अपने शत्रुओं के नाश के लिए शनिवार की रात को 7 लौंग लेकर उस पर 21 बार अपने दुश्मन का नाम लेकर फूंक मारें. अगले दिन रविवार को इन 7 लौंगों को जला दें. यह टोटका लगातार 7 शनिवार तक करना है. इस टोटके से किसी व्यक्ति का वशीकरण भी किया जा सकता है. इस टोटके से आपका शत्रु भी शांत रहता है.
शत्रु से छुटकारा पाने के लिए सूर्योदय से पूर्व ‘नृसिंहाय विद्यहे,वज्र नखाय धीमही तन्नो नृसिंह प्रचोदयात्’ मंत्र का 108 बार जाप करें. इस मंत्र का जाप किसी शांतिमय एवं एकांतपूर्ण स्थान पर करें. इस मंत्र का रोज़ाना जाप करने से आपके शत्रुओं के सारे प्रयास असफल हो जाएंगे.
इसके अलावा अगर आप अपने शत्रु को पेरशान करना चाहते हैं या किसी व्यक्ति से उसका अहित कर बदला लेने चाहते हैं तो इस काम में ये उपाय आपकी मदद कर सकता है.
इस मंत्र का करें जाप
अगर आप अपने शत्रु को तबाह करना चाहते हैं तो अमावस्या या रविवार की रात को ये उपाय करें. दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठें और अपने सामने काले रंग के वस्त्र के ऊपर मां काली का चित्र लगाएं. मां काली का पूजन करें और पूजन की समाप्ति होने पर एक नीबू पर सिंदूर से अपने दुश्मन का नाम लिखें. इसके पश्चात रुद्राक्ष की माला से ‘क्रीं क्रीं शत्रु नाशिनी क्रीं क्रीं फट’ मंत्र का 11 बार जाप करें.
वृहत्त पाराशर ज्योतिषशास्त्र में ऋषि पाराशर ने बहुत सारे उपाय बताए हैं जिनमें उन्होंने यह वर्णन किया है कि किस कारण से वह कष्ट आया है और उसकी निवृत्ति का क्या उपाय हैं। यह उपाय ज्यादातर मंत्र और दान पूजा-पाठ इत्यादि से संबंधित है। उन सब का संक्षिप्त विवरण इस लेख में दिया जा रहा है। विभिन्न शाप : संतान नष्ट होने या संतान ना होने को विभिन्न तरह के शाप के परिणाम ऋषि पाराशरजी ने बताया है। ऋषि पाराशर जी ने उल्लेेख किया है कि भगवान शंकर ने स्वयं पार्वती जी को यह उपाय बताए हैं। 1. सर्प का शाप: बहुत सारे योगों से सर्प शाप का पता चलता है। उनमें राहु पर अधिक बल दिया गया है। कुल आठ योग बताए गए हैं। सर्प शाप से संतान नष्ट होने पर या संतान का अभाव होने पर स्वर्ण की एक नाग प्रतिमा बनाकर विधिपूर्वक पूजा की जाए जिसमें अनुष्ठान, दशंाश हवन, मार्जन, तर्पण, ब्राह्मण भोजन कराके गोदान, भूमि दान, तिल दान, स्वर्ण दान इत्यादि किए जाएं तो नागराज प्रसन्न होकर कुल की वृद्धि करते हैं। 2. पितृ शाप : गतजन्म में पिता के प्रति किए गए अपराध से जो शाप मिलता है तो संतान का अभाव होता है। इस दोष का पता सूर्य से संबंधित योगों से चलता है और सूर्य के पीड़ित होने या कुपित होने पर ये योग आधारित हैं। निश्चित है कि मंगल और राहु भी गणना में आएंगे। इसी को पितृ दोष या पितर शाप भी कहा गया है। कुल मिलाकर ग्यारह योग हैं। इसके लिए गया श्राद्ध करना चाहिए तथा जितने अधिक ब्राह्मणों को भोजन करा सकें, कराएं। यदि कन्या हो तो गाय का दान और कन्या दान करना चाहिए। ऐसे करने से कुल की वृद्धि होगी। 3. मातृ शाप: पंचमेश और चंद्रमा के संबंधों पर आधारित यह योग संतान का नष्ट होना या संतान का अभाव बताते हैं। इन योगों में निश्चित रूप से मंगल, शनि और राहु का योगदान मिलेगा। यह दोष कुल 13 मिलाकर हंै। इस जन्म में भी यदि कोई माता की अवहेलना करेगा या पीड़ित करेगा तो अगले जन्म में यह दोष देखने को मिलेगा। 