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  • मानव जीवन के लिए अरिष्ट कारक ग्रहों का विवेचन –

    मानव जीवन के लिए अरिष्ट कारक ग्रहों का विवेचन –
    ग्रह रहित अष्टम भाव पर जिस भी बलवान ग्रह की दृष्टि होती है उस ग्रह के धातु अथवा वात, पित्त, कफ आदि दोषों के प्रकोप से जातक की मृत्यु की संभावना होती है।
    यथा – ग्रह और उनकी धातुएं-
    सूर्य — पित्त प्रधान
    चंद्रमा — वात/ कफ
    मंगल — पित्त प्रधान
    बुध — कफ वात पित्त
    गुरु — कफ़/ वात
    शनि — वात प्रधान
    काल पुरुष के अष्टम स्थान स्थित मे‌षादि राशि का जो कथित अंग स्थान है, शरीर के उस अंग में उस राशि के या राशि अधिपति ग्रह के कथित धातु- ताम्र और लोहा आदि से चोट आदि लगने से जातक की मृत्यु की संभावना होती है।
    अधिक संख्या बलशाली ग्रहों की अष्टम भाव पर दृष्टि से उन सभी ग्रहों के कथित धातु दोष विशेष से जातक की मृत्यु की संभावना होती है।
    अष्टम भाव स्थित ग्रह का प्रभाव –
    सूर्य से अग्नि कोप
    चंद्र से जल द्वारा
    मंगल से अस्त्र-शस्त्र द्वारा
    बुध से वात पित्त कफ आदि दोष उत्पन्न रोग द्वारा
    गुरु से ऐसे रोग से मृत्यु होती है की रोग का ज्ञान ही नहीं हो पाता‌।
    शुक्र से तृषा पिपासा द्वारा
    शनि से क्षुधा पीड़ित होकर जातक की मृत्यु होती है।

  • श्री गणेश की दाईं सूंड या बाईं सूंड

    आईए जानते हैं ,श्री गणेश की दाईं सूंड या बाईं सूंड आप सभी लोगों के प्रश्न सुबह से आ रहे हैं………
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    अक्सर श्री गणेश की प्रतिमा लाने से पूर्व या घर में स्थापना से पूर्व यह सवाल सामने आता है कि श्री गणेश की कौन सी सूंड होनी… चाइये ?
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    क्या कभी आपने ध्यान दिया है कि भगवान गणेश की तस्वीरों और मूर्तियों में उनकी सूंड दाई या कुछ में बाई ओर होती है। सीधी सूंड वाले गणेश भगवान दुर्लभ हैं। इनकी एकतरफ मुड़ी हुई सूंड के कारण ही गणेश जी को वक्रतुण्ड कहा जाता है।

    भगवान गणेश के वक्रतुंड स्वरूप के भी कई भेद हैं। कुछ मुर्तियों में गणेशजी की सूंड को बाई को घुमा हुआ दर्शाया जाता है तो कुछ में दाई ओर। गणेश जी की सभी मूर्तियां सीधी या उत्तर की आेर सूंड वाली होती हैं। मान्यता है कि गणेश जी की मूर्त जब भी दक्षिण की आेर मुड़ी हुई बनाई जाती है तो वह टूट जाती है। कहा जाता है कि यदि संयोगवश आपको दक्षिणावर्ती मूर्त मिल जाए और उसकी विधिवत उपासना की जाए तो अभिष्ट फल मिलते हैं। गणपति जी की बाईं सूंड में चंद्रमा का और दाईं में सूर्य का प्रभाव माना गया है।

    प्राय: गणेश जी की सीधी सूंड तीन दिशाआें से दिखती है। जब सूंड दाईं आेर घूमी होती है तो इसे पिंगला स्वर और सूर्य से प्रभावित माना गया है। एेसी प्रतिमा का पूजन विघ्न-विनाश, शत्रु पराजय, विजय प्राप्ति, उग्र तथा शक्ति प्रदर्शन जैसे कार्यों के लिए फलदायी माना जाता है।
    वहीं बाईं आेर मुड़ी सूंड वाली मूर्त को इड़ा नाड़ी व चंद्र प्रभावित माना गया है। एेसी मूर्त की पूजा स्थायी कार्यों के लिए की जाती है। जैसे शिक्षा, धन प्राप्ति, व्यवसाय, उन्नति, संतान सुख, विवाह, सृजन कार्य और पारिवारिक खुशहाली।

    सीधी सूंड वाली मूर्त का सुषुम्रा स्वर माना जाता है और इनकी आराधना रिद्धि-सिद्धि, कुण्डलिनी जागरण, मोक्ष, समाधि आदि के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। संत समाज एेसी मूर्त की ही आराधना करता है। सिद्धि विनायक मंदिर में दाईं आेर सूंड वाली मूर्त है इसीलिए इस मंदिर की आस्था और आय आज शिखर पर है।

