ शिशु दोनों की रक्षा हेतु नियमों का पालन अनिवार्य है।

    ✨ सही उपायों से चन्द्रमा शुभ होकर जीवन में शांति, सुख और सफलता देता है। ✨

  • अनंत चतुर्दशी आज

    अनंत चतुर्दशी आज


    अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश उत्सव का समापन होता है। गणेश चतुर्दशी से आरंभ हुआ यह पर्व अनंत चतुर्दशी तक चलता है। इस दिन बप्पा को विदा किया जाता है और उनको पवित्र नदी में विसर्जन किया जाता है। शास्त्रीय नियमों के अनुसार, गणेश चतुर्दशी पर जब बप्पा को घर में विराजमान किया जाता है तो डेढ़ दिन, ढाई दिन, पांच दिन, 7 दिन या फिर 11 दिन तक अपने घरों में स्थापित किया जाता है। 11वें दिन यानी अनंत चतुर्दशी पर बप्पा को विधि विधान से विदा किया जाता है।

    अनंत चतुर्दशी 2025 कब है?

    अनंत चतुर्दशी तिथि का आरंभ 6 सितंबर को सुबह 3 बजकर 14 मिनट पर आरंभ होगी और 7 सितंबर को मध्यरात्रि 1 बजकर 41 मिनट पर समाप्त होगी। शास्त्रों के अनुसार, उदय तिथि के हिसाब से 6 सितंबर को ही अनंत चतुर्दशी का पर्व मनाया जाएगा।

    अनंत चतुर्दशी पर बप्पा का विसर्जन करने का मुहूर्त

    शुभ चौघड़िया सुबह में 7 बजकर 36 मिनट से 9 बजकर 10 मिनट तक।
    लाभ चौघड़िया दोपहर में 1 बजकर 54 मिनट से 3 बजकर 28 मिनट तक।
    अमृत चौघड़िया दोपहर में 3 बजकर 29 मिनट से 5 बजकर 3 मिनट तक।
    लाभ चौघड़िया शाम में 6 बजकर 37 मिनट से 8 बजकर 3 मिनट तक।
    पंचांग के अनुसार, इन शुभ मुहूर्त में किसी भी समय आप गणेश विसर्जन कर सकते हैं।

    गणेश विसर्जन की विधि

    गणेश विसर्जन के दिन बप्पा को विदा करने से पहले स्नान आदि के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
    इसके बाद घी का दीपक जलाकर गणेश जी के मंडप के सामने आसन पर बैठकर गणेश मंत्र गं गणपतयै नम: का जप करें।
    इसके बाद गणेश जी को अक्षत, फूल, धूप, धन अर्पित करें।
    फिर गणेश जी की आरती करें और गणेश चालीसा का पाठ करें और गणेश जी को भोग लगाए। अंत में पूजा में हुई भूल चूक के लिए माफी मांगे और गणेश जी को अपने घर के पास किसी पवित्र नदी में गणेश जी का विसर्जन कर दें।