4. भ्रातृ शाप: यदि गतजन्म में भाई के प्रति कोई अपराध किया गया हो तो उसके शाप के कारण इस जन्म में संतान नष्ट होना या संतान का अभाव मिलता है। पंचम भाव, मंगल और राहु से यह दोष देखे जाते हैं। यह दोष कुल मिलाकर तेरह हैं। उपाय : हरिवंश पुराण का श्रवण करें, चान्द्रायण व्रत करें, कावेरी नदी या अन्य पवित्र नदियों के किनारे शालिग्राम के सामने पीपल वृक्ष उगाएं तथा पूजन करें, पत्नी के हाथ से दस गायों का दान करें और फलदार वृक्षों सहित भूमि का दान करें तो निश्चित रूप से कुल वृद्धि होती है। 5. मामा का शाप: गतजन्म में यदि मामा के प्रति कोई अपराध किया गया हो तो उसके शाप से संतान का अभाव इस जन्म में देखने को मिलता है। यदि ऐसा होता है कि पंचम भाव में बुध, गुरू, मंगल और राहु मिलते हैं और लग्न में शनि मिलते हैं। इस योग में शनि-बुध का विशेष योगदान होता है। इसके लिए भगवान विष्णु की मूर्ति की स्थापना, तालाब, बावड़ी, कुअंा और बांध को बनवाने से कुल की वृद्धि होती है। 6. ब्रह्म शाप: गतजन्म में कोई धन या बल के मद में ब्राह्मणों का अपमान करता है तो उसके शाप से इस जन्म में संतान का अभाव होता है या संतान नष्ट होती है। यह कुल मिलाकर सात योग हैं। नवम भाव, गुरू, राहु और पाप ग्रहों को लेकर यह योग देखने को मिलते हैं। योग का निर्णय तो विद्वान ज्योतिषी ही करेंगे परंतु उपाय निम्न बताए गए हैं। इसके लिए चान्द्रायण व्रत, प्रायश्चित करके गोदान, दक्षिणा, स्वर्ण और पंचरत्न तथा अधिकतम ब्राह्मणों को भोजन कराएं तो शाप से निवृत्ति होकर कुल की वृद्धि होती है। 7. पत्नी का शाप: गतजन्म में पत्नी के द्वारा यदि शाप मिलता है तो इस जन्म में संतान का अभाव होता है। यह ग्यारह योग बताए गए हैं जो सप्तम भाव और उस पर पापग्रहों के प्रभाव से देखे जाते हैं। इसके लिए कन्या दान श्रेष्ठ उपाय बताया गया है। यदि कन्या नहीं हो तो स्वर्ण की लक्ष्मी-नारायण की मूर्ति तथा दस ऐसी गाय जो बछड़े वाली माँ हों तथा शैया, आभूषण, वस्त्र इत्यादि ब्राह्मण जोड़े को देने से पुत्र होता है और कुल वृद्धि होती है। 8. प्रेत शाप: यह नौ योग बताए गए हैं जिनमें ये वर्णन है कि अगर श्राद्ध का अधिकारी अपने मृत पितरों का श्राद्ध नहीं करता तो वह अगले जन्म में अपुत्र हो जाता है। इस दोष की निवृत्ति के लिए निम्न उपाय हैं। इसके लिये गया में पिण्डदान, रूद्राभिषेक, ब्रह्मा की स्वर्णमय मूर्ति, गाय, चांदी का पात्र तथा नीलमणि दान करना चाहिए। 9. ग्रह दोष: यदि ग्रह दोष से संतान हानि हो तो बुध और शुक्र के दोष में भगवान शंकर का पूजन, गुरू और चंद्र के दोष में संतान गोपाल का पाठ, यंत्र और औषधि का सेवन, राहु के दोष से कन्या दान, सूर्य के दोष से भगवान विष्णु की आराधना, मंगल और शनि के दोष से षडङग्शतरूद्रीय जप कराने से संतान प्राप्ति होती है और कुल की वृद्धि होती है। अन्य दोषों के उपाय: अमावस्या का जन्म: ऋषि पाराशर जी का मानना है कि अमावस्या के जन्म से घर में