    कुछ विद्वानों का मानना है कि दाई ओर घुमी सूंड के गणेशजी शुभ होते हैं तो कुछ का मानना है कि बाई ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी शुभ फल प्रदान करते हैं। हालांकि कुछ विद्वान दोनों ही प्रकार की सूंड वाले गणेशजी का अलग-अलग महत्व बताते हैं।
    यदि गणेशजी की स्थापना घर में करनी हो तो दाई ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी शुभ होते हैं। दाई ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी सिद्धिविनायक कहलाते हैं। ऎसी मान्यता है कि इनके दर्शन से हर कार्य सिद्ध हो जाता है। किसी भी विशेष कार्य के लिए कहीं जाते समय यदि इनके दर्शन करें तो वह कार्य सफल होता है व शुभ फल प्रदान करता है।इससे घर में पॉजीटिव एनर्जी रहती है व वास्तु दोषों का नाश होता है।

    घर के मुख्य द्वार पर भी गणेशजी की मूर्ति या तस्वीर लगाना शुभ होता है। यहां बाई ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी की स्थापना करना चाहिए। बाई ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी विघ्नविनाशक कहलाते हैं। इन्हें घर में मुख्य द्वार पर लगाने के पीछे तर्क है कि जब हम कहीं बाहर जाते हैं तो कई प्रकार की बलाएं, विपदाएं या नेगेटिव एनर्जी हमारे साथ आ जाती है। घर में प्रवेश करने से पहले जब हम विघ्वविनाशक गणेशजी के दर्शन करते हैं तो इसके प्रभाव से यह सभी नेगेटिव एनर्जी वहीं रूक जाती है व हमारे साथ घर में प्रवेश नहीं कर पाती।

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    ओम नमः शिवाय
    शिवजी सदा सहाय
    सबका कल्याण हो……. ..

  • इस गणेश चतुर्थी पर हम आपको श्री गणेश जी का खास स्नान बता रहे हैं।

    💥इस गणेश चतुर्थी पर हम आपको श्री गणेश जी का खास स्नान बता रहे हैं। स्नान कराने से आप अपनी समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं।

    💥यदि आपके सूर्य की महादशा हो तो साफ जल में बिलपत्र और कुमकुम डालकर श्री गणेश जी को स्नान करना है। अनार का भोग उनके आगे रखें।

    💥चंद्रमा की दशा में है तो गाय के दूध से श्री गणेश जी को स्नान करा के मिश्री का भोग लगाओ।

    💥 मंगल की महादशा चल रही है तो लाल चंदन से श्री गणेश जी को स्नान करें और गुड़ का भोग लगाओ।

    💥बुध की महादशा चल रही है तो आप पंचगव्य को जल में डालकर स्नान कराये और हरी सौंफ का भोग लगाएं

    💥गुरु की महादशा चल रही है तो जल में केसर डालकर स्नान कराएं। केले का भोग लगाएं।

    💥शुक्र की महादशा चल रही है तो आप पंचामृत श्री गणेश जी को स्नान कराएं और जलेबी का भोग लगाएं।

    💥शनि की महादशा चल रही है तो जल में शमीपत्र डालकर श्री गणेश जी को स्नान कराएं। बूंदी का भोग लगाएं।

    💥राहु की महादशा चल रही है तो आप जल में दुर्वा डाल कर स्नान कराए। उड़द से बनी हुई मिठाई का भोग लगाओ।

    💥केतु की महादशा चल रही है तो आप डाभ को जल में डाल कर स्नान कराए और तिल से बनी हुई मिठाई का भोग लगाएं।

    💥यदि आपको अपनी जन्म कुंडली का ज्ञान नहीं हो तो आप गुडहल का फूल और केली का फूल जल में डालकर श्री गणेश जी को स्नान कराएं और मोदक का भोग लगाएं तो सभी समस्याओं से छुटकारा प्राप्त हो जाएगा….
    🌹जय गणेश🌹

  • Yantra

    जय श्री राम यह चारों यंत्र इतने दिव्य अलौकिक और चमत्कारी हैं तुरंत प्रभाव दिखाने वाले हैं और इनका प्रभाव बहुत अचूक है यंत्र दिखने में साधारण लगते हैं पर बड़े-बड़े कार्य आसानी से हल कर देते हैं जैसे एक छोटी सी दवा बड़ी सी बड़ी रोग को दूर कर देती है एक छोटा चिनगाड़ी पूरे शहर को जलाने में समर्थ रखती है इस तरीका सही या यंत्र भी दिखने में छोटे साधारण लगते हैं पर उनके हर शब्द और रेखाओं में इतनी शक्ति और समर्थ होती है जीवन के प्रतीक समस्या का समाधान चमत्कारी ढंग से दूर कर देती हैं इन यंत्रों में महाशक्ति है ब्रह्मांड की महा ऊर्जा को खींचकर अपने में धारण कर लेती है और जीवन के हर समस्या संकट का निवारण कर देती है और व्यक्ति के अंदर एक पॉजिटिव और प्रबल आत्मविश्वास भर देती है //1//(पहले यंत्र हर कार्य में सफलता देने वाला अचूक यंत्र है चाहे कार्य किसी भी क्षेत्र का हो व्यापार हो इंटरव्यू हो परीक्षा हो बड़े-बड़े उद्योग हो चाहे कार्य किसी भी चीज से जुदा हो व्यक्ति जहां जाता है वही उसका हर कार्य सफल हो जाता है छोटा हो या बड़ा )(2)))दूसरा यंत्र जीवन में किसी प्रकार का भय हो शत्रु भय हो रोग का भय हो यंत्र-मंत्र टोनी टोटके का प्रभाव लौकिक अलौकिक या अपरिचित घटना या अंदर किसी प्रकार का भई दुविधा यह ग्रह नक्षत्र का कुप्रभाव का भई सभी प्रकार के भाई को तुरंत दूर कर देती है और व्यक्ति को निर्भय बना देती है) ((3)तीसरा नंबर वाला यंत्र सर्व सिद्धि दाता लक्ष्मी यंत्र है यह बहुत प्रभावशाली अचूक हैं इसके प्रयोग से आपके जीवन में धन का आना घर में रिद्धि सिद्धि और लक्ष्मी का आगमन होने लगता है चारों तरफ से उन्नति और धन वैभव आने के रास्ते खुल जाते हैं और लक्ष्मी जी की कृपा व्यक्ति पर होने लगती है )((4)चौथा नंबर यंत्र बड़ा चमत्कारी प्रभावशाली और व्यक्ति को एक अच्छा रोजगार दिलाने में समर्थ रखता है इस यंत्र को धारण करने से व्यक्ति को बहुत जल्दी अच्छा रोजगार और अच्छा कार्य मिलता है और अच्छे रोजगार आने की सूचना होने लगती है व्यक्ति की बेरोजगारी दूर होने लगती है और रोजगार में किया गया प्रयास सफल होने लगता है )!!सभी यंत्र सिद्ध करके भेजे जाते हैं प्रयोग करना होता है इनके प्रयोग से ही सारे लाभ प्राप्त होने लगते हैं यंत्र को विशेष तरीके से सिद्ध और जागृत करके आपके दिए गए प्रति एड्रेस पर भेजा जाता है आप चारों ओर से हर कर मायूस हो गए हैं इन यंत्रों का प्रयोग से जीवन में खुशियां फिर से लौट आएगी और आपके अंदर आत्मविश्वास पैदा होने लगेगा यदि विश्वास भरोसा हो मंगवा सकते हैं “””सकल पदारथ यही जग माही कर्महीन नर पावत नाही “””दुनिया की हर चीज इसी धारा पर मौजूद है जो व्यक्ति उसे पाने का कम नहीं करते वह सबसे पीछे रह जाते हैं जिनकीया तीन पहिया शक ब्रह्म करने वाले टिप्पणी और गलतियां निकालने वाले बस उससे आगे कभी नहीं बढ़ पाते हैं सोचते सोचते समय गवा देते हैं विश्वास और भरोसा करने वाले आगे निकल जाते हैं जय श्री राम किसी भी यंत्र का सिद्ध किया हुआ यंत्र अपने एड्रेस पर मंगवा सकते हैं और अपने जीवन में चमत्कारी लाभ उठा सकते है

  • नीच का मंगल

    👉नीच का मंगल ज्योतिष में एक महत्वपूर्ण स्थिति मानी जाती है, जिसमें मंगल ग्रह “कर्क” राशि में नीच का मंगल ज्योतिष में एक महत्वपूर्ण स्थिति मानी जाती है, जिसमें मंगल ग्रह “कर्क” राशि में स्थित होता है। मंगल ग्रह का स्वभाव उग्र, आक्रामक, और ऊर्जावान होता है, और यह शक्ति, साहस, आत्मविश्वास, और प्रतियोगिता का कारक ग्रह माना जाता है। जब मंगल कर्क राशि में आता है, तो उसकी ऊर्जा कमजोर पड़ जाती है, क्योंकि कर्क राशि चंद्रमा द्वारा शासित होती है, जो संवेदनशीलता, भावनाओं और मन की शांति से संबंधित है। इस विरोधाभास के कारण मंगल के प्रभाव कमजोर हो जाते हैं, जिसे ज्योतिष में “नीच का मंगल” कहा जाता है। अब आइए विस्तार से जानते हैं कि नीच का मंगल क्या करता है:
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    1. आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता पर प्रभाव:

    •♦️ नीच का मंगल व्यक्ति के आत्मविश्वास को कमजोर कर सकता है। ऐसे लोग महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय संकोच या असमंजस महसूस कर सकते हैं।

    • ♦️इस स्थिति में, व्यक्ति के निर्णय अक्सर भावनाओं पर आधारित हो सकते हैं, जिससे वे कभी-कभी अनुचित या गलत साबित हो सकते हैं।
    • ♦️आत्मसंदेह की भावना प्रबल हो सकती है, जिसके कारण व्यक्ति अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में कठिनाई महसूस कर सकता है।