दरिद्रता आती है अत: अमावस्या के दिन संतान का जन्म होने पर शांति अवश्य करानी चाहिए। इस उपाय के अंतर्गत विधिपूर्वक कलश स्थापना करके उसमें पंच पल्लव, जड़, छाल और पंचामृत डालकर अभिमंत्रित करके अग्निकोण में स्थापना कर दें फिर सूर्य की सोने की, चंद्रमा की चांदी की मूर्ति बनवाकर स्थापना करें और षोडशोपचार या पंचोपचार से पूजन करें फिर इन ग्रहों की समिधा से हवन करें, माता-पिता का भी अभिषेक करें और सोने, चांदी या गाय की दक्षिणा दें और इसके बाद ब्राह्मण भोजन कराएं। इससे गर्त के ग्रह चंद्रमा एवं सूर्य की शांति होती है और जातक का कल्याण होता है। कृष्ण चतुर्थी व्रत के उपाय: चतुर्थी को छ: भागों में बांटा है। प्रथम भाग में जन्म होने पर शुभ होता है, द्वितीय भाग में जन्म हो तो पिता का नाश, तृतीय भाग में जन्म हो तो माता की मृत्यु, चतुर्थ भाग में जन्म हो तो मामा का नाश, पंचम भाग में जन्म हो तो कुल का नाश, छठे भाग में जन्म हो तो धन का नाश या जन्म लेने वाले स्वयं का नाश होता है। इस दोष का निवारण भगवान शिवजी की पूजा से होता है। यथाशक्ति शिव की स्वर्ण प्रतिमा बनाकर महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। इस जप का विधान थोड़ा सा तकनीकी और कठिन होता है। हवन में सभी ग्रहों की आहुतियां उनके निमित्त समिधा से दी जाती हैं, बाद में स्थापित कलश के जल से माता-पिता का अभिषेक कराया जाता है। भद्रा इत्यादि में जन्म का दोष: भद्रा, क्षय तिथि, व्यतिपात, परिघ, वज्र आदि योगों में जन्म तथा यमघंट इत्यादि में जो जातक जन्म लेता है, उसे अशुभ माना गया है। यह दुर्योग जिस दिन हुआ हो, वह दुर्योग जिस दिन आए उसी दिन इसकी शांति करानी आवश्यक है। इस दुर्योग के दिन विष्णु, शंकर इत्यादि की पूजा व अभिषेक शिवजी मंदिर में धूप, घी, दीपदान तथा पीपल वृक्ष की पूजा करके विष्णु भगवान के मंत्र का 108बार हवन कराना चाहिए। पीपल को आयुर्दायक माना गया है। इसके पश्चात् ब्राह्मण भोज कराएं तो व्यक्ति दोष मुक्त हो जाता है। माता-पिता के नक्षत्र में जन्म: यदि माता-पिता या सगे भाई-बहिन के नक्षत्र में किसी का भी जन्म हो तो उनमें से किसी को भी मरणतुल्य कष्ट अवश्य होगा। किसी शुभ लग्न में अग्निकोण से ईशान कोण की तरफ जन्म नक्षत्र की सुंदर प्रतिमा बनाकर कलश पर स्थापित करें फिर लाल वस्त्र से ढककर उपरोक्त नक्षत्रों के मंत्र से पूजा-अर्चना करें फिर उसी मंत्र से 108बार घी और समिधा से आहुति दें तथा कलश के जल से पिता, पुत्र और सहोदर का अभिषेक करें। ब्राह्मण भोजन कराएं और दक्षिणा दें इससे उस नक्षत्र की शांति होती है। संक्रांति जन्म दोष: ग्रहों की संक्रांतियों के नाम घोरा, ध्वांक्षी, महोदरी, मन्दा, मन्दाकिनी, मिश्रा और राक्षसी इत्यादि हैं। सूर्य की संक्रांति में जन्म लेने वाला दरिद्र हो जाता है इसलिए शांति करानी आवश्यक है। संक्रांति में जन्म का अगर दोष हो तो नवग्रह का यज्ञ करना चाहिए। विधि-विधान के साथ अधिदेव और प्रत्यधिदेव देवता के साथ जिस ग्रह की संक्रांति हो उसकी प्रतिमा को स्थापित कर लें फिर ग्रहों की पूजा करके व हवन करके महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। तिल