    2♦️. स्वास्थ्य समस्याएँ:

    • नीच का मंगल स्वास्थ्य के संदर्भ में भी कमजोर प्रभाव डालता है। यह व्यक्ति को रक्त, मांसपेशियों, और पित्त से संबंधित समस्याओं से प्रभावित कर सकता है।
    • ♦️चोट, दुर्घटना, या सर्जरी की संभावना अधिक रहती है, खासकर जब मंगल की दशा या महादशा चल रही हो।
    • ♦️मानसिक तनाव और चिंता भी बढ़ सकती है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    3.♦️ क्रोध, आक्रामकता और गुस्सा:

    • मंगल ग्रह के नीच होने से व्यक्ति का क्रोध और आक्रामकता अनियंत्रित हो सकती है। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आ सकता है, और व्यक्ति का व्यवहार उग्र हो सकता है।
    • ♦️यह स्थिति व्यक्ति को दूसरों के साथ अनावश्यक संघर्ष में डाल सकती है, जिससे संबंधों में कटुता आ सकती है।
    • ♦️अपने गुस्से को सही दिशा में न ले पाने के कारण, व्यक्ति को सामाजिक और पेशेवर जीवन में समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

    4.♦️ वैवाहिक जीवन और रिश्तों में तनाव:

    • नीच का मंगल वैवाहिक जीवन में भी समस्याएँ पैदा कर सकता है। यह स्थिति जीवनसाथी के साथ संघर्ष, मतभेद और तनाव का कारण बन सकती है।

    🛑• यदि व्यक्ति का मंगल विवाह से संबंधित भावों (जैसे सप्तम भाव) में स्थित हो, तो विवाह में देरी, अस्थिरता, या तलाक जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

    •🛑 रिश्तों में समझ और सामंजस्य की कमी हो सकती है, जिससे परिवार में अशांति का माहौल बन सकता है।

    🛑5. धन-संपत्ति में हानि और आर्थिक संघर्ष:

    ⛔• नीच का मंगल व्यक्ति के आर्थिक जीवन पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। निवेश में हानि, संपत्ति विवाद, और अनिश्चित आर्थिक स्थिति इस स्थिति में आम हो सकती है।

    ⛔• मंगल का नीच भाव संपत्ति, भूमि, या वाहन से जुड़े विवादों को जन्म दे सकता है, जिससे धन का नुकसान हो सकता है।

    • ⛔व्यवसाय में जोखिम लेने की प्रवृत्ति में कमी आ सकती है, और व्यक्ति आर्थिक फैसले लेने में हिचकिचा सकता है।
    1. नीचभंग राजयोग और इसका प्रभाव:

    •⛔ यदि किसी कुंडली में नीच का मंगल हो और इसके साथ ही नीचभंग योग भी बन रहा हो, तो मंगल के नकारात्मक प्रभाव कम हो सकते हैं या समाप्त हो सकते हैं। नीचभंग राजयोग तब बनता है जब नीच का ग्रह, किसी उच्च या स्वग्रही ग्रह से दृष्ट हो या किसी अन्य प्रकार से उच्च स्थिति में हो।

    • 🛑इस योग से व्यक्ति को असीमित साहस, शक्ति और सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं, जिससे वह अपने जीवन में बड़ी सफलताएँ हासिल कर सकता है।
    1. कर्म और उपाय:

    •💢 नीच का मंगल होने पर कुछ उपाय किए जा सकते हैं, जैसे मंगल के लिए विशेष पूजा, हनुमान जी की आराधना, मंगलवार का व्रत, और रक्तदान करना आदि। ये उपाय मंगल के नकारात्मक प्रभावों को कम करने में सहायक हो सकते हैं।

    •💢 लाल रंग के कपड़े पहनना और मूंगा धारण करना भी मंगल को बल देने में सहायक हो सकता है, लेकिन इसके लिए किसी योग्य ज्योतिषी से सलाह लेना आवश्यक है।

    💢नीच का मंगल कुंडली में चुनौतीपूर्ण परिस्थितियाँ ला सकता है, लेकिन सही उपायों और समझदारी से इस स्थिति के नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकता है। यह महत्वपूर्ण है कि नीच के 💢♨️मंगल का विश्लेषण किसी अनुभवी ज्योतिषी से करवाया जाए, जो आपकी व्यक्तिगत कुंडली के आधार पर सटीक मार्गदर्शन कर सके।♨️💢🛑
    एस्ट्रो वंदना ✍️
    कुंडली विश्लेषण के लिए संपर्क करें

    9910057645

  • मनचाहा जीवनसाथी पाने के लिए कुंआरी कन्याएं ऐसे रखें हरतालिका तीज व्रत, शीघ्र बनेंगे विवाह के योग🕉️