से हवन कर लेने के बाद माता-पिता का अभिषेक करें और यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराके, दान-दक्षिणा दें इससे संक्रांति जन्म दोष दूर होता है। ग्रहण काल में जन्म का दोष: जिसका जन्म ग्रहणकाल में होता है उसे व्याधि, कष्ट, दरिद्रता और मृत्यु का भय होता है। ग्रहण नक्षत्र के स्वामी तथा सूर्यग्रहण में सूर्य की तथा चंद्रग्रहण में चंद्रमा की मूर्ति बनाएं। सूर्य की प्रतिमा सोने की, चंद्रमा की प्रतिमा चांदी तथा राहु की प्रतिमा सीसे की बनाएं। इन ग्रहों के प्रिय विषयों का दान करना चाहिए फिर ग्रह के लिए निमित्त समिधा से हवन करें परंतु नक्षत्र स्वामी के लिए पीपल की समिधा का इस्तेमाल करें। कलश के जल से जातक का अभिषेक करें और ब्राह्मण को भोजन कराएं व दान-दक्षिणा दें। इससे ग्रहणकाल में जन्म दोष दूर होता है। प्रसव विकार दोष: यदि निर्धारित समय से कुछ महीने पहले या कुछ महीने बाद प्रसव हो तो इस विकार से ग्राम या राष्ट्र का अनिष्ट होता है। अंगहीन या बिना मस्तिष्क का या अधिक मस्तिष्क वाला जातक जन्म ले या अन्य जानवरों की आकृति वाला जातक जन्म ले तो यह विकार गाँव के लिए आपत्ति लाने वाला होता है। कुल में भी पीड़ा आती है। पाराशर ऐसे प्रसव के लिए अत्यंत कठोर है और ना केवल ऐसी स्त्री बल्कि ऐसे जानवर को भी त्याग देने के लिए कहते हैं। इसके अतिरिक्त 15वें या 16वें वर्ष का गर्भ प्रसव भी अशुभ माना गया है और विनाश कारक होता है। इस विकार की भी शांति का प्रस्ताव किया गया है। ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र का पूजन, ग्रह यज्ञ, हवन, अभिषेक और ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए। इस प्रकार से शांति कराने से अनिष्ट से रक्षा होती है। त्रीतर जन्म विकार: तीन पुत्र के बाद कन्या का जन्म हो या तीन कन्या के बाद पुत्र का जन्म हो तो पितृ कुल या मातृ कुल में अनिष्ट होता है। इसके लिए जन्म का अशौच बीतने के बाद किसी शुभ दिन किसी धान की ढेरी पर चार कलश की स्थापना करके ब्रह्मा, विष्णु, शंकर और इंद्र की पूजा करनी चाहिए। रूद्र सूक्त और शांति सूक्त का पाठ करना चाहिए फिर हवन करना चाहिए। इससे अनिष्ट शांत होता है। गण्डान्त विकार: पूर्णातिथि (5,10,15) के अंत की घड़़ी, नंदा तिथि (1,6,11) के आदि में दो घड़ी कुल मिलाकर चार तिथि को गण्डान्त कहा गया है। इसी प्रकार रेवती और अश्विनी की संधि पर, आश्लेषा और मघा की संधि पर और ज्येष्ठा और मूल की संधि पर चार घ़्ाडी मिलाकर नक्षत्र गण्डान्त कहलाता है। इसी तरह से लग्न गण्डान्त होता है। मीन की आखिरी आधी घटी और मेष की प्रारंभिक आधी घटी, कर्क की आखिरी आधी घटी और सिंह की प्रारंभिक आधी घटी, वृश्चिक की आखिरी आधी घटी तथा धनु की प्रारंभिक आधी घटी लग्न गण्डान्त कहलाती है। इन गण्डान्तों में ज्येष्ठा के अंत में पांच घटी और मूल के आरंभ में आठ घटी महाअशुभ माना गया है। इसके लिए गण्डान्त शांति के बाद ही पिता बालक का मुंह देखें। तिथि गण्डान्त में बैल का दान, नक्षत्र गण्डान्त में बछड़े वाली गाय का दान और लग्न गण्डान्त में सोने का दान करना चाहिए। गण्डान्त