    🕉️मनचाहा जीवनसाथी पाने के लिए कुंआरी कन्याएं ऐसे रखें हरतालिका तीज व्रत, शीघ्र बनेंगे विवाह के योग🕉️
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    🪦इस वर्ष हरतालिका तीज 27 अगस्त 2025, बुधवार को मनाई जाएगी। हरतालिका तीज का पावन पर्व सिर्फ सुहागिन महिलाओं के लिए ही नहीं, बल्कि उन कुंवारी कन्याओं के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है जो एक आदर्श जीवनसाथी की तलाश में हैं।

    इस दिन व्रत और पूजा-अर्चना करने से विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए यह कठोर व्रत किया था, जिससे उनकी मनोकामना पूर्ण हुई।

    📿कुंवारी कन्याओं के लिए व्रत के नियम
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    हरतालिका तीज का व्रत बेहद कठिन माना जाता है, लेकिन कुंवारी कन्याओं के लिए इसमें कुछ नियम अलग होते हैं। जहां सुहागिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं, वहीं अविवाहित कन्याएं जल और फलाहार ग्रहण कर सकती हैं। हालांकि, अगर कोई कन्या निर्जला व्रत रखना चाहे तो वह अपनी श्रद्धा के अनुसार रख सकती है। व्रत का संकल्प सूर्योदय से पहले लेना चाहिए और मन में भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करना चाहिए।

    📿पूजा विधि और आवश्यक सामग्री
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    इस दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा की तैयारी करें। पूजा के लिए आप मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमाएं बना सकती हैं। पूजा के लिए इन सामग्रियों को इकट्ठा करें: धूप, दीप, चंदन, कुमकुम, अक्षत, फल, फूल, बेलपत्र, शमी के पत्ते, केले के पत्ते और जल का कलश। पूजा के बाद व्रत कथा जरूर सुनें, क्योंकि यह व्रत का एक अनिवार्य हिस्सा है।

    📿मनचाहा जीवनसाथी पाने के लिए विशेष उपाय
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    शीघ्र विवाह के योग बनाने और मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए कुंवारी कन्याएं पूजा के समय कुछ विशेष उपाय कर सकती हैं:-

    🚩चुनरी अर्पित करें:- माता पार्वती को लाल रंग की चुनरी और सोलह श्रृंगार की वस्तुएं (आपकी उम्र और आवश्यकता के अनुसार) अर्पित करें। यह आपकी इच्छाशक्ति और प्रेम का प्रतीक है।

    🚩मंत्र का जाप:- पूजा के बाद •”ओम गौरी शंकराय नमः” मंत्र का •108 बार जाप करें। यह मंत्र विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने में सहायक माना जाता है।

    🚩हल्दी और नारियल का उपाय:- हल्दी की 11 गांठों को लाल कपड़े में बांधकर माता पार्वती को अर्पित करें। मान्यता है कि इस उपाय से विवाह के योग जल्दी बनते हैं। इसके अलावा, शिवलिंग पर 5 नारियल अर्पित करने से भी सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है।

    🚩दान करें:- पूजा संपन्न होने के बाद, किसी सुहागिन महिला या किसी ब्राह्मण कन्या को श्रृंगार की सामग्री और दक्षिणा दान करें। यह माना जाता है कि दान करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है।

    📿इन सरल और प्रभावी उपायों को पूरे मन और श्रद्धा से करने से माता पार्वती और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और शीघ्र विवाह के योग बनते हैं।

  • कब मनाई जाएगी अनंत चतुर्दशी?

    कब मनाई जाएगी अनंत चतुर्दशी? जानें इस पावन पर्व की पूरी जानकारी
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    ⭕अनंत चतुर्दशी 2025: हिंदू धर्म में भाद्रपद मास का विशेष महत्व होता है। इसी महीने में गणेश उत्सव मनाया जाता है और इसी का समापन अनंत चतुर्दशी पर होता है। साल 2025 में अनंत चतुर्दशी का पावन पर्व 6 सितंबर, शनिवार को मनाया जाएगा।

    इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। साथ ही गणपति बप्पा का विसर्जन भी इसी दिन संपन्न होता है।

    ⚜️अनंत चतुर्दशी की तिथि और शुभ मुहूर्त
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    वैदिक पंचांग के मुताबिक, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि का आरंभ 6 सितंबर 2025 को देर रात 3:12 बजे होगा। यह तिथि अगले दिन यानी 7 सितंबर 2025 को रात 1:41 बजे समाप्त होगी। चूँकि सनातन धर्म में उदया तिथि का विशेष महत्व होता है, इसलिए यह पर्व पूरे देश में 6 सितंबर को ही मनाया जाएगा।

    इस दिन साधक प्रातःकाल से लेकर रात्रि तक किसी भी समय पूजा-अर्चना कर सकते हैं। शुभ समय सुबह 5 बजकर 21 मिनट से लेकर रात 1 बजकर 41 मिनट तक रहेगा।

    🪔अनंत चतुर्दशी का महत्व
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    अनंत चतुर्दशी का सीधा संबंध भगवान विष्णु से है, जिन्हें जगत का पालनहार माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा करने से साधक के जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य का वास होता है। इसके साथ ही माता लक्ष्मी और शेषनाग की पूजा भी की जाती है।

    इस दिन अनंत रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा है। यह सूत्र रेशम या कपास के धागे से तैयार किया जाता है और इसमें 14 गांठें लगाई जाती हैं, जो 14 लोकों का प्रतीक मानी जाती हैं। पुरुष इसे अपने दाहिने हाथ में और महिलाएँ बाएँ हाथ में बांधती हैं। यह सूत्र व्यक्ति को बुरी शक्तियों से बचाने और जीवन में सकारात्मकता लाने का प्रतीक है।

    🪔गणेश विसर्जन का दिन
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    अनंत चतुर्दशी का एक और विशेष महत्व है। इस दिन गणेश उत्सव का समापन होता है। दस दिनों तक घर-घर और पंडालों में विराजे गणपति बप्पा को श्रद्धापूर्वक विसर्जित किया जाता है। भक्त मानते हैं कि गणपति बप्पा के जाने के बाद भी उनका आशीर्वाद पूरे साल परिवार के साथ बना रहता है।

    ⚜️इस दिन बन रहे शुभ योग
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    ज्योतिषीय दृष्टि से भी यह दिन बेहद खास है। अनंत चतुर्दशी 2025 पर सुकर्मा और रवि योग का निर्माण हो रहा है। साथ ही धनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्रों का संयोग भी बन रहा है। यह योग साधकों के लिए विशेष फलदायी माना जाता है। इन शुभ संयोगों में लक्ष्मी नारायण की पूजा करने से जीवन में हर प्रकार के सुख, समृद्धि और आशीर्वाद की प्राप्ति होती है।

    🪔अनंत चतुर्दशी पूजा विधि
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    • सुबह स्नान करके साफ और शुभ वस्त्र पहनें। पीला या सफेद वस्त्र विशेष शुभ माने जाते हैं।
    • पूजा स्थल पर भगवान विष्णु और गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें।
    • लकड़ी की चौकी पर सिंदूर से 14 तिलक लगाएँ और प्रत्येक तिलक पर पूड़ी या पूआ अर्पित करें।
    • अनंत सूत्र बनाकर उसे पंचामृत में 5 बार घुमाएँ।
    • पूजा के दौरान धूप, दीप, पुष्प, फल और तुलसी अर्पित करें।
    • अनंत चतुर्दशी की कथा सुनें और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें।
    • पूजा के बाद अनंत सूत्र हाथ में बांधें और परिवार सहित भगवान विष्णु व गणेश जी से सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
    • इस दिन तामसिक भोजन जैसे मांस, मदिरा आदि का सेवन करने से बचना चाहिए।

    ⚜️अनंत चतुर्दशी के नियम
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    • रक्षा सूत्र कम से कम एक साल तक बांधे रखें, जल्दी न निकालें।
    • यदि एक साल तक रखना संभव न हो, तो भी इसे 14 दिन से पहले न हटाएँ।
    • पूजा सुबह के समय करना सबसे उत्तम है।
    • इस दिन भगवान विष्णु और गणेश दोनों की पूजा करना बेहद आवश्यक है।

    🪔अनंत चतुर्दशी की मान्यता और कथा
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    पौराणिक मान्यता है कि जो भी श्रद्धा और विश्वास के साथ इस दिन अनंत चतुर्दशी का व्रत करता है, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। यह पर्व भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप को समर्पित है, जो असीम शक्ति और आस्था का प्रतीक है। इस दिन भक्त अनंत सूत्र बांधकर यह संकल्प लेते हैं कि वे धर्म, आस्था और सदाचार के मार्ग पर चलेंगे।

  • अघोरा चतुर्दशी आज

    अघोरा चतुर्दशी आज


    अघोरा चतुर्दशी एक विशेष धार्मिक पर्व है जिसे पितरों की पूजा एवं तंत्र कार्यों की सिद्धि के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। शास्त्रों के अनुसार भाद्रपद माह में आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अघोरा चतुर्दशी का उत्सव मनाया जाता है। खासतौर से यह पर्व हिमाचल से जुड़े क्षेत्रों, उत्तराखंड, नेपाल और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार इस समय को डगयाली भी कहा जाता है और यह उत्सव दो दिनों तक चलता है। पहले दिन को छोटी डगयाली तथा दूसरे दिन इसे बड़ी डगयाली के नाम से जाना जाता है।
    शास्त्रीय ग्रंथों में इस चतुर्दशी को कुशाग्रहणी अमावस्या या कुशोत्पाटिनी अमावस्या के रूप में भी वर्णित किया गया है। यह पर्व विशेष रूप से भगवान शिव के उपासकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन की गई पूजा, दान, व्रत और तर्पण कार्यों का विशेष फल प्राप्त होता है। विशेष रूप से पितरों की शांति और आत्मा की तृप्ति हेतु इस तिथि का विशेष महत्व है।