के पूर्व भाग में जन्म हो तो पिता के साथ बच्चो का अभिषेक करना चाहिए और यदि दूसरे भाग में जन्म हो तो माता के साथ बालक का अभिषेक करना चाहिए। इन उपायों के अंतर्गत तिथि स्वामी, नक्षत्र स्वामी या लग्न स्वामी का स्वरूप बनाकर, कलश पर पूजा करें और फिर हवन करें व अभिषेक इत्यादि करें। लगभग सभी गण्डान्तों में गोदान को एक बहुत सशक्त उपाय माना गया है। ज्येष्ठा गण्ड शांति में इन्द्र सूक्त और महामृत्युंजय का पाठ किया जाता है। मूल, ज्येष्ठा, आश्लेषा और मघा को अति कठिन मानते हुए तीन गायों का दान बताया गया है। रेवती और अश्विनी में दो गायों का दान और अन्य गण्ड नक्षत्रों के दोष या किसी अन्य दुष्ट दोष में एक गाय का दान बताया गया है। ज्येष्ठा नक्षत्र की कन्या अपने पति के बड़े भाई का विनाश करती है और विशाखा के चौथे चरण में उत्पन्न कन्या अपने देवर का नाश करती है। अत: इनके विवाह के समय तो अवश्य ही गोदान कराना चाहिए। आश्लेेषा के अंतिम तीन चरणों में जन्म लेने वाली कन्या या पुत्र अपनी सास के लिए अनिष्टकारक होते हैं तथा मूल के प्रथम तीन चरणों में जन्म लेने वाले जातक अपने ससुर को नष्ट करने वाले होते हैं अत: इनकी शांति अवश्य करानी चाहिए। अगर पति से बड़ा भाई ना हो तो यह दोष नहीं लगता है। पाराशर अतिरिक्त लगभग सभी होरा ग्रंथ शास्त्रकारों ने ग्रहों की शाति को विशेष महत्व दिया है। फलदीपिका के रचनाकार मंत्रेश्वर जी ने एक स्थान पर लिखा है कि – ‘‘दशापहाराष्टक वर्गगोचरे, ग्रहेषु नृणां विषमस्थितेष्वपि। जपेच्चा तत्प्रीतिकरै: सुकर्मभि:, करोति शान्तिं व्रतदानवन्दनै:।।’’ जब कोई ग्रह अशुभ गोचर करे या अनिष्ट ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा हो तो उस ग्रह को प्रसन्न करने के लिए व्रत, दान, वन्दना, जप, शांति आदि द्वारा उसके अशुभ फल का निवारण करना चाहिए।
भादवा की चौथ कब है 12 या 13 अगस्त, नोट कर लें सही तिथि, पूजा विधि और मुहूर्त ============================ 〰️🌼〰️〰️〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️〰️🌼〰️〰️〰️🌼〰️ ⭕भादों की चौथ का व्रत कब है: इस साल भादों चौथ का व्रत 12 अगस्त 2025, मंगलवार को रखा जाएगा। भाद्रपद संकष्टी चतुर्थी का प्रारंभ 12 अगस्त की सुबह 8 बजकर 40 मिनट पर होगा और इसकी समाप्ति 13 अगस्त 2025 की सुबह 6 बजकर 35 मिनट पर होगी।
भादो चौथ की पूजा के लिए गोधुली मुहूर्त सबसे शुभ माना जाता है और 12 अगस्त को ये मुहूर्त शाम 06:50 से 07:16 तक रहेगा। बता दें भादो चौथ को भाद्रपद संकष्टी चतुर्थी 2025, भाद्रपद चौथ, बोल चौथ, बहुला चतुर्थी, हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी इत्यादि कई नामों से जाना जाता है। यहां हम आपको बताएंगे भादों चौथ की पूजा विधि और शुभ मुहूर्त।
⚜️भादों चौथ व्रत पूजा मुहूर्त 2025 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 भादों चौथ की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 6 बजकर 50 मिनट से लेकर शाम 7 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। चतुर्थी तिथि 12 अगस्त की सुबह 8 बजकर 40 मिनट से लेकर 13 अगस्त की सुबह 6 बजकर 35 मिनट तक रहेगी।