    अघोरा चतुर्दशी का मुहूर्त समय

    अघोरा चतुर्दशी का पर्व हिन्दू कैलेंडर के अनुसार 21 अगस्त 2025, बृहस्पतिवार के दिन मनाया जाएगा।

    भाद्रपद कृष्ण पक्ष अघोरा चतुर्दशी प्रारम्भ : 12:44 पी एम अगस्त 21

    भाद्रपद कृष्ण पक्ष अघोरा चतुर्दशी समाप्त : 11:55 ए एम अगस्त 22

    अघोरा चतुर्दशी के दिन ही मासिक शिवरात्रि का पर्व भी मनाया जाएगा। इस दिन गुरु पुष्य योग की प्राप्ति होने से विशेष शुभ योग की प्राप्ति होगी।

    अघोरा चतुर्दशी नकारात्मक शक्तियों से बचाव का समय

    अघोरा चतुर्दशी के दिन भूत-प्रेत बाधाओं से मुक्ति पाने हेतु कई स्थानों पर विशेष परंपराएं निभाई जाती हैं। हिमाचल प्रदेश के सोलन, शिमला और सिरमौर जिलों में लोग अपने घरों की खिड़कियों और दरवाजों पर कांटेदार झाड़ियों को लगाते हैं ताकि नकारात्मक शक्तियां घर में प्रवेश न कर सकें। यह परंपरा सदियों पुरानी है और इसे ग्रामीण संस्कृति में गहरे विश्वास के साथ निभाया जाता है। अघोरा चतुर्दशी पूर्वजों का स्मरण और प्रकृति से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है। इस दिन का स्नान, व्रत और दान हमें कर्मों की शुद्धि और मानसिक शांति की ओर अग्रसर करता है।

    अघोरा चतुर्दशी कुशा संग्रह का समय

    अघोरा चतुर्दशी के दिन धार्मिक रूप से कई विशेष क्रियाएं की जाती हैं। सबसे महत्वपूर्ण कार्य है कुशा का संग्रहण। हिंदू धर्म में कुशा को एक विशेष प्रकार की पवित्र घास के रुप में जाना जाता है जिसका प्रयोग लगभग सभी धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है। इसलिए इस दिन विशेष रूप से वर्षभर के लिए शुद्ध और योग्य कुशा एकत्रित की जाती है। इसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार ऐसी कुशा उपयुक्त मानी जाती है जो हरी हो, जिसमें सात पत्तियां हों, उसका मूल तीखा हो और कोई हिस्सा कटा फटा न हो। ऐसी कुशा देवताओं के पूजन और पितृ कार्यों दोनों के लिए उचित होती है। कुशा तोड़ते समय “हूं फट्” मंत्र का उच्चारण करना अनिवार्य माना गया है, जिससे इसे धार्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।

    अघोरा चतुर्दशी श्राद्ध कर्म का समय

    इस दिन पितरों के लिए तर्पण एवं श्राद्ध कर्म भी किए जाते हैं। यह मान्यता है कि अघोरा चतुर्दशी के दिन शिव के गणों को स्वतंत्रता प्राप्त होती है। भूत प्रेत, पिशाच आदि मुक्त होकर इधर-उधर विचरण करते हैं। इसलिए लोग विशेष उपाय करते हैं जिससे बुरी आत्माएं घर के लोगों को हानि न पहुंचा सकें। इसी कारण कई स्थानों पर घरों की खिड़कियों और दरवाजों पर कांटेदार झाड़ियां लगाई जाती हैं। यह नकारात्मक ऊर्जा को रोकने का प्रतीकात्मक उपाय है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर संकल्प लेते हैं, उपवास करते हैं और शिवजी की पूजा के साथ पितरों को जल अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किया गया तर्पण, पितरों तक अवश्य पहुंचता है और उन्हें शांति प्राप्त होती है।

    अघोरा चतुर्दशी का ज्योतिष अनुसार महत्व

    चतुर्दशी तिथि का समय ज्योतिष शास्त्र और हिंदू पंचांग में भी विशेष स्थान रखता है। यह तिथि विशेषकर कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में अधिक प्रभावी मानी जाती है। इस समय को कुछ विशेष कारणों की पूर्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। कुछ खास सिद्धियों की प्राप्ति, कुछ विशेष कार्यों की सफलता, वाद-विवाद विजय, नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति, बंधन मुक्ति इत्यादि से संबंधित माना गया है। कार्तिक मास की अघोरा चतुर्दशी का दिन विशेष पुण्यदायक और कल्याणकारी माना जाता है। इस दिन तीर्थ स्नान, व्रत, जप, दान और तप से प्राप्त पुण्य से व्यक्ति अपने पापों और ऋण से मुक्त हो सकता है। यह दिन संयम, साधना और स्वयं की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण समय माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि यदि अमावस्या तिथि, विशेष नक्षत्र, दुर्लभ योग और उपयुक्त करण का संयोग हो तथा वह शनिवार, सोमवार या गुरुवार जैसे शुभ वार में पड़े तो यह दिन और भी फलदायक हो जाता है। अघोरा चतुर्दशी को विशेषकर उन लोगों के लिए उत्तम माना गया है जो जीवन में कठिनाइयों, मानसिक क्लेश और पितृदोष का अनुभव कर रहे हैं। इस दिन श्रद्धा भाव से किया गया कोई भी धार्मिक कार्य अक्षय फल देने वाला होता है। भगवान विष्णु की पूजा, मंत्र जाप और ध्यान इस दिन विशेष फलदायी माने गए हैं। कुछ मान्यताओं के अनुसार यह व्रत यदि एक वर्ष तक लगातार किया जाए तो तन, मन और धन के समस्त कष्टों से मुक्ति मिलती है।
    ज्योतिष अनुसार भी इस दिन को बहुत विशेष माना गया है। स्वास्थ्य ज्योतिष के अनुसार इस दिन किए गए कार्यों के प्रभाव से शरीर के रोग और बीमारी दूर होती हैं, मानसिक शांति प्राप्त होती है और घर में सुख-शांति का वास होता है। इस दिन किया गया श्राद्ध कर्म पितरों की आत्मा को तृप्त करता है, जिससे वे प्रसन्न होकर अपने वंशजों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इसके साथ ही, यह तिथि भूत-प्रेत बाधाओं को समाप्त करने में भी अत्यंत सहायक मानी जाती है। घर की शुद्धि, वातावरण की नकारात्मकता को समाप्त करने हेतु विशेष उपाय किए जाते हैं जिससे रोग, क्लेश और संकटों से छुटकारा मिले।

  • कफ ,वात और पीत

    हमारा शरीर कफ ,वात और पीत से बना हुआ है । अलग अलग बीमारियों के लिये अलग अलग ग्रह जिमेवार होते है जैसे :-

    🌺सर्दी जुकाम खासी

    चंद्रमा कमजोर होगा, जल तत्व है।
    तो जिसको सर्दी जुकाम खाँसी रेह्ती है उसे अपन चंद्रमा ठीक करना चहिये ।

    🍃देर रात तक ना जागे
    🍃देर से ना उठे
    🍃चाँदी के glass मे पानी पीये ।

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    🌺Skin प्रोब्लम

    बुध से सम्बन्ध है । अगर किसी का सूर्य और मंगल भी ठीक नही तो जयादा प्रोब्लेम होगी ।और बहुत समय तक रहता है ।

    🍂सूर्या को जल चढ़ाये
    🍂ताँबे का छल्ला छोटी अँगुली मे पहने

    🌺आँखो की समस्या

    सूर्या से सम्बन्ध होता है । कभी कभी शुक्र भी ।

    🍁रोज़ सुबह नंगे पाव घास पर चले
    🍁अगर आँखो से पानी गिरता हौ तो उगते सूर्य के सामने थोड़ी देर बैठे ।

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    🌺हड्डियो की समस्या

    🍃शनि और सूर्य की वजह से होती है ।

    🍃पैर के अँगूठे मे चाँदी का छल्ला पहने । य अपनी छोटी अँगुली को दबाये ।

    कही बार कोई बीमारी नही होती पर लगता है की मुझे ये बीमारी हो जयेगी इसके लिये राहु जिमेदार होता है । इसके लिये 108 बार सुबह के समय गायत्री मंत्र करना लाभ दायक होगा ।

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  • गोमती #चक्र के फायदे

    गोमती #चक्र के फायदे

    💥 असाध्य रोगों को दुर करने तथा मानसिक शान्ति प्राप्त करने के लिये लगभग 10 गोमती चक्र लेकर रात को पानी में डाल देना चाहिऐ तथा सुबह उस पानी को पी जाना चाहिऐ। इससे पेट संबंध के विभिन्न रोग दुर होते है।

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    💥यदि शत्रु बढ़ गए हों तो जितने अक्षर का शत्रु का नाम है उतने गोमती चक्र लेेकर उस पर शत्रु का नाम लिखकर उन्हें जमीन में गाड़ दें तो शत्रु परास्त हो जाएंगे।
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    🌹प्रमोशन नहीं हो रहा हो तो एक गोमती चक्र लेकर शिव मंदिर में शिवलिंग पर चढ़ा दें और सच्चे ह्रदय से प्रार्थना करें-निश्चय ही प्रमोशन के रास्ते खुल जाएंगे।
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    🌹यदि गोमती चक्रको लाल सिंदूर के डिब्बी में घर में रखें तो घर में सुख-शांति बनी रहती है।
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    🌹यदि आपको नजर जल्दी लगती हो तो पाँच गोमती चक्र लेकर किसी सुनसान स्थान पर जायें फिर तीन चक्रों को अपने ऊपर से सात बार उसारकर अपने पीछे फेंक दें तथा पीछे देखे बिना वापस आ जायें – बाकी बचे दो चक्रों को तीव्र प्रवाह के जल में प्रवाहीत कर दें।
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