🌙भादों चौथ चंद्रोदय समय 2025 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 भादो चौथ के दिन चन्द्रोदय समय रात 08:59 का है।
🪔भादों चौथ पूजा विधि 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
भादों चौथ के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान करें।
इसके बाद घर की मंदिर की सफाई करें और अपने दायें हाथ में जल रखकर व्रत का संकल्प लें।
इसके बाद एक साफ चौकी पर लाल रंग का वस्त्र बिछाएं और उसपर गणेश भगवान की प्रतिमा स्थापित करें।
इसके बाद गणेश जी का अभिषेक करें और उन्हें पुष्प, फल, मिठाई, दुर्वा अर्पित करें।
भगवान के समक्ष घी का दीपक जलाएं और सच्चे मन से उनके मंत्रों का जाप करें।
भादों चौथ की कथा सुनें और आरती करके भगवान को भोग लगाएं।
अंत में लोगों में प्रसाद बांट दें।
रात में चांद की पूजा कर अपना व्रत खोल लें।
🪔भादों चौथ व्रत का महत्व 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 मान्यता है इस व्रत को रखने से व्यक्ति की सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं साथ ही भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
📿भादो चौथ पूजा मंत्र ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ 🚩वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल पौष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रुक्मिणी अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन मां रुक्मिणी और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना की जाती है और व्रत रखा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन द्वापर युग में विदर्भ के राजा भीष्मक के घर देवी रुक्मिणी का जन्म हुआ था। देवी रुक्मिणी को मां लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। रुक्मिणी अष्टमी के दिन व्रत करने और देवी रुक्मिणी की पूजा करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और भक्तों को अन्न, धन, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। इस दिन व्रत और पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। अब ऐसे में रुक्मिणी अष्टमी का स्तोत्र करने से व्यक्ति को उत्तम परिणाम मिल सकते हैं।
रुक्मिणी स्वयंवर मंत्र, “ॐ नमो भगवते रुक्मिणी वल्लभाय स्वाहा”, भगवान कृष्ण और रुक्मिणी के विवाह से जुड़ा एक शक्तिशाली मंत्र है. रुक्मिणी, भगवान कृष्ण की पटरानी थीं, और उनका स्वयंवर (स्वयं का चुनाव) हिंदू पौराणिक कथाओं में एक महत्वपूर्ण घटना है.
मंत्र का महत्व:
यह मंत्र विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए उपयोगी माना जाता है.
जिन लोगों को मनचाहा जीवनसाथी नहीं मिल रहा है, वे भी इस मंत्र का जाप कर सकते हैं.
रुक्मिणी अष्टमी के दिन इस मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना जाता है.
मंत्र जाप की विधि:
पवित्र अवस्था में एकांत में बैठकर 108 बार मंत्र का जाप करें.
जाप करते समय आपका मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए.
इस मंत्र का जाप कम से कम 3 महीने तक नियमित रूप से करना चाहिए.
अन्य उपयोगी मंत्र:
विवाह से जुड़ी बाधाओं को दूर करने के लिए कुछ अन्य मंत्र भी उपयोगी माने जाते हैं:
जल्दी विवाह के लिए मंत्र:“विवाहं भाग्यमारोग्यं शीघ्रलाभं च देहि मे ॥ चतुस्टय लाभाय च पतिं मे देहि कुरु-कुरु स्वाहा ।। तथा मां कुरु कल्याणि । कान्त कांता सुदुर्लभाम्।।”
सावन की अमावस्या पर पाये अपनी श्रापित कुंडली योग से से छुटकारा :
भगवान शिव की कृपा से पाये इन श्रापित योगों से छुटकारा राहु की स्थिति देखकर हम जान सकते है ।
अगर कुंडली मे राहु शनि के साथ बैठा है । यदि हाथो के बीचो बीच तिल हो । कभी कभी सूर्य -शनि साथ की स्थिति भी मानी गयी है ।
www.astroshaliini.com astroshaliini.wordpress.com 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 किस वजह से योग बनता है
1 अपनी जिमेदारीया ना पूरी की हो 2 पेड़ कट्वाये हो 3 गर्भपात कराये हो 4 अपने साथी से धोखा किया हो 5 गुरु की अनादर किया हो 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁
अपनी जिमेदारीया ना पूरी की हो तो क्या करे :—
हॉस्पिटल मे जाकर सेव करे । रोगियों की किसी भी तरह हेल्प करे । ॐ नमो भगवते रूद्राय का जाप करे । www.astroshaliini.com astroshaliini.wordpress.com
पेड़ कट्वाये हो तो डेर सारे पेड़ लगवाय और उनकी देखभाल करे ॐ गँगाधाराय नम : का जाप करे । खीर खिलाये । 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
और बाकी सब के लिये :
शिव के किसी भी ज्योर्तिलिंग पर जाये और जल और बेलपत्र चढ़ाये । अपने अपराधों की क्षमा माँगे और शिव अपराध क्षमा स्त्रोत का पाठ करे । अपनी शक्ति के अनुसार दान करे ।
भगवान् शिव का ही अपर नाम विश्वनाथ है, शिव समस्त संसार के कष्टों को शीघ्रता से हरने वाले हैं, जो साधक नित्य प्रातः या सायं श्रीमहर्षि व्यास प्रणीत यह इस स्तोत्र का पाठ करता है उसे भगवान् शिव विद्या, धन, प्रचुर सौख्य एवं अनन्त कीर्ति प्रदान करते हैं ।
गङ्गातरङ्गरमणीयजटाकलापं गौरीनिरन्तरविभूषितवामभागम्। नारायणप्रियमनङ्गमदापहारं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥ जिनकी जटाएँ गंगाजी की लहरों से सुन्दर प्रतीत होती हैं, जिनका वाम भाग सदा पार्वती जी से सुशोभित रहता है, जो नारायण के प्रिय और कामदेव के मद का नाश करने वाले हैं, उन काशीपति विश्वनाथ को भजो।
वाचामगोचरमनेकगुणस्वरूपं वागीशविष्णुसुरसेवितपादपीठम्। वामेन विग्रहवरेण कलत्रवन्तं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्।। वाणी द्वारा जिनका वर्णन नहीं हो सकता, जिनके अनेक गुण और अनेक स्वरूप हैं, ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवता जिनकी चरण पादुका का सेवन करते हैं, जो अपने सुन्दर वामांग के द्वारा ही सपत्नीक हैं, उन काशीपति विश्वनाथ को भजो।
भूताधिपं भुजगभूषणभूषिताङ्गं व्याघ्राजिनाम्बरधरं जटिलं त्रिनेत्रम्। पाशाङ्कुशाभयवरप्रदशूलपाणिं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥ जो भूतों के अधिपति हैं, जिनका शरीर सर्परूपी गहनों से विभूषित है, जो बाघ की खाल का वस्त्र पहनते हैं, जिनके हाथों में पाश, अंकुश, अभय, वर और शूल हैं, उन जटाधारी त्रिनेत्र काशीपति विश्वनाथ को भजो।
शीतांशुशोभितकिरीटविराजमानं भालेक्षणानलविशोषितपञ्चबाणम्। नागाधिपारचितभासुरकर्णपूरं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥ जो चन्द्रमा द्वारा प्रकाशित किरीट से शोभित हैं, जिन्होंने अपने भालस्थ नेत्र की अग्नि से कामदेव को दग्ध कर दिया, जिनके कानों में बड़े- बड़े साँपों के कुण्डल चमक रहे हैं, उन काशीपति विश्वनाथ को भजो।
पञ्चाननं दुरितमत्तमतङ्गजानां नागान्तकं दनुजपुङ्गवपन्नगानाम्। दावानलं मरणशोकजराटवीनां वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥ जो पाप रूपी मत वाले हाथियों के मारने वाले सिंह हैं, दैत्य समूह रूपी साँपों का नाश करने वाले गरुड हैं तथा जो मरण, शोक और बुढ़ापा रूपी भीषण वन को जलाने वाले दावानल हैं, ऐसे काशीपति विश्वनाथ को भजो।
तेजोमयं सगुणनिर्गुणमद्वितीय मानन्दकन्दमपराजितमप्रमेयम्। नागात्मकं सकलनिष्कलमात्मरूपं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्।। जो तेजपूर्ण, सगुण, निर्गुण, अद्वितीय, आनन्दकन्द, अपराजित और अतुलनीय हैं, जो अपने शरीर पर सर्पों को धारण करते हैं, जिनका रूप ह्रास- वृद्धि रहित है, ऐसे आत्म स्वरूप काशीपति विश्वनाथ को भजो।
रागादिदोषरहितं स्वजनानुरागं वैराग्यशान्तिनिलयं गिरिजासहायम्। माधुर्यधैर्यसुभगं गरलाभिरामं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥ जो रागादि दोषों से रहित हैं, अपने भक्तों पर कृपा रखते हैं, वैराग्य और शान्ति के स्थान हैं, पार्वती जी सदा जिनके साथ रहती हैं,जो धीरता और मधुर स्वभाव से सुन्दर जान पड़ते हैं तथा जो कण्ठ में गरल के चिह्न से सुशोभित हैं, उन काशीपति विश्वनाथ को भजो।
आशां विहाय परिहृत्य परस्य निन्दां पापे रतिं च सुनिवार्य मनः समाधौ। आदाय हृत्कमलमध्यगतं परेशं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥ सब आशाओं को छोड़कर, दूसरों की निन्दा त्यागकर और पाप कर्म से अनुराग हटाकर, चित्त को समाधि में लगाकर, हृदय कमल में प्रकाशमान परमेश्वर काशीपति विश्वनाथ को भजो।
वाराणसीपुरपतेः स्तवनं शिवस्य व्याख्यातमष्टकमिदं पठते मनुष्यः। विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्तिं सम्प्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम्॥ जो मनुष्य काशीपति शिव के इन आठ श्लोकों के स्तवन का पाठ करता है, वह विद्या, धन, प्रचुर सौख्य और अनन्त कीर्ति प्राप्त कर देहावसान होने पर मोक्ष भी प्राप्त कर लेता है।
विश्वनाथाष्टकमिदं यः पठेच्छिवसन्निधौ। शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥ जो शिव के समीप इस ‘विश्वनाथाष्टक’ का पाठ करता है, वह शिवलोक प्राप्त करता और शिव के साथ आनन्दित होता है।
In Vedic Astrology, each of the five elements (Fire, Earth, Air, Water, Space) governs specific materials, objects, foods, colors, herbs, metals, gemstones, fragrances, and lifestyle items. You can use these to balance the deficient element in your Kundali chart.
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ELEMENTAL PRODUCTS FOR BALANCING ENERGY IN KUNDALI
(Use according to which element is weak or excessive)
Balancing the elements (Fire, Earth, Air, Water) in your Kundali is essential for emotional, physical, and spiritual harmony. If one element is too dominant or weak, it can cause imbalance in thoughts, behavior, health, or relationships.
Below are Vedic astrology remedies to balance each element based on your Kundali chart.
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FIRE Element Remedies
(If Fire is Excessive or Weak – Aries, Leo, Sagittarius, or Sun/Mars/Jupiter/Ketu imbalance)
When Excessive (Too much fire = anger, impulsiveness, overconfidence):
इस पाशुपतास्त्र स्तोत्र का मात्र 1 बार जप करने पर ही मनुष्य समस्त विघ्नों का नाश कर सकता है। 100 बार जप करने पर समस्त उत्पातों को नष्ट कर सकता है तथा युद्ध आदि में विजय प्राप्त कर सकता है। इस मंत्र का घी और गुग्गल से हवन करने से मनुष्य असाध्य कार्यों को पूर्ण कर